ललित सुरजन की कलम से - शीशे का मसीहा
'शीशे के मसीहाओं की इस लंबी कतार में सबसे ताजा नाम देश के महालेखानियंत्रक वी.के. राय का है. जनता को ऐसा बताया जा रहा है मानो भ्रष्टाचार से खात्मे के लिए वे ही देश की आखिरी उम्मीद हैं;
'शीशे के मसीहाओं की इस लंबी कतार में सबसे ताजा नाम देश के महालेखानियंत्रक वी.के. राय का है. जनता को ऐसा बताया जा रहा है मानो भ्रष्टाचार से खात्मे के लिए वे ही देश की आखिरी उम्मीद हैं। श्री राय भी महाप्रतापी पांडव भीम की भांति आगे-पीछे देखे बिना अपनी गदा घुमाए जा रहे हैं।
हम ऐसे अफसरों को जानते हैं जो शासकीय सेवा में रहते हुए भी अपनी सामाजिक प्रतिबध्दता के लिए जाने जाते थे और जिन्हें नौकरी के दौरान अपने मूल्यबोध के कारण असुविधाओं का सामना भी करना पड़ा था। श्री विनोद राय निश्चित रूप से इस परम्परा के वारिस नहीं हैं।
इसलिए आज एक तबका जहां उनकी वाहवाही कर रहा है, तो एक बड़ा वर्ग उनका मुखर आलोचक भी बन गया है। यूपीए सरकार की घोर विरोधी पत्रकार तवलींन सिंह ने तो अपने कॉलम में तो साफ-साफ लिखा है कि श्री राय सीएजी से रिटायर होने के बाद राजनीति के मैदान में उतर सकते हैं।
अगर ऐसा होता है तो हमें आश्चर्य नहीं होगा।'
(देशबन्धु में 21 अगस्त 2012 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/08/blog-post_21.html