आरएसएस के सामने है खड़गे के सवालों की चुनौती!
संघ के लिए हालात पहले से कहीं बेहतर हैं। उसकी गतिविधियां बढ़ रही हैं, सत्ता के गलियारों में संघ की चिंताओं को सुना और उन पर अमल किया जाता है।;
जगदीश रत्तनानी
संघ के लिए हालात पहले से कहीं बेहतर हैं। उसकी गतिविधियां बढ़ रही हैं, सत्ता के गलियारों में संघ की चिंताओं को सुना और उन पर अमल किया जाता है। कई लोग आरएसएस को सरकार के कई फैसलों को आकार देने वाली एक ताकतवर शक्ति के तौर पर देखते हैं। संघ की सालाना रिपोर्ट में इसकी गतिविधियों के दायरे और संख्या का ब्यौरा तो मिलता है लेकिन पैसों का हिसाब-किताब नहीं बताया जाता। इसने प्रभाव के नए क्षेत्र भी बनाए हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) खुद मानता है कि वह एक बड़ा और दूर-दूर तक फैला हुआ संगठन है। आज देश भर में इसकी शानदार इमारतें और अच्छी तरह से बने हुए दफ्तर हैं। अपनी 100वीं सालगिरह पर संघ ने कई कार्यक्रम आयोजित किए। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक यादगार डाक टिकट तथा एक सिक्का भी जारी किया। संघ को भारतीय जनता पार्टी की 'वैचारिक जननीÓ कहा जाता है और भाजपा वही पार्टी है जिसने 2014 में सत्ता में आने के बाद से देश पर कड़ाई से शासन किया है। क्या ऐसे संगठन को बिना पर्याप्त पारदर्शिता, गवर्नेंस के ढांचे और लोगों को संगठित करने और देश के नागरिक जीवन के लगभग हर पहलू पर लोगों को प्रभावित करने के अपने तरीकों के बारे में जनता की जानकारी के बिना काम करना चाहिए?
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने संघ से बार-बार ऐसे ही सवाल पूछे हैं। ये सवाल संगठन के ढांचे, उसके अस्तित्व और उसकी यात्रा की जड़ तक जाते हैं। प्रधानमंत्री ने आरएसएस को 'दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओÓ कहा है। खड़गे ने पूछा है कि इतना बड़ा संगठन जब सार्वजनिक क्षेत्र में काम करता है, सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल करता है और बड़े पैमाने पर लोगों को इक_ा करता है, तो वह खुद को पंजीकृत क्यों नहीं कराता या अपना हिसाब-किताब क्यों जाहिर नहीं करता? ये आसान सवाल हैं लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि ये वाजिब सवाल हैं।
इस साल की शुरुआत में भेजे गए एक 'खुले पत्रÓ में खड़गे ने लिखा था कि संघ का 'लगातार लोगों को इक_ा करना... कानूनी स्थिति, जवाबदेही, आर्थिक स्थिरता, कानून-व्यवस्था, मंज़ूरी, फंडिंग के स्रोत और भारत के संविधान व कानूनों के पालन को लेकर जायज़ सवाल खड़े करता हैÓ। आरएसएस ने इसके जवाब में कहा है कि रजिस्ट्रेशन तभी ज़रूरी होता है जब कोई संगठन सरकारी फंड लेना चाहता हो और हिंदू धर्म तो खुद भी रजिस्टर्ड नहीं है। लेकिन सबसे छोटे नॉन-प्रॉफिट या लेबर यूनियन को भी, जिसने कभी पब्लिक फंड का इस्तेमाल नहीं किया, रिकॉर्ड रखने और हिसाब-किताब जाहिर करने के लिए मजबूर किया जाता है। अगर संघ रजिस्टर्ड नहीं है तो वह मंज़ूरी के लिए कैसे आवेदन करता है, प्रशासन के साथ कैसे काम करता है और अपने प्रमुख के लिए जेड प्लस सुरक्षा कैसे हासिल करता है? इन सभी कार्यों में सार्वजनिक धन का इस्तेमाल होता है। यह हैरानी की बात है कि संघ संपूर्ण हिंदू आस्था के प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, उसे स्वयं अपने संगठन के बराबर मानता है। दोनों को एक मानने का मतलब है कि आरएसएस के बारे में पूछे गए किसी भी सवाल को धर्म के लिए चुनौती माना जाता है और कोई सवाल नहीं पूछा जाता। यह बेईमानी है और इससे संघ की अच्छी छवि नहीं बनती।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि कानून के तहत आरएसएस को 'लोगों के एक समूहÓ के तौर पर पहचाना जाता है और इसे रजिस्टर कराने की कोई कानूनी मजबूरी नहीं है। यह बात संविधान के आर्टिकल 19(1)(सी) से जुड़ी है जो उचित पाबंदियों के साथ संगठन बनाने की आज़ादी देता है। 1994 के एक मामले के आधार पर टैक्स से छूट का दावा भी संघ करता है। उस मामले में पटना हाईकोर्ट ने एक सीमित बात पर फैसला सुनाया था कि 'आपसी सहभागिता का सिद्धांतÓ (प्रिंसिपल ऑफ म्यूचुअलिटी) के तहत संघ की किसी यूनिट को अपने सदस्यों से मिली गुरुदक्षिणा पर टैक्स नहीं लगेगा। टैक्स विभाग ने 1967-68 से 1975-76 तक के नौ सालों में आय की जो गणना की थी वह सालाना 15,000 रुपये से 71,000 रुपये के बीच थी जिससे यह एक छोटे एवं सीमित प्रभाव वाले संगठन जैसी दिखता था। उस मामले में रजिस्ट्रेशन का मुद्दा कोर्ट के सामने नहीं था और उसके बाद भी यह मुद्दा कभी नहीं उठा। कराधान की स्थिति का मुद्दा भी नहीं उठा।
फिर भी, लचीलेपन और आनुपातिकता के आम तौर पर माने जाने वाले सिद्धांत यह बताते हैं कि जैसे-जैसे आकार बढ़ता है तथा ढांचा जटिल होता है, गवर्नेंस या कामकाज के नियम सख्त होने चाहिए। एक निश्चित आय सीमा से ऊपर वाले चैरिटेबल ट्रस्ट को अपने अकाउंट्स का ऑडिट कराना होता है, राजनीतिक दलों को एक सीमा से ज़्यादा मिले दान की जानकारी देनी होती है तथा एक निश्चित सीमा से ऊपर वाली कंपनियों को अपने सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) खर्च की रिपोर्ट देनी होती है। आपसी सहयोग से काम करने वाला कोई स्थानीय ग्रुप तो अंदरूनी सेल्फ-चेक के साथ काम कर सकता है लेकिन अगर वह एक बड़े आंदोलन का रूप ले ले और देश भर में उसके ऑफिस हों तो जनता को यह पूछने का हक है कि धन कैसे जुटाया जाता है, कैसे खर्च किया जाता है और उसका प्रबंधन कैसे होता है।
उदाहरण के लिए, आरएसएस की बिल्डिंग और कार्यालयों का मालिक कौन है? इसकी तुलना आम नागरिकों की जांच-पड़ताल से करते हैं तो घरेलू कामगारों को पुलिस जांच करानी पड़ती है, कुछ इलाकों में किराएदार के एग्रीमेंट को पुलिस के पास रजिस्टर कराना ज़रूरी होता है तथा हाउसिंग सोसायटियों को हर साल अपने अकाउंट्स सदस्यों के सामने रखने होते हैं। मतलब आम नागरिकों के लिए गवर्नेंस के कड़े नियम हैं लेकिन देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के तौर पर आरएसएस ने कहा है कि वह न तो रजिस्टर कराएगी और न ही अकाउंट्स दाखिल करेगी। इतने बड़े आकार का और मौजूदा सरकार तक इतनी पहुंच रखने वाला कोई दूसरा संगठन उन नियमों के दायरे से बाहर काम नहीं करता जो देश के बाकी हिस्सों पर लागू होते हैं। यह संघ का 'एक्सेप्शनलिज़्मÓ (खास दर्जा) है और ऐसा कोई कारण नहीं है कि इसे जारी रहने दिया जाए।
कानून या जनता के भरोसे से जुड़े मुद्दों को छोड़ दें तो भी खड़गे के सवाल राजनीतिक रूप से अहम हैं। संघ के लिए हालात पहले से कहीं बेहतर हैं। उसकी गतिविधियां बढ़ रही हैं, सत्ता के गलियारों में संघ की चिंताओं को सुना और उन पर अमल किया जाता है। कई लोग आरएसएस को सरकार के कई फैसलों को आकार देने वाली एक ताकतवर शक्ति के तौर पर देखते हैं। संघ की सालाना रिपोर्ट में इसकी गतिविधियों के दायरे और संख्या का ब्यौरा तो मिलता है लेकिन पैसों का हिसाब-किताब नहीं बताया जाता। इसने प्रभाव के नए क्षेत्र भी बनाए हैं। मुंबई की 222 साल पुरानी मशहूर 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबईÓ लाइब्रेरी के चुनाव में संघ से जुड़े उम्मीदवारों ने बड़ी जीत हासिल की है, तो वहीं दूसरे लोग महाराष्ट्र के गणेश उत्सव मंडलों में अपनी पैठ बना चुके हैं।
फिर भी, यह प्रभाव, यह चमक-धमक और यहां तक कि संघ प्रमुख की सुरक्षा में तैनात कमांडो भी इसलिए हैं क्योंकि आरएसएस आखिरकार बीजेपी से जुड़ी हुई है। कहने की ज़रूरत नहीं कि दोनों को एक-दूसरे से फायदा हुआ है- संघ ने बीजेपी के लिए लोगों को एकजुट किया तथा बीजेपी ने आरएसएस को भौतिक सुख-सुविधाएं दीं और उसकी लंबे समय से चली आ रही इच्छाओं-महत्वांकाक्षाओं को पूरा किया। उम्मीद है कि दोनों ही खड़गे को कड़ा जवाब देंगे।
इसके साथ ही आरएसएस पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल स्थिति में भी है। खासकर जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद यह बीजेपी की आलोचना से बच नहीं सकती और इस हद तक इसे खुद भी कुछ कड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा। आम तौर पर ऐसा ही माना जाता है कि भारी प्रभाव एवं नियंत्रण के बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाओं, शासन के मानकों और सेवा वितरण में आई भारी गिरावट में आरएसएस या तो मूकदर्शक रही है या फिर सक्रिय भागीदार। खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चुनौती देने के लिए इसी राजनीतिक मौके को चुना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)