भारत की युवाशक्ति का सबसे पवित्र तीर्थ!

जनपथ मेट्रो से टॉलस्टाय मार्ग तक, पूरी जंतर मंतर रोड, फिर कनाट प्लेस के आउटसर सर्किल के रीगल सिनेमा, पिंड बलूची प्वाइंट से संसद मार्ग तक सड़क खचाखच भरी है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-23 21:40 GMT
  • संदीप सिंह

जनपथ मेट्रो से टॉलस्टाय मार्ग तक, पूरी जंतर मंतर रोड, फिर कनाट प्लेस के आउटसर सर्किल के रीगल सिनेमा, पिंड बलूची प्वाइंट से संसद मार्ग तक सड़क खचाखच भरी है। आसपास के दो किलोमीटर इलाके में युवा चींटियों की तरह बिखरे हुए हैं। पूरे इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। कनॉट प्लेस में भी नेट बंद है।

जंतर मंतर पर अब कुछ ऐसा हो रहा है जो मुल्कों के जीवन में यदाकदा होता है। एक पूरी पीढ़ी की राजनीतिक और नैतिक दीक्षा हो रही है। एक ऐसी फ़ौज तैयार हो रही है जिसकी सामूहिक शक्ति के सामने बड़े-बड़े दलों की तथाकथित चुनावी मशीन ताश के पत्तों की तरह भहरा जाएगी। जो काम पिछले दस साल में नहीं हुआ था वह पिछले एक हफ़्ते में हो गया। भारत के युवा ने अपनी आवाज सुना दी है। उसने अपना मैसेज दे दिया है, उसे ये व्यवस्था नहीं चाहिए उसे बदलाव चाहिए।

आगे क्या होगा, नहीं होगा यह अब आपके ऊपर है- अब यह नीट और पेपर लीक को लेकर चल रहा एक प्रदर्शन मात्र नहीं रह गया है। वह मुद्दा है मगर बात इसके आगे चली गई है। अब यह युवा गुस्से, युवा बेबसी, उनकी बेरोजगारी, उनकी चिढ़, उनके साहस, उनके अल्हड़पन, उनकी सामूहिकता के साथ-साथ उनकी मस्ती का बहुत समझदार और शांत दावानल बनता जा रहा है। अब यह भारत की युवाशक्ति का सेलिब्रेशन है। जंतर मंतर आज भारत की युवा शक्ति का सबसे पवित्र तीर्थ है। इस समय यह संसार की सबसे सुंदर जगह है।

कल्पना कीजिए जैसे किसी ज्वालामुखी का मुंह खुल गया हो और ता•ाा लावा सड़कों पर फैलता जा रहा है। इस लावे की गर्मी हमारे लोकतंत्र पर जमी हुई बर्फ़ को पिघलाती जा रही है। मगर याद रखिए, यह विध्वंस का नहीं निर्माण का ज्वालामुखी है। यह शरीर को जला नहीं रहा, मन को शांति दे रहा है। 20 जुलाई को युवा भीड़ का आंकड़ा लाख का पैमाना छू रहा था। दमन के बाद भी हज़ारों की भीड़ मैदान छोड़ने का नाम नहीं ले रही है। युवा भीड़ का 90प्रतिशत से अधिक हिस्सा जीवन में पहली बार जंतर मंतर या किसी आंदोलन में आया था। मगर इनमें डर का नामोनिशान नहीं था। पुलिस की लाख पिटाई के बावजूद वे सागर की लहरों की भांति बार-बार लौटकर प्रदर्शन करना शुरू कर दे रहे थे। आंदोलन फीका पड़ने की बजाय चमकता जा रहा है।

हज़ारों नए छात्र अपना बस्ता उठाये देश के कोने-कोने से आते जा रहे हैं। चींटियों की तरह रास्तों पर चले आ रहे बच्चों का तांता टूटने का नाम नहीं ले रहा। मुझे लग रहा है आज रात होते-होते तक यह युवा सैलाब लाख का आंकड़ा पार कर जाएगा। मुझे चिंता भी हो रही है। इसका क्या होगा। अब ये आंदोलन किधर जाएगा। अब यह न कॉकरोच कोर टीम के कंट्रोल में हैं न किसी दल के। शायद अब यह सोनम के कंट्रोल में भी नहीं। हालांकि मेरा मानना है कि सोनम की नैतिक अपील इन युवाओं में सबसे ज़्यादा है।

जिन लोगों ने सोचा था कि 20 जुलाई के बाद यह आंदोलन समेट लिया जाएगा, शायद इनके कुछ नेताओं को भी ऐसा कुछ अंदा•ाा रहा हो- यहां मामला हाथ से बाहर चला गया है। मिज़ार्पुर, इटावा, जयपुर, इंदौर, बैंगलोर, प्रतापगढ़, गोरखपुर, सीतामढ़ी, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दरभंगा, पटना, आरा-अजमेर, बीकानेर, गढ़वाल और जाने कहां- कहां से बच्चे चले आ रहे हैं। अब यह जंगल की आग है। बुझाए न बुझेगी। यह व्यवस्था के कूड़े कचरे की गंध को जला देगी। अब यह किसी को लेकर जाएगी। या अपने ख़ून में बुझेगी।

जनपथ मेट्रो से टॉलस्टाय मार्ग तक, पूरी जंतर मंतर रोड, फिर कनाट प्लेस के आउटसर सर्किल के रीगल सिनेमा, पिंड बलूची प्वाइंट से संसद मार्ग तक सड़क खचाखच भरी है। आसपास के दो किलोमीटर इलाके में युवा चींटियों की तरह बिखरे हुए हैं। पूरे इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। कनॉट प्लेस में भी नेट बंद है। दिल्ली पुलिस और आरएएफ के सिपाही बैरिकेड लगाते-लगाते थक जा रहे हैं मगर भीड़ में दूध का उबाल आता जा रहा है। अंदर सांस लेना मुश्किल है। बच्चे मुख्य एरिया में जाते हैं, कुछ देर वहां रहते हैं, फिर बाहर आकर सांस लेते हैं फिर अंदर चले जाते हैं। लगातार कुछ लोग वापस अपने घरों या ठिकानों को लौट रहे हैं मगर जाने वालों से दस गुना ज़्यादा नए बच्चे चले आ रहे हैं।

आज से सरकार आने-जाने के रास्तों पर सख्ती और बैरिकेड बढ़ाती जा रही है। वो चाहते हैं यहां युवा ना आयें। आसपास के 16 मेट्रो स्टेशन बंद हैं। आरएएफ और सीआरपीएफ की बीस कंपनियां आज और बुला ली गईं हैं। जंतर मंतर के आसपास का इलाक़ा चोक हो रहा है। शायद जानबूझ कर चोक किया जा रहा है। शायद सरकार चाहती है कि युवा रियेक्ट करें।

मगर स्वयं से ही ऐसी अनुशासित, संयमित और सकारात्मक युवा जमात मैंने अपने जीवन में नहीं देखी। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आकर इनको देखना चाहिए, प्रेरणा लेनी चाहिए और सीखना चाहिए। ये युवाशक्ति एक अद्भुत स्व संयोजन की मशीन बन चुकी है। किसी ज़्यादा गुस्सैल लड़के को सब तुरंत समझा दे रहे हैं। आंदोलन का प्राण और की सबसे साहसी शक्ति लड़कियां हैं। वे ज़्यादा बोल नहीं रहीं। मगर हर काम को चुपचाप अंजाम दे रही हैं। हमारे समाज की तरह यहां भी उनकी मौन शक्ति, संयम और साहस पूरे परिवेश को बांधे हुए हैं। वे इस आंदोलन की सबसे गंभीर शक्ति हैं।

पुलिस के आक्रामक होने पर रियेक्ट करने के बजाय या भागने के बजाय युवा हाथ जोड़कर प्रार्थना कर ले रहे हैं, फूल दे रहे हैं, राष्ट्रगान गाने लगते हैं। असामाजिक तत्वों को देखते ही पकड़कर मुख्य स्थल से बाहर निकाल दे रहे हैं। मंच से किसी को कोई आवाज़ नहीं आती। मंच के आगे बैठे तीन-चार हज़ार बच्चों को ही वहां हो रहे भाषण और निर्देश सुनाई देते हैं। अस्सी प्रतिशत से अधिक भीड़ स्वप्रेरणा से संयोजन और प्रबंधन का काम हाथ में ले चुकी है। यह सिर्फ़ युवा आंदोलन नहीं है अब यह युवा रचनात्मकता का विस्फोट है। इतनी सुंदर ग्रैफिटी, इतने चुटीले नारे, व्यंग्य, मारक वन लाइनर्स इस समय देश में किसी और के पास शायद नहीं हैं।

20 जुलाई के बाद एक बहुत सुंदर चीज हुई है। अब इसे समाज ने अपनी हथेली पर बैठा लिया है। 20 जुलाई को जो बर्बरता युवाओं पर हुई शायद उसने समाज को झकझोर दिया। 20 जुलाई की रात हज़ारों बच्चे बिना खाना-पानी के, बारिश में भीगते रहे, सैंकड़ों अस्पतालों में फंसे रहे, 200 से ज़्यादा एमएलसी हुईं, दर्जनों के हाथ-पैर टूटे- युवाओं पर की गई सरकार की बरजोरी ने जैसे समाज को नींद से जगा दिया हो। जैसे किसी अपराधबोध से त्रस्त होकर लोग घरों से बाहर निकल आये हों और युवाओं की मदद का सामान लेकर निकल पड़ें हों।

हर घंटे तक़रीबन सैंकड़ों डिलीवरी वर्कर्स खाने के ऑर्डर लेकर आ रहे हैं। ये ऑर्डर उन्हें चंडीगढ़, मुंबई, लखनऊ, कानपुर, बेंगलुरु, जयपुर और छोटे-छोटे शहरों से आ रहे हैं। 100-100 बिरयानी या पिज्जे के ऑर्डर के बीच की 80 रुपएकी एक सिंगल बिरयानी या एक सिंगल पराठा का ऑर्डर भी कोई भेज रहा है। शायद उसकी उतनी ही कैपेसिटी हो। ऐसा लग रहा है कि ऑर्डर करने की कोई होड़ मची है कि कहीं मैं छूट न जाऊं।

एनडीएफसी ने दो दिनों से कूड़ा नहीं उठाया है। मुख्य एरिया में इतनी बदबू और इतना सफोकेशन है कि लोग उल्टियां कर दे रहे हैं। मगर जगह नहीं छोड़ रहे हैं। गर्मी और उमस से हर बच्चे का चेहरा लाल है, कपड़े पसीने में लबालब हैं और माथे से पसीना चू रहा है। इसी भीड़ में सलोने और सुंदर चेहरों वाली बच्चियां और लड़के मुंह पर मास्क लगाए हाथ में बड़ी सी गारबेज पन्नी लिए कूड़ा इक_ा कर रहे हैं। कोई-कोई महिला 20-20 वाइपर और कोई पांच-दस झाड़ू लेकर आ रहा है कि वहां गंदगी साफ़ की जा सके। अधेड़ उम्र की औरतें आते-जाते अनजान बच्चों को पंखा झाल रही हैं। सैंकड़ों लेकर पानी की बोतलें बांट रहे हैं।

एक आइसक्रीम वाला साइकिल पर आता है और अपनी पेटी का मुंह खोल देता है। गर्मी से मचल रहे बच्चे पांच मिनट में उसकी सारी आइसक्रीम खा जाते हैं। मुफ़्त में क्यों अपनी रोज़ी बांट रहे हो पूछने पर कहता है कि 'हमारे भी बच्चे हैं'।

आप कल्पना कीजिए सैंकड़ों औरतें छात्रों को पंखा झल रही हैं। सैंकड़ों-हज़ारों अभिभावक केला, पानी, बिस्किट, कोल्डड्रिंक जो भी खाने- पीने का सामान वे ला सकते हैं ला रहे हैं। वीडियो बना कर मंच से अपील की जा रही है कि लोग और खाना न भेजें। इतना खाना आ रहा है कि हर पांच मिनट में कोई आपसे पूछ रहा है- 'अंकल खाना खाएंगे?' कई बार मैं ऐसे समूह में खड़ा होता हूं जहां सबसे उम्रदरा•ा मैं हूं। उनकी बातें सुनता हूं, विचारों को स्पष्ट देखता हूं- मेरी आंख में आंसू आ जाते हैं। दिल और दिमाग़ की बैटरी फुल चार्ज हो जाती है। किसी को हो तो हो मुझे इसमें कोई गलतफहमी नहीं है कि सीजेपी की कोर टीम चाहकर भी अब इन बच्चों को किसी ख़ास दिशा में डाइवर्ट कर पायेगी। दायें-बायें होते ही, ये बच्चे उनको मंच से उतार कर नीचे बैठा देंगे या भगा देंगे। इनकी स्पष्टता सूरज की रौशनी की तरह साफ़ है। उन्हें पता है वे किससे लड़ रहे हैं, उन्हें पता है उनका शत्रु कितना मजबूत है, वह उनके साथ क्या-क्या कर सकता है, उनके नेताओं को तोड़-मरोड़ या खरीद सकता है। उन्हें सब पता है- वे सिर्फ़ दीपके के बुलाने से यहां नहीं आए हैं- कइयों को दीपके का नाम भी पता। ये अब उनका मंच है, ये युवाओं की जंग है, ये उनका आंदोलन है। वे रियल कॉकरोच हैं। इनको कोई मार नहीं पाएगा।

(22 जुलाई, शाम 7 बजे, जंतर मंतर पर लिखी पोस्ट) 

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