फ्रीजर के शिवलिंग और वैज्ञानिक चेतना

देश में वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कितनी तेजी से पतन हो रहा है, इसके दो उदाहरण हाल में देखने मिले।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-15 21:30 GMT

ये समस्या आज की नहीं है, सदियों से अंधविश्वास और कुरीतियों की जकड़न मौजूद रही है, लेकिन संविधान में इस जकड़न को दूर करने का उपाय बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद ५१ ए (एच) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा ज्ञानार्जन और सुधार की भावना विकसित करे।

देश में वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कितनी तेजी से पतन हो रहा है, इसके दो उदाहरण हाल में देखने मिले। आगरा में एक परिवार ने अपने फ्रीजर में बर्फ की एक ऐसी आकृति देखी, जो अमरनाथ के हिमलिंग जैसी प्रतीत हो रही थी। इस समय अमरनाथ यात्रा चल भी रही है, लिहाजा जैसे ही यह खबर मिली कि फ्रीजर में शिवलिंग जैसी आकृ ति बनी है, उस घर में लोगों की भारी भीड़ जुटने लगी। इसे चमत्कार मानते हुए श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना शुरू कर दी, भगवान शिव का चमत्कार मानते हुए 'हर-हर महादेव' के जयकारे लगने लगे और भजन-कीर्तन शुरु हो गया। अब ये पता नहीं कि इतनी देर तक फ्रीजर खुला रहने पर वह हिमलिंग कब तक टिका रहा, लेकिन समाज में धर्मांधता के दर्शन इस प्रकरण में हो गए।

असल में कुछ कंपनियों के फ्रिज में फ्रीजर के अंदर जमने वाली बर्फ को पिघलाने के लिए एक अलग से बटन होता है, यदि समय पर इसे साफ न किया जाए या दरवाजा ठीक से बंद न होने पर नमी अंदर जाती रहे, तो फ्रीजर के तापमान और नमी के कारण बर्फ जम जाती है, जो किसी भी आकार में जम सकती है। आगरा में यह संयोग से शिवलिंग के आकार की जम गई, जो कोई अनोखी बात नहीं है। कई बार आप बादलों को देखें तो उसमें तरह-तरह की आकृति नजर आती है, जो असल में हमारे मन की उपज होती है। फ्रीजर की बर्फ को शिवलिंग मानना भी मन में उपजा विचार ही था, जिसे उपेक्षित किया जा सकता था। लेकिन धर्मांध, धर्मभीरू बन गए समाज में अब यह बात मुश्किल लगती है। जिन लोगों को फ्रीजर में बाबा बर्फानी के दर्शन कर सुख मिला, शायद उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अमरनाथ में प्राकृतिक रूप से बर्फ से बनने वाले शिवलिंग का आकार छोटा हो गया है। ५७ दिन की यात्रा पूरी होने से पहले ही बर्फ का शिवलिंग ९० प्रतिशत से ज्यादा पिघल गया है। विशेषज्ञों ने लगातार चेतावनी दी है कि हिमालयी पर्वत श्रृंखला दुनिया के औसत से भी तेज गर्म हो रही है। अमरनाथ गुफा और आसपास के ग्लेशियरों के पास असामान्य रूप से तापमान उस सीमा से ऊपर चला गया है जो कि बर्फ को बनाए रखने के लिए जरूरी है। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि अपनी मान्यताओं के चक्कर में हम प्रकृति की स्वाभाविक बुनावट से छेड़छाड़ कर रहे हैं। जरूरत से ज्यादा पर्यटकों का पहुंचना, गुफा के भीतर पूजा-पाठ के कारण होने वाली गर्मी इन सबके कारण प्राकृतिक संरचना को नुकसान हो रहा है। लेकिन धर्म में मानसिक तौर पर अंधा समाज यह समझना ही नहीं चाहता है।

उत्तरप्रदेश से ही अंधविश्वास का एक और उदाहरण पिछले महीने सामने आया था, जब श्रावस्ती जिले के एक गांव में खेत में एक गाय लगातार कुछ दिनों तक चक्कर काटती रही। इसे दैवीय कृपा या गोवर्धन परिक्रमा समझ कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। आसपास के गांवों से भीड़ जुटने लगी तो भंडारे भी आयोजित हुए। लेकिन पशु चिकित्सकों की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि पशुओं में होने वाली एक गंभीर बैक्टीरियल बीमारी का असर था, जो उनके मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। इस बीमारी से ग्रस्त होने पर जानवर अपना संतुलन खो देते हैं और एक ही दिशा में गोल-गोल घूमने लगते हैं। गनीमत है कि उस गाय का इलाज किया गया और लोगों को सच पता चला। लेकिन सच सामने देखकर भी अनदेखी शक्ति पर भरोसा करें, ऐसा ही हमारा समाज हो चुका है।

ये समस्या आज की नहीं है, सदियों से अंधविश्वास और कुरीतियों की जकड़न मौजूद रही है, लेकिन संविधान में इस जकड़न को दूर करने का उपाय बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद ५१ ए (एच) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा ज्ञानार्जन और सुधार की भावना विकसित करे। इस अनुच्छेद के जरिए यह उम्मीद की गई कि इससे समाज में फैली कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को कम करने में मदद मिलेगी। लोगों में जिज्ञासा, खुलापन और सुधार की भावना पैदा होगी, साथ ही इंसानी मूल्यों और भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह सब तब हो पाएगा, जब सरकार का जोर भी संविधान के अनुरूप शासन में हो। जब हम रोजाना यही देखेंगे कि हमारे प्रधानमंत्री किसी न किसी मंदिर में पूजा-पाठ कर रहे हैं, डमरू बजा रहे हैं, बाकी मुख्यमंत्री, नेता, अधिकारी भी पूजा करने को ही सर्वोच्च कर्तव्य मानने लगे हैं, तो फिर संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना और वैज्ञानिक सोच का प्रसार ऐसे लोग करेंगे, यह मानना मूर्खता ही होगी।

प.नेहरू का इस मामले में एकदम स्पष्ट विचार था कि धार्मिक मान्यताओं का पालन निजी तौर पर किया जाए, उसका सार्वजनिक प्रदर्शन न हो। लेकिन आज उस बात को कोई नहीं मानता, कांग्रेसी भी नहीं और भाजपाई तो बिलकुल ही नहीं। बल्कि भाजपा का तो भला इसी में है कि लोग धर्म के नाम पर डरपोक और दब्बू बने रहें। सवाल पूछने का साहस खो दें, ताकि उनकी सत्ता पर कोई अड़चन न आए। अभी राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का इतना बड़ा प्रकरण हो गया, देश के दूसरे मंदिरों में भी ऐसी ही चोरियों की खबर आ रही है, तो कायदे से समाज को समझना चाहिए कि उसे धर्म के नाम पर डराने का मकसद यही था कि उसके बूते सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी जाएं। यह कोशिश कई बरसों से होती आई है। परसाई जी ने अपने लेख अंधविश्वास से वैज्ञानिक दृष्टि में लिखा है कि ...दो साल पहले मध्य प्रदेश और राजस्थान के पत्तों पर सांप के आकार बन गये थे। बात फैली कि नाग देवता पत्तों पर प्रकट हो गए हैं। वे सेवा मांगते हैं। नहीं करोगे तो काट लेंगे। तमाम लोग नाग से डरने लगे। उन पत्तों से डरने लगे। पत्तों के पास दूध के कटोरे रखे जाने लगे। भजन कीर्तन होने लगे। कहीं वनस्पति-विज्ञान की एक छात्रा ने सुन लिया। उसने बगीचे से उन्हीं नाग वाले पत्तों को तोड़कर सब्जी बनाकर परिवार को खिला दी। शाम को परिवार को बताया कि मैंने सबको नाग पकाकर खिला दिए और कुछ नहीं हुआ। तब कृषि विश्वविद्यालय के आचार्यों के बयान आये कि यह पत्तों की बीमारी है जिसमें सांप की आकृति बन जाती है।

इसी लेख में आगे उन्होंने लिखा कि ...कई साल पहले एक दिन आया, जब आठ ग्रहों के एक ही कक्षा में होने का योग था। यह मात्र भौतिक संयोग था। इसमें दैवी कुछ नहीं था। पर महीने-भर पहले से पुरोहित-वर्ग ने हल्ला मचाया कि महाभारत के काल के बाद अब ये योग आया है। बड़ा अनिष्टकारी हो सकता है। महीने भर पूजा-पाठ, कीर्तन, भजन होते रहे। अंधविश्वासियों का कितना पैसा इस बहाने लूट लिया गया, कोई हिसाब नहीं। प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू ने इस सबको गलत और अवैज्ञानिक बताया। पर इसका कुछ असर नहीं हुआ। वैसे ही अनुष्ठान चलते रहे।

याद कीजिए कि जब प्रयागराज में महाकुंभ हुआ था, तब भी ऐसा ही कहा गया था कि १४४ वर्षों बाद ऐसा योग बना है। सरकार के स्तर पर बड़े पैमाने पर इसका प्रचार हुआ, नतीजा ये रहा कि भारी भीड़ उमड़ी, जिसे संभालने की क्षमता सरकार में नहीं थी। इसके बाद प्रयागराज से लेकर दिल्ली तक जो भगदड़ें मचीं और जितने लोगों की जानें गईं, उसका हिसाब देना भी सरकार ने जरूरी नहीं समझा। सवाल किया जा सकता है कि जब ग्रहों-नक्षत्रों का हिसाब लगाया गया तो जीते-जागते अपने नागरिकों का सही हिसाब सरकार क्यों नहीं कर पाई। नेहरू जी ने तो आठ ग्रहों के एक कक्षा में आने पर पूजा-पाठ को अवैज्ञानिक बताया। लेकिन आज ऐसा हो तो पता चलेगा कि नरेन्द्र मोदी खुद अनुष्ठानों में बैठे हैं।

इस तरह हम कैसे भारत को सही अर्थों में विकसित कर पाएंगे। सबसे पहले तो समाज में प्रगतिशील और तर्कवादी दृष्टिकोण विकसित करना होगा। दुनिया में शक्तिशाली बने सभी देश इस समय यही कर रहे हैं, अमेरिका, रूस, चीन, जापान, फ्रांस, इटली, जर्मनी ऐसे तमाम देशों में नए प्रयोगों से जीवन को उन्नत और आसान बनाने की कोशिशें हो रही हैं। इन देशों में भी समाज के बहुत से लोग अंधविश्वासी हैं, धर्म के नाम पर यहां भी झगड़ें हैं, विवाद हैं। मगर फिर भी नयी पीढ़ी के लिए पढ़ने, शोध करने, विचारों की स्वतंत्रता के साथ जीने के अवसर हैं। इसलिए प्रगति कर चुके देश सही अर्थों में २१वीं सदी में जी रहे हैं और हमारे समाज का बड़ा हिस्सा अतीत के उस दौर में जी रहा है, जब यह नहीं पता था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है और दिन-रात का होना दैवीय चमत्कार नहीं है। हालांकि जब इंसान को यह नहीं पता था, तो उसने पता लगाने की कोशिश की। जंतर-मंतर इसका गवाह है। धर्म में बढ़ते कर्मकांडों के कारण बौद्ध और जैन धर्म का प्रतिपादन इसका गवाह है। कट्टरता के खिलाफ खड़े होकर बेबाकी से तर्कवादी विचार देते भक्तियुग के कवि इसके गवाह हैं। इन सब की वजह से भारत में वैज्ञानिक चेतना आई, पर अब हम फ्रीजर में बने शिवलिंग की पूजा को ही धर्म मानने लगे हैं। सोचिए किस तरह जय भारत कहेंगे।

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