क्या है, 'आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस' यानी 'कृत्रिम बुद्धि'

यह ज़रूरी नहीं है कि 'एआई' के तहत बनाई गई मशीनें हमेशा इंसानी दिमाग और समझ पर ही आधारित हों।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-12 21:30 GMT
  • हरजिंदर सिंह 'लाल्टू'

यह ज़रूरी नहीं है कि 'एआई' के तहत बनाई गई मशीनें हमेशा इंसानी दिमाग और समझ पर ही आधारित हों। आखिर एक कंप्यूटर जिस विशाल मात्रा में आंकड़े समेट सकता है और जितनी तेज़ी से गणनाएं कर सकता है, वह इंसान की काबिलियत से कहीं ज़्यादा है। ऐसा मुमकिन है कि हमारे दिमाग अपने आकार और अंदरूनी खाके की वजह से एक दायरे में बंधे हैं और 'एआई' कभी ऐसी मशीनें बना दे जो समझ में इंसानों से कहीं आगे की हों।

आजकल हर कहीं 'एआई' का बोलबाला है। आखिर यह क्या बला है? चेक नाटककार कारेल चापेक ने 1920 में एक नाटक लिखा था- 'आरयूआर' (रोसुमोवी युनिवर्सालनी रोबोती)। इसका अर्थ है- 'रोसुमोव के सार्वभौमिक रोबोट।' नाटक में रोसुमोव एक वैज्ञानिक हैं जिनकी कंपनी इंसान जैसी दिखने वाली रोबोट मशीनें बनाती है। रोबोट एक चेक शब्द है जिसका अर्थ होता है- बंधुआ मज़दूर। चापेक के नाटक के बाद से मशीनों में इंसान जैसी काबिलियत की चर्चाएं गाहे-बगाहे होती रही हैं।

पिछली सदी के छठे दशक में ये चर्चाएं कल्पनालोक से निकलकर विज्ञान के दायरे में संजीदा सवाल बनकर तब सामने आईं, जब आधुनिक कंप्यूटर बनने लगे। इनमें सिलिकॉन टेक्नॉलॉजी से बने ट्रांज़िस्टरों की मदद से तेज़ी से गणनाएं मुमकिन होने लगीं। जैसे-जैसे कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी गणनाओं से इतर तमाम दूसरे क्षेत्रों में प्रभाव डालने लगी और सूचना यानी इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी का कारवां बढ़ा, 'एआई' पर शोध भी तेज़ी से होने लगा। नई-नई मशीनें बनीं, खास तौर पर फिल्मों में इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखलाया गया। 'रोबोट' लफ्ज़ घरेलू बातचीत का हिस्सा बन गया।

मेडिकल रिसर्च में रोबोट का इस्तेमाल आम हो गया है और हर दिन किसी नई खोज का पता चलता है। इंसानी काबिलियत से कहीं आगे बढ़कर आंकड़ों से मानीखेज़ जानकारी ढूंढ निकालने का काम कंप्यूटर कई दशकों से कर ही रहे हैं, जिससे नई दवाइयां बनाने में बड़ी तरक्की हुई है। इनके साथ तबाही के हथियारों में भी 'एआई' का इस्तेमाल हो रहा है और नए किस्म के कंप्यूटर से चलने वाले ड्रोन या लेज़र-गन या मिसाइल आदि अब आम हथियारों में शामिल हो गए हैं, जिनके ज़रिए कोई मुल्क धरती पर कहीं भी कहर बरपा सकता है।

जाहिर है, 'एआई' का ताना-बाना पूरी तरह कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी से जुड़ा है। कंप्यूटर तो आजकल हर कहीं है; मोबाइल फोन से लेकर आर्थिक लेन-देन तक। लिहाज़ा 'एआई' भी हर कहीं है। 'एआई' का सबसे बुनियादी सवाल मशीन को इंसानी बुद्धि कैसे मिले नहीं है, बल्कि यह है कि इंसान या दूसरे जानवरों को कैसे एक मशीन की तरह समझा जा सके। कई बार बेजान लगती चीज़ें भी ऐसा कमाल कर जाती हैं, जिससे ज़िंदा होने का गुमान होता है। ऐसी चीज़ों को 'एजेंट' (यानी अभिकर्ता) कहा जाता है। 'एजेंट' किसे कहें, वे क्या कर सकते हैं, ये सवाल विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के तो हैं ही, साथ ही गहन दार्शनिक भी हैं।

'एजेंट' शब्द से इंसान की कल्पना होती है, पर 'एआई' में 'एजेंट' का मतलब ऐसा कुछ भी हो सकता है, जिससे कोई कार्रवाई शुरू हो जाए। मसलन वह रोबोट जैसी मशीन हो सकती है जो भौतिक स्तर पर अपने इर्द-गिर्द हरकत करती हो, या वह महज़ एक कंप्यूटर-प्रोग्राम हो सकता है, जो की बोर्ड पर बटन दबाकर लिखा गया हो या जिसे किसी और कंप्यूटर-प्रोग्राम के ज़रिए लिखा गया हो और जिसे सक्रिय कर कोई कार्रवाई शुरू हो सकती है। यानी 'एजेंट' असली या आभासी दोनों हो सकते हैं। जाहिर है, असल और आभासी तय करना हमेशा आसान नहीं होता।

यहीं पर चेतना के विज्ञान के साथ 'एआई' की टक्कर होती है। दर्शन का एक चिरंतन सवाल है कि हम जो कुछ करते हैं, क्या वह अपनी मज़ीर् से करते हैं या कोई और हमसे करवाता है। हम जानते हैं कि सही-गलत हर तरह के खयाल हमारे मन में आते हैं, पर क्या करना है और क्या नहीं, यह फैसला हमारे हाथ में होता है। एक रोबोट ऐसा फैसला नहीं कर सकता। हालांकि ऐसे दावे किए गए हैं कि हाल के रोबोट में इस तरह के फैसले लेने की काबिलियत मुमकिन हो पाई है, पर ऐसे दावे अभी तक गलत ही साबित होते रहे हैं।

इंसानों में भी 'एजेंटों' जैसी फितरत पाई जाती है, लेकिन इसका एक पहलू और भी है। जैसे एक चींटी को समझना मुश्किल होता है, मज़दूर चींटियों और रानी समेत पूरे चींटी समाज को देखने पर ही पता चलता है कि कतार में जा रही चींटियां आखिर क्या कर रही हैं। इसी तरह अकेले एक इंसान को जानकर हम सामाजिक, जातिगत या राष्ट्रवादी गतिविधियों को नहीं समझ सकते। समूह में 'एजेंट' क्यों खास तरह की हरकतें करते हैं, इसको समझना भी 'एआई' में चल रहे शोध का विषय है।

आम तौर पर लोग 'एआई' का मतलब महज तरह-तरह की रोबोट मशीनों को समझते हैं, जिनका अलग-अलग सेक्टर्स में इस्तेमाल हो रहा है। वैज्ञानिक इसे कमज़ोर या 'वीक' 'एआई' कहते हैं। कमज़ोर का मतलब है, जिन सवालों पर काम होता है, वे महज़ टेक्नॉलॉजी की तरक्की और बेहतरी के सवाल हैं। इसके बरक्स मज़बूत या स्ट्रॉन्ग 'एआई' चेतना के विज्ञान से जुड़ता है। यहां इंसान को मशीन की तरह सामने रखते हुए मशीन में इंसानी अकल और समझ कैसे लाई जाए, इस पर काम होता है। अकल और समझ के साथ चेतना, नैतिकता और तमाम जज़्बात भी जुड़ते हैं। जाहिर है, ये बड़े मुश्किल सवाल हैं; इसीलिए इसे मज़बूत 'एआई' कहा जाता है।

ऐसा नहीं है कि कमज़ोर 'एआई' में इंसानी बुद्धि पर काम नहीं होता, पर वहां बुद्धि और समझ के किसी एक पक्ष को सैद्धांतिक रूप से समझकर कंप्यूटर प्रोग्राम के द्वारा उसे मशीन में डालने की कोशिश होती है। जैसे बगैर ड्राइवर के चलने वाली गाड़ियों में तरह-तरह के सेंसर लगे होते हैं, जो सड़क पर आ रहे अवरोधों को कंप्यूटर में दर्ज करते हैं, ताकि उनसे बचाव करने के तरीके अपनाए जा सकें, पर ये इंसानी बुद्धि के एक ही पक्ष यानी आवागमन और उसमें भी महज़ तकनीकी पक्ष पर काम करती मशीनें हैं। एक इंसान गाड़ी चलाते हुए कई विकल्पों पर सोचता रहता है, बीच रास्ते में कहीं जाने या न जाने का फैसला बदल सकता है, रुकने या चलते रहने का फैसला ले सकता है और यह सब कुछ पहले से तय नहीं होता। इंसानी दिमाग की इन जटिलताओं को पकड़ कर हर पल उस पर अमल करे, ये मज़बूत 'एआई' के सवाल हैं।

यह ज़रूरी नहीं है कि 'एआई' के तहत बनाई गई मशीनें हमेशा इंसानी दिमाग और समझ पर ही आधारित हों। आखिर एक कंप्यूटर जिस विशाल मात्रा में आंकड़े समेट सकता है और जितनी तेज़ी से गणनाएं कर सकता है, वह इंसान की काबिलियत से कहीं ज़्यादा है। ऐसा मुमकिन है कि हमारे दिमाग अपने आकार और अंदरूनी खाके की वजह से एक दायरे में बंधे हैं और 'एआई' कभी ऐसी मशीनें बना दे जो समझ में इंसानों से कहीं आगे की हों। कमज़ोर 'एआई' में इंसान और दीगर जानवरों में मौजूद समझ की बुनियाद और दायरों की खोज का नतीजा वे तमाम मशीनें हैं जिनके ज़रिए हमारी ज़िंदगी भौतिक रूप से बेहतर हुई है।

इसके साथ ही इंसान के दिमाग को मशीनों के साथ जोड़कर 'सुपर-इंटेलिजेंट' इंसान की कल्पना पर भी काम हो रहा है। दिमाग की प्रक्रियाएं 'तंत्रिका आवेगों' या 'इंपल्स' के ज़रिए होती हैं जो कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाले 'चिप' की तुलना में बहुत ही धीमी गति से चलते हैं। पिछले कुछ दशकों से शरीर में 'इलेक्ट्रॉनिक चिप' लगाकर कुछ खास तरह की काबिलियत बढ़ाने पर काम हुआ है। मशीनों की कामयाबी से दिमाग के काम करने के तरीकों पर भी समझ बढ़ती है। इससे बुद्धि के दीगर विषयों, जैसे फलसफा, भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान या तंत्रिका विज्ञान में भी तरक्की होती है।

सामाजिक और सियासी दायरों में 'एआई' की घुसपैठ से बड़े बदलाव हो रहे हैं और तरह-तरह के तनाव बढ़ रहे हैं। उत्पादन के क्षेत्र में 'एआई' यानी रोबोट मशीनों के इस्तेमाल से अधेड़ कामगारों की छंटनी बढ़ी है और इसका सीधा असर सियासत पर पड़ा है। मसलन, 2016 में अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के पीछे भी 'एआई' की वजह से लोगों में बढ़ती असुरक्षा की भावना कुछ हद तक ज़िम्मेदार थी। दूसरी ओर सर्विस सेक्टर (जैसे ऑन-लाइन खरीद-फरोख्त आदि) की बढ़ोतरी में 'एआई' की अहम भूमिका है।

(लेखक 'लाल्टू' हिन्दी के सुपरिचित कवि, लेखक व कथाकार हैं। फिलहाल वे आईआईआईटी, हैदराबाद में प्रोफेसर एमेरिटस हैं।)

Tags:    

Similar News