पंजाब के चुनावी प्रचार में राजनीतिक दलों को धार्मिक मुद्दों से बचना चाहिए

समाज को न तो इतिहास के मुश्किल अध्यायों को मिटाना चाहिए और न ही राजनीतिक फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-15 21:40 GMT
  • डॉ. अरुण मित्रा

समाज को न तो इतिहास के मुश्किल अध्यायों को मिटाना चाहिए और न ही राजनीतिक फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए। अतीत का ईमानदारी से अध्ययन किया जाना चाहिए, उस पर तर्कसंगत बहस होनी चाहिए और उसे पूरी तरह से समझा जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां वही गलतियां न दोहराएं।

जिसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, अक्सर लोगों का ध्यान जरूरी सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से हटाने के लिए नए विवाद खड़े किए जाते हैं। बेरोजगारी, कर्ज, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और विकास जैसे मुद्दों पर बात करने के बजाय, राजनीतिक चर्चाओं में ऐसे भावनात्मक मुद्दों का बोलबाला बढ़ रहा है जो समाज में बंटवारा बढ़ाते हैं और सत्ता में बैठे लोगों को चुनावी फायदा पहुंचाते हैं।

पंजाब ने आपसी टकराव की भारी कीमत चुकाई है। १९८० और १९९० के दशक की शुरुआत में राज्य ने अपने इतिहास के सबसे काले दौर का सामना किया। यहां के लोगों ने शांति बहाल करने और समाज को फिर से खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत की है। हालांकि, राज्य का इतिहास सिर्फ टकराव तक ही सीमित नहीं है। यह साहस, बलिदान और संघर्ष का भी इतिहास रहा है।

आजादी के बाद भी पंजाबियों ने राष्ट्र-निर्माण में अहम भूमिका निभाई। आकार में छोटा होने के बावजूद, पंजाब भारत का 'अन्न का कटोरा' (फूड बाउल) बन गया और देश की खाद्य सुरक्षा में बेमिसाल योगदान दिया।

दुर्भाग्य से, १३ अप्रैल १९७८ को अखंड कीर्तनी जत्था, दमदमी टकसाल और निरंकारी समुदाय के बीच टकराव के बाद इतिहास ने एक दुखद मोड़ लिया। इससे अस्थिरता का एक लंबा दौर शुरू हुआ। धीरे-धीरे पंजाब आतंकवाद, अलगाववाद और सरकारी दमन की चपेट में आ गया, जिससे यहां के लोगों को सालों तक हिंसा और डर का सामना करना पड़ा।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, १९८१ और १९९३ के बीच पंजाब में उग्रवाद के कारण २१,३५० लोगों की जानें गईं। इन मुश्किल सालों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के कई कार्यकर्ताओं ने देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा में अपनी जानें दीं और 'न हिंदू राज, न खालिस्तान' का नारा लोकप्रिय बनाया, जो सांप्रदायिक बहुसंख्यकवाद और अलगाववाद, दोनों के विरोध को दर्शाता था। इस पूरे दौर में पंजाब के लोगों ने जो ज़बरदस्त संयम दिखाया, वह भी उतना ही अहम था। पूरे समय के दौरान, और यहां तक कि १९८४ में सिखों के खिलाफ हुए भयानक जनसंहार के बाद भी, पंजाब में कोई जवाबी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ, जो वहां के सामाजिक ताने-बाने की मज़बूती को दिखाता है।

जैसे-जैसे उग्रवाद बढ़ा, चरमपंथी समूहों ने धार्मिक स्थलों को अपनी गतिविधियों के ठिकानों के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बिगड़ते हालात का नतीजा जून १९८४ में 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के रूप में सामने आया। इस सैन्य कार्रवाई ने सिख समुदाय के एक बड़े हिस्से की भावनाओं को गहरी चोट पहुंचाई। हालांकि सरकार ने क्षतिग्रस्त अकाल तख्त का पुनर्निर्माण किया था, लेकिन बाद में सिख समुदाय ने इसे खुद फिर से बनवाया।

इन घटनाओं के बाद आखिरकार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' अपरिहार्य था या कोई और तरीका अपनाया जा सकता था, यह आज भी बहस का विषय है। जिस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, वह यह है कि उस समय पंजाब डर के साये में था। उग्रवादियों ने कर्फ्यू लगा दिए, रोज़मर्रा की ज़िंदगी को नियंत्रित करने वाले फरमान जारी किए, लोगों को स्वतंत्रता दिवस न मनाने का निर्देश दिया और यहां तक कि ड्रेस कोड भी लागू किए, खासकर महिलाओं के लिए। समुदाय या धर्म से परे, लोगों के मन में डर और अविश्वास की गहरी भावना थी।

जब उग्रवाद फिर से बढ़ा, तो १९८६ में अकाली सरकार के तहत 'ऑपरेशन ब्लैक थंडर' शुरू किया गया, जिसके बाद १९८८ में एक लंबा ऑपरेशन चला, जिसमें श्री हरमंदिर साहिब परिसर से उग्रवादियों को सफलतापूर्वक खदेड़ दिया गया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के उलट, ऑपरेशन ब्लैक थंडर को काफी ज़्यादा पारदर्शिता के साथ चलाया गया और नतीजतन, इससे जनता में बहुत कम नाराजग़ी पैदा हुई। अलगाववादी आंदोलन के कुछ हिस्सों को पाकिस्तान और केनडा व यूनाइटेड किंगडम में मौजूद कट्टरपंथी समूहों से आर्थिक और राजनीतिक समर्थन मिला।

इस दौरान केंद्र सरकार के हालात से निपटने के तरीकों में बड़ी कमियां और राज्य की एजेंसियों द्वारा गलत कामों के मामले भी सामने आए। जहां हजारों पुलिसकर्मियों ने आतंकवाद के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, वहीं गैर-कानूनी हत्याओं, लोगों के जबरन गायब किए जाने, गैर-कानूनी वसूली और सत्ता के दुरुपयोग के कई मामले भी सामने आए। इन उल्लंघनों ने लोगों का भरोसा कम किया और नाराजगी बढ़ाई। साथ ही, आतंकवादी समूहों ने आम नागरिकों पर क्रूर हमले किए, जिससे वे लोग उनसे दूर हो गए जिनका वे प्रतिनिधित्व करने का दावा करते थे। जैसे-जैसे लोगों का समर्थन कम होता गया, आतंकवाद धीरे-धीरे कमजोर होता गया और १९९३ तक काफी हद तक खत्म हो गया।

लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने पंजाब की अर्थव्यवस्था को भी बर्बाद कर दिया। डर, अनिश्चितता और अविश्वास के कारण लोगों ने पलायन किया, निवेश कम हुआ, उद्योग कमजोर हुए और आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ गई। इसके सामाजिक नतीजे दशकों बाद भी महसूस किए जा रहे हैं।

इसलिए यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन दर्दनाक घटनाओं से एक बार फिर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है। इस संदर्भ में, केंद्र सरकार का पहले 'सतलुज' फिल्म को मंजूरी देना और फिर उसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाने का फैसला गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा लगता है कि यह सुलह को बढ़ावा देने के बजाय सांप्रदायिक बंटवारा पैदा करने के मकसद से किया गया था। विडंबना यह है कि 'सतलुज' को दबाने की कोशिश ने लोगों की उत्सुकता और बढ़ा दी, जिससे पंजाब भर में कई लोगों ने इसे अनौपचारिक तरीकों से देखा।

समाज को न तो इतिहास के मुश्किल अध्यायों को मिटाना चाहिए और न ही राजनीतिक फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए। अतीत का ईमानदारी से अध्ययन किया जाना चाहिए, उस पर तर्कसंगत बहस होनी चाहिए और उसे पूरी तरह से समझा जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां वही गलतियां न दोहराएं। उदाहरण के लिए, जर्मनी एडॉल्फ हिटलर का महिमामंडन नहीं करता, फिर भी वहां कंसंट्रेशन कैंपों को स्मारकों के रूप में संरक्षित रखा गया है जो आने वाली पीढ़ियों को फासीवाद के खतरों के बारे में शिक्षित करते हैं।

आज पंजाब तीन दशक पहले की तुलना में कहीं अधिक शांतिपूर्ण है। फिर भी नई चुनौतियां सामने आई हैं। संगठित अपराध, नशीली दवाओं की तस्करी, जबरन वसूली और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। कानून प्रवर्तन अधिकारियों की संलिप्तता वाली फिरौती की बड़ी मांगों की खबरें स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं।

पंजाब ने नफरत और विभाजन की भारी कीमत पहले ही चुकाई है। समय की मांग यह है कि चुनावी लाभ के लिए पुराने घावों को फिर से न खोला जाए, बल्कि सामाजिक सद्भाव को मजबूत किया जाए। सार्वजनिक बहस को उन मुद्दों, जिनसे सामाजिक शांति भंग होने और आपसी विश्वास व सह-अस्तित्व के बंधन कमजोर होने का खतरा हो, के बजाय इन जरूरी चुनौतियों पर केंद्रित किया जाना चाहिए।

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