विपक्ष को तोड़ने की भाजपा की राष्ट्रीय राजनीतिक रणनीति घृणित
राज्यसभा में भाजपा की अपनी संख्या 114 है, जो भाजपा के टिकट पर दोबारा चुने जाने वाले पूर्व टीएमसी सांसदों के आने के बाद 117 हो जाएगी।;
- डॉ. ज्ञान पाठक
राज्यसभा में भाजपा की अपनी संख्या 114 है, जो भाजपा के टिकट पर दोबारा चुने जाने वाले पूर्व टीएमसी सांसदों के आने के बाद 117 हो जाएगी। हालांकि, इससे राज्यसभा में भाजपा की संख्या पार्टी के इतिहास में सबसे ज़्यादा हो जाएगी, फिर भी यह बहुमत के आंकड़े से छह कम होगी, जिसकी उसे सख़्त जरूरत है।
भारत की संसद- राज्यसभा और लोकसभा दोनों- में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी भाजपा ने विपक्षी राजनीतिक दलों को तोड़ने की राष्ट्रीय राजनीतिक रणनीति अपनाई है। 9 जुलाई 2026 को यह रणनीति बेशर्मी की हद तक पहुंच गई, जिससे लोकतंत्र और निष्पक्ष, नैतिक राजनीति को पसंद करने वालों में गहरी नाराजगी पैदा हुई है। पार्टी ने राज्यसभा के लिए तीन टीएमसी नेताओं को दोबारा नामांकित किया है, जिन्होंने 8 से 11 जून के बीच सदन से इस्तीफा दे दिया था।
ये पूर्व टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिकबारिक हैं। भाजपा ने पिछले महीने ही उनसे राज्यसभा से इस्तीफा दिलवाया था, क्योंकि वह सदन में टीएमसी को तोड़ नहीं पा रही थी। राज्यसभा में टीएमसी के 13 सांसद थे, और किसी अन्य पार्टी (जैसे भाजपा) में विलय या अलग समूह बनाने के लिए 9 सांसदों की जरूरत थी। बिना सीट गंवाए कानूनी रूप से अलग होने के लिए, पार्टी के चुने हुए विधायकों/सांसदों में से दो-तिहाई का किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय करने या नई राजनीतिक इकाई बनाने पर सहमत होना जरूरी है।
जब भाजपा ऐसा कानूनी रूप से नहीं कर पाई, तो उसने उन सांसदों से सदस्यता से इस्तीफा दिलवा दिया, जिससे राज्यसभा में सीटें खाली हो गईं। इसके बाद, खाली सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव की जरूरत पड़ी और चुनाव की तारीख 24 जुलाई घोषित की गई। फिर भाजपा ने उन्हीं तीन सांसदों को पार्टी का टिकट दिया, जब वे 9 जुलाई को औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने अभी मई में ही पश्चिम बंगाल का चुनाव जीता है और विधानसभा में उसके पास 208 सीटें हैं। इसलिए, भाजपा तीनों सांसदों को फिर से राज्यसभा भेजने की स्थिति में है, लेकिन अब भाजपा सांसद के तौर पर।
हालांकि, लोकसभा में भाजपा 28 में से 20 टीएमसी लोकसभा सांसदों को एक अलग इकाई बनाने के लिए मनाने में सफल रही। इस तरह लोकसभा में टीएमसी टूट गई, और अलग हुए समूह का विलय एनसीपीआई में हो गया, जो पूर्वोत्तर की एक कम जानी-मानी पार्टी है, हालांकि मूल रूप से पश्चिम बंगाल में रजिस्टर्ड है। ध्यान देने वाली बात है कि एनसीपीआई, भाजपा का समर्थन करती है और एनडीए का हिस्सा है। लोकसभा स्पीकर ने अभी तक इस विलय को मंज़ूरी नहीं दी है, और टीएमसी इसका विरोध करते हुए मांग कर रही है कि बागी सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाए।
वहीं कोलकाता में, टीएमसी के 80 में से 60 से ज़्यादा विधायकों ने रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक अलग गुट बना लिया है, जिन्हें विधानसभा स्पीकर ने विपक्ष का नेता माना है। स्पीकर के फैसले के आधार पर, इस अलग हुए गुट ने दावा किया है कि वे ही 'असली टीएमसी' हैं और उन्होंने मान्यता के लिए भारत के चुनाव आयोग में आवेदन भी किया है। ममता बनर्जी को भाजपा की इस सािजश का मु$काबला करना होगा, ताकि पार्टी की संस्थापक होने के नाते वह पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अपने पास बनाए रख सकें।
फिर भी, महाराष्ट्र का अनुभव बताता है कि न तो शरद पवार अपनी पार्टी एनसीपी का नाम और चुनाव चिह्न बचा पाए और न ही उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न। यह सब भाजपा की उस पेंचीदा राजनीति की वजह से हुआ, जिस पर विपक्षी राजनीतिक दलों को तोड़ने और विपक्षी सरकारों को गिराने की रणनीति अपनाने का आरोप लगता रहा है।
2026 की शुरुआत में ही, भाजपा ने आप के 7 राज्यसभा सांसदों से अलग गुट बनवा कर उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया था। पार्टी के अहम पदों से हटाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों ने औपचारिक रूप से भाजपा का दामन थाम लिया। इन सांसदों में राघव चड्ढा, संदीप पाठक, डॉ. अशोक कुमार मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं। इस बदलाव से उच्च सदन में आप की संख्या 10 से घटकर सि$र्फ तीन रह गई, जबकि भाजपा की संख्या बढ़कर 113 हो गई।
फिलहाल, राज्यसभा में भाजपा की अपनी संख्या 114 है, जो भाजपा के टिकट पर दोबारा चुने जाने वाले पूर्व टीएमसी सांसदों के आने के बाद 117 हो जाएगी। हालांकि, इससे राज्यसभा में भाजपा की संख्या पार्टी के इतिहास में सबसे ज़्यादा हो जाएगी, फिर भी यह बहुमत के आंकड़े से छह कम होगी, जिसकी उसे सख़्त •ारूरत है। राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा 123 है। फिर भी, तीन निर्दलीय सदस्य पार्टी का समर्थन कर रहे हैं, और सात मनोनीत सदस्य भी हैं। कुल मिलाकर, उनकी संख्या 127 हो जाएगी, जो साधारण बहुमत से चार ज़्यादा है।
एनडीए में भाजपा के सहयोगियों के पास 26 और सांसद हैं, और इसलिए, राज्यसभा में एनडीए की कुल सीटें 153 होंगी। यह संख्या सदन में किसी भी संवैधानिक संशोधन को पास करने के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत (164 सीटें) से 11 कम है—जिसे भाजपा नेतृत्व हासिल करने की कोशिश कर रहा है, खासकर परिसीमन जैसे मामलों में।
लोकसभा की बात करें तो, एनडीए के पास अब 318 सीटें हैं, इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) के पास 184 सीटें हैं और अन्य/निर्दलीय के पास 38 सीटें हैं। तीन सीटें खाली हैं। दो-तिहाई बहुमत के लिए एनडीए को 362 वोटों की ज़रूरत होगी। इसलिए, हम देखेंगे कि भाजपा आने वाले समय में और भी गंदी राजनीति करेगी—जैसा कि हमने पहले भी देखा है—सिफ़र् अपनी ताकत बढ़ाने के लिए, बिना किसी नैतिकता या उसूलों की परवाह किए।
बंगाल में, राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा था कि उनकी पार्टी किसी भी बागी टीएमसी नेता को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करेगी। लेकिन अब उनका कहना है कि हालिया शामिल होने की घटना एक 'अपवाद है, न कि तय नीति से कोई विचलन।' यह भाजपा नेताओं के असली रंग को दिखाता है।
ऐसी खबरें हैं कि भाजपा और भी राजनीतिक दलों और नेताओं को तोड़ने की कोशिश कर रही है, या कम से कम 'गाजर और छड़ी' (लालच और दबाव) की नीति समेत कई तरीके अपना कर उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है, जिसमें लोकतांत्रिक नियमों, नैतिकता और मूल्यों का कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा है। यह तो अनुमान का ही विषय है कि भारत किस दिशा में बढ़ रहा है।