सीएसडीएस विवाद : प्रशासनिक जवाबदेही बनाम अकादमिक स्वायत्तता

किसी भी लोकतंत्र में विश्वविद्यालयों और स्वतंत्र शोध संस्थानों का महत्व केवल ज्ञान उत्पादन तक सीमित नहीं होता; वे सार्वजनिक नीतियों की समीक्षा, सत्ता से प्रश्न पूछने और लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध करने का कार्य भी करते हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-14 21:30 GMT
  • अरुण कुमार डनायक

यह उस संतुलन की परीक्षा है जिसे हर लोकतंत्र को अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच बनाए रखना होता है। निस्संदेह सार्वजनिक धन से संचालित संस्थानों को वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि प्रशासनिक कार्रवाई किसी भी रूप में स्वतंत्र शोध और आलोचनात्मक चिंतन को हतोत्साहित करती हुई प्रतीत न हो।

किसी भी लोकतंत्र में विश्वविद्यालयों और स्वतंत्र शोध संस्थानों का महत्व केवल ज्ञान उत्पादन तक सीमित नहीं होता; वे सार्वजनिक नीतियों की समीक्षा, सत्ता से प्रश्न पूछने और लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध करने का कार्य भी करते हैं। ऐसे संस्थानों की विश्वसनीयता जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उनकी जवाबदेही भी है। इसी संदर्भ में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ (सीएसडीएस) और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के बीच उपजा विवाद राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

सीएसडीएस, जिसकी स्थापना 1963 में भारतीय राजनीतिक विज्ञान के अग्रणी विद्वान रजनी कोठारी ने की थी। उनके नेतृत्व में सीएसडीएस ने सर्वेक्षण-आधारित सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को संस्थागत स्वरूप दिया। बाद में लोकनीति कार्यक्रम के माध्यम से चुनावी व्यवहार पर किए गए अध्ययन नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और मीडिया के लिए विश्वसनीय संदर्भ बने। आज भी 'लोकनीति' कार्यक्रम भारत के सबसे विश्वसनीय चुनावी सर्वेक्षणों में गिना जाता है।

सीएसडीएस की वित्तीय संरचना में आईसीएसएसआर का अनुदान केंद्रीय भूमिका निभाता है। संस्थान की कुल आय का लगभग 83 प्रतिशत हिस्सा इसी अनुदान से आता है और कर्मचारियों के वेतन का लगभग 90 प्रतिशत इसी पर निर्भर है। वर्ष 2024-25 में सीएसडीएस की कु ल आय 7.56 करोड़ रुपये रही, जिसमें से 6.29 करोड़ रुपये आईसीएसएसआर से प्राप्त हुए। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि संस्थान की स्थिरता और संचालन लगभग पूरी तरह से सरकारी सहायता पर आधारित है, और यदि यह अनुदान निलंबित होता है तो उसके शोध, प्रकाशन और मानव संसाधन पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

सीएसडीएस और आईसीएसएसआर के बीच विवाद की शुरुआत 2025 महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान हुई, जब प्रो. संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर मतदाता आंकड़ों में विसंगतियों का दावा किया। बाद में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि आंकड़ों की व्याख्या में त्रुटि हुई थी और सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगी। इसके बाद आईसीएसएसआर ने इसे गंभीरता से लेते हुए सीएसडीएस को कारण बताओ नोटिस जारी किया और संस्थान की प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्यप्रणाली की जांच के लिए एक समिति गठित कर दी।

जांच समिति ने सीएसडीएस की कार्यप्रणाली में कई प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया, जिनमें यूजीसी नियमों के विरुद्ध नियुक्तियां, निदेशक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष का चुनाव समय पर न होना, मकान किराए भत्ते संबंधी नियमों का उल्लंघन तथा वार्षिक लेखों का समय पर ऑडिट न होना शामिल है। दूसरी ओर सीएसडीएस का कहना है कि उसे समिति की पूरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है। संस्थान का दावा है कि निदेशक की नियुक्तियां उसके ज्ञापन के अनुरूप हुई हैं और उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

प्रशासनिक कार्रवाई और अकादमिक स्वतंत्रता के प्रश्न को लेकर सीएसडीएस विवाद दो विपरीत दृष्टिकोणों को सामने लाता है। सरकार का तर्क है कि यदि किसी अनुदान प्राप्त संस्थान में वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितताएं पाई जाती हैं तो कार्रवाई करना उचित और आवश्यक है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि महाराष्ट्र चुनावों के मतदाता आंकड़ों पर टिप्पणी के बाद हुई यह कार्रवाई स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है। इस संदर्भ में शिक्षकों ने भी सामूहिक प्रतिक्रिया देते हुए सार्वजनिक प्रस्ताव पारित किया और चेतावनी दी कि अनुदान बंद होने से संस्थान का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 1975-77 के आपातकाल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में, जब कई अध्यापक सरकार के आलोचक थे, तब भी आईसीएसएसआर ने अनुदान नहीं रोका था।

इस सम्पूर्ण मामले ने नया तूल तब लिया जब प्रो. संजय कुमार के विरुद्ध नागपुर और नासिक में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाई।

सीएसडीएस पर आईसीएसएसआर द्वारा अनुदान निलंबन की सिफारिश से उसके कर्मचारियों के वेतन और आय का अधिकांश भाग प्रभावित होता है, जिससे उसकी वित्तीय स्थिरता और शोध गतिविधियां संकट में पड़ सकती हैं। इसके विपरीत सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) को दो वर्ष पूर्व विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम का लाइसेंस निलंबित होने और आयकर अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत कर-छूट समाप्त होने के कारण विदेशी फंडिंग बंद करनी पड़ी तथा कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी। वहीं सामाजिक विकास परिषद (सीएसडी) अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है और सरकारी व अंतरराष्ट्रीय सहयोग से अपना कार्य जारी रखे हुए है, क्योंकि वह कम राजनीतिक विवादों में उलझी है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि चाहे विवाद विदेशी फंडिंग का हो या सरकारी अनुदान का, प्रशासनिक और वित्तीय कार्रवाई सीधे संस्थानों की संरचना और शोध की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है, और यही परिदृश्य भारत में स्वतंत्र शोध संस्थानों की स्वायत्तता के भविष्य को अनिश्चित बनाता है।

भारत में स्वतंत्र शोध संस्थानों की स्वायत्तता और वित्तपोषण का भविष्य गंभीर चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। देश का अनुसंधान एवं विकास व्यय अभी केवल 0.65 प्रतिशत जीडीपी है, जिसका प्रमुख कारण सरकारी अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता, निजी निवेश की कमी और सीमित वित्तीय स्रोत हैं। इस स्थिति में सुधार के लिए नीति आयोग ने अनुसंधान व्यय को जीडीपी के 2 प्रतिशत तक बढ़ाने, विश्वास-आधारित शासन प्रणाली, डिजिटल पारदर्शिता तथा सीएसआर निवेश को प्रोत्साहित करने जैसी सिफारिशें की हैं। ये सुझाव स्वागतयोग्य हैं, किंतु हाल के वर्षों में कुछ स्वतंत्र शोध संस्थानों पर हुई प्रशासनिक कार्रवाइयों के संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि कहीं जवाबदेही और पारदर्शिता के नाम पर अकादमिक स्वायत्तता प्रभावित न हो। सुधारों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें कितनी निष्पक्षता से लागू किया जाता है। साथ ही, विकसित देशों की तरह भारत में भी सरकारी सहायता के साथ निजी फाउंडेशन, विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत की भागीदारी बढ़ाकर वित्तपोषण के स्रोतों का विविधीकरण करना आवश्यक है।

यह विवाद केवल प्रशासनिक मतभेद नहीं है। यह उस संतुलन की परीक्षा है जिसे हर लोकतंत्र को अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच बनाए रखना होता है। निस्संदेह सार्वजनिक धन से संचालित संस्थानों को वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि प्रशासनिक कार्रवाई किसी भी रूप में स्वतंत्र शोध और आलोचनात्मक चिंतन को हतोत्साहित करती हुई प्रतीत न हो। यदि शोध संस्थानों का विश्वास कमजोर होगा तो नीति-निर्माण भी अंतत: कमजोर होगा। इसलिए आवश्यकता किसी एक पक्ष की विजय की नहीं, बल्कि ऐसी संस्थागत व्यवस्था की है जिसमें जवाबदेही और स्वायत्तता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हों। यही भारत के लोकतांत्रिक और बौद्धिक भविष्य की वास्तविक कसौटी होगी।

(लेखक एवं समाजसेवी)

Tags:    

Similar News