प्रतिभाओं का पलायन और भारत की चुनौती

भारत से श्रमिकों और अन्य वर्गों के लोगों का विदेश जाना लगभग दो शताब्दियों पुरानी परिघटना है।;

By :  National
Update: 2026-11-03 21:10 GMT
  • अरुण कुमार डनायक

केवल राष्ट्रवाद का आह्वान युवाओं को देश में रोकने के लिए पर्याप्त नहीं; उन्हें ऐसे विश्वविद्यालय, प्रयोगशालाएं और उद्योग चाहिए, जहां उनकी योग्यता का सम्मान हो, विचारों की स्वतंत्रता मिले और मेहनत का उचित प्रतिफल। भारत की वास्तविक सफलता यह नहीं कि अमेरिकी वीजा के दरवाजे बंद हो जाएं, बल्कि यह कि उनके खुले रहने पर भी युवा देश में रहकर या लौटकर उसके विकास में योगदान देना चाहें।

भारत से श्रमिकों और अन्य वर्गों के लोगों का विदेश जाना लगभग दो शताब्दियों पुरानी परिघटना है। ब्रिटिश शासन में बड़ी संख्या में भारतीयों को गिरमिटिया मजदूरों के रूप में मॉरीशस, फिजी और कैरेबियाई देशों में भेजा गया। दक्षिण अफ्रीका और पूर्वी अफ्रीका के केन्या जैसे देशों में भी भारतीय मजदूरों के साथ गुजराती व्यापारी और कारोबारी पहुंचे। इन क्षेत्रों से भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क इससे भी पुराने रहे हैं। समय के साथ अनेक देशों में भारतीय मूल के समुदाय विकसित हुए, जो आज वहां की राजनीति, व्यापार और सामाजिक जीवन में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। कुछ देशों में उनके प्रतिनिधि राष्ट्राध्यक्ष और सरकार के प्रमुख पदों तक भी पहुंचे हैं। स्वतंत्रता के बाद भी समय-समय पर भारत सरकारों ने श्रमिकों की मांग वाले देशों में उनके जाने को प्रोत्साहित किया।

अमेरिका जाने का सपना देखने वाले भारतीय युवाओं के सामने आज विचित्र स्थिति है। जिस देश को वे बेहतर शिक्षा, ऊंचे वेतन, आधुनिक अनुसंधान और उज्ज्वल भविष्य का प्रवेशद्वार मानते हैं, उसी की आव्रजन नीतियां उनके लिए अनिश्चितता बढ़ा रही हैं। वहां काम करने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए नौकरी और स्थायी निवास की राह कठिन होती जा रही है।

एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष योग्यता वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। इसके धारकों में भारतीय आईटी विशेषज्ञों और इंजीनियरों की बड़ी हिस्सेदारी है। अमेरिकी नागरिकों के रोजगार और वेतन की रक्षा का तर्क देते हुए ट्रंप प्रशासन ने नियम कड़े किए और कुछ नई याचिकाओं पर एक लाख डॉलर शुल्क घोषित किया। हालांकि, अदालतों के आदेशों से इसके कार्यान्वयन में बाधा आई।

एच-1बी वीजा धारकों की परेशानी भारत यात्रा के दौरान भी बनी रहती है। वापसी के लिए नई वीजा स्टैम्पिंग आवश्यक होने और वाणिज्य दूतावास में नियुक्ति मिलने में देरी के कारण उनकी वापसी अटक सकती है। इससे नौकरी, परिवार और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका रहती है।

अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर नियुक्त करने की प्रवृत्ति रोककर अमेरिकी नागरिकों के रोजगार की रक्षा की जानी चाहिए। लेकिन सभी विदेशी पेशेवरों को सस्ते श्रम की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, चिकित्सकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने अमेरिकी संस्थानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कठोर वीजा नीतियां प्रतिभाशाली पेशेवरों को हतोत्साहित कर सकती हैं और दूसरे देशों के लिए उन्हें आकर्षित करने के अवसर बढ़ा सकती हैं।

अमेरिका की समस्याओं को उसकी शक्ति के अंत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता, उच्च शिक्षा और तकनीकी नवाचार उसे अब भी प्रमुख वैश्विक शक्ति बनाए हुए हैं। फिर भी, राजनीतिक धु्रवीकरण, आय की असमानता, बंदूक हिंसा, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं और जर्जर सार्वजनिक ढांचा उसकी कमजोरियां उजागर करते हैं। संबंधित वैश्विक रैंकिंग में अमेरिका स्वास्थ्य में 33वें, बुनियादी ढांचे में 39वें, नागरिक कल्याण में 41वें और प्राकृतिक पर्यावरण में 72वें स्थान पर रहा। 2024 में उसकी जीवन प्रत्याशा 79 वर्ष थी। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि आर्थिक और सैन्य शक्ति बेहतर स्वास्थ्य, पर्यावरण और नागरिक कल्याण की गारंटी नहीं है।

इन चुनौतियों के बावजूद अमेरिका भारतीय युवाओं की पसंद बना हुआ है। विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, पर्याप्त शोध संसाधन और उद्योगों से जुड़कर नवाचार को व्यावसायिक रूप देने के अवसर उन्हें आकर्षित करते हैं। विडंबना यह है कि एच-1बी वीजा पर काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को 'विदेशी अनुबंधित बंधुआ मजदूरÓ जैसी अपमानजनक संज्ञा से भी संबोधित किया गया है। यह टिप्पणी विदेशी पेशेवरों के योगदान के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण दर्शाती है। इसके बावजूद बेहतर अवसरों की तलाश में युवा अमेरिका जाने को तैयार हैं, क्योंकि भारत में उच्चस्तरीय अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण रोजगार और आधुनिक संस्थागत सुविधाओं के अवसर अभी सीमित हैं।

भारत में युवा शक्ति और प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन उनके अनुरूप अवसर सीमित हैं। उच्चस्तरीय शिक्षण और शोध संस्थानों की कमी है। निजी क्षेत्र ने निवेश किया है, लेकिन उसके अनेक संस्थानों की फीस आम परिवारों की पहुंच से बाहर है। अमेरिका में शिक्षा ऋण और पढ़ाई के साथ काम करने के अवसर अपेक्षाकृत अधिक हैं, जबकि भारत में इनका दायरा सीमित है। इसके अलावा, नौकरशाही की जटिलताएं भी नए संस्थानों और शोध गतिविधियों के विकास में बाधा बनती हैं।

कुछ युवाओं की शिकायत है कि आरक्षण के कारण उन्हें शिक्षा, रोजगार और पदोन्नति में योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिलते। आरक्षण सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक वंचना दूर करने का आवश्यक माध्यम है, लेकिन सभी वर्गों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी नियुक्तियां और योग्यता का उचित मूल्यांकन भी जरूरी है। सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता के संतुलन के लिए अवसरों, रोजगार की गुणवत्ता और अनुसंधान के वातावरण का निष्पक्ष आकलन होना चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने विदेश में अनुभव प्राप्त प्रतिभाओं को अवसर देकर संस्थान निर्माण को गति दी। प्रोफेसर यशपाल ने 1958 में अमेरिका से पीएचडी प्राप्त की और भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान को समृद्ध किया। यू. आर. राव 1966 में भारत लौटे और अंतरिक्ष कार्यक्रम को मजबूत किया। डॉ. अशोक सेठ 1988-89 में तथा डॉ. नरेश त्रेहान 1988 में लौटे और आधुनिक हृदय चिकित्सा के विकास में योगदान दिया। सैम पित्रोदा ने राजीव गांधी के कार्यकाल में दूरसंचार आधुनिकीकरण को गति दी। अमर्त्य सेन 1963 में दिल्ली स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स से जुड़े, जबकि रघुराम राजन 2012 में मुख्य आर्थिक सलाहकार और 2013 में रिजर्व बैंक के गवर्नर बने।

मोदी सरकार ने स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों के माध्यम से तकनीकी विकास पर जोर दिया है। लेकिन प्रतिभाओं की वापसी के लिए रामानुजन फेलोशिप (2005-06) और रामालिंग स्वामी री-एंट्री फेलोशिप (2006-07) जैसी पहले से चल रही योजनाएं ही आगे बढ़ाई गई हैं। सरकार की सत्तावादी और बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियां तथा जीवन के लगभग हर क्षेत्र में बढ़ती नौकरशाही विदेशों में बसे भारतीयों को स्वदेश लौटने से हतोत्साहित करती हैं।

भारत की समस्या केवल प्रतिभाओं का विदेश जाना नहीं, बल्कि उनके ज्ञान और कौशल का देश में पर्याप्त उपयोग न हो पाना भी है। सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि कितने विश्वस्तरीय शोध समूह विकसित हुए, नई तकनीकें और उत्पाद बने, गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा हुए और युवाओं को अपनी क्षमता के अनुरूप काम मिला।

केवल राष्ट्रवाद का आह्वान युवाओं को देश में रोकने के लिए पर्याप्त नहीं; उन्हें ऐसे विश्वविद्यालय, प्रयोगशालाएं और उद्योग चाहिए, जहां उनकी योग्यता का सम्मान हो, विचारों की स्वतंत्रता मिले और मेहनत का उचित प्रतिफल।

भारत की वास्तविक सफलता यह नहीं कि अमेरिकी वीजा के दरवाजे बंद हो जाएं, बल्कि यह कि उनके खुले रहने पर भी युवा देश में रहकर या लौटकर उसके विकास में योगदान देना चाहें। प्रतिभाओं को रोकने का स्थायी उपाय प्रतिबंध नहीं, बल्कि ऐसा भविष्य बनाना है, जिसे छोड़ने की विवशता उन्हें महसूस न हो।

(लेखक एवं समाजसेवी )

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