जीवन के अर्थ ढूँढती कविता
छत्तीसगढ़ के कवि स्वराज्य करुण की कविता का स्थायी भाव करुणा है, जिससे मुझे अनायास ही महाकवि भवभूति के 'उत्तररामचरितम्' का स्मरण होता है
- डॉ. चित्तरंजन कर
छत्तीसगढ़ के कवि स्वराज्य करुण की कविता का स्थायी भाव करुणा है, जिससे मुझे अनायास ही महाकवि भवभूति के 'उत्तररामचरितम्' का स्मरण होता है. भवभूति ने अपनी इस कृति में 'एको रस: करुण एव 'कहकर करुण रस को रसराज श्रृंगार से ऊपर निरुपित किया है. सच ही है, करुणा या संवेदना कविता की जननी ही नहीं, मानवता की धात्री भी है. आदिकवि वाल्मीकि के हृदय में उदभूत करुणा ही 'रामायण 'रच सकी - 'शोक: श्लोकतवं गत:'
वर्ष 2025 में प्रकाशित स्वराज्य करुण की 83 कविताओं की पुस्तक 'दिलवालों का देश कहाँ?' मानवीय सरोकारों की देशज अनुभूति से प्रसूत जीवन -बोध की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें राग -तत्व स्वयं मनुष्य में, रिश्ते -नातों में, खेत -खलिहान में, गाँव -शहर में, पर्वत -घाटियों में, झील -झरनों में, नद -नालों में, ताल -सरोवर में, धरती -आकाश में और देश -दुनिया में अनुनादित होता है.इन रचनाओं में कवि का यथार्थ (यथा अर्थ )-बोध कहीं भी तिरोहित नहीं है, प्रत्युत विभाव, अनुभाव और संचारी भाव बनकर स्थायी भाव को परिपुष्ट करता है और श्रोता और पाठक को रसानुभूति कराता है. उनकी हर कविता जीवन के अर्थ ढूँढती है.
इस कविता -संग्रह का एक गीत प्रत्येक देशवासी में वह संकल्प जगाता है, जो 'माता भूमि पुत्रोह्म पृथिव्या: 'की उदात्त भावभूमि का स्पर्श करता है -
*अँधियारे की आग बुझाने
किरणों का गंगा -जल सीचेंगे
धरती माता के आँचल में
हरियाली की छवि खींचेंगे.*
सच ही है -जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी 'कवि स्वराज्य करुण लिखते हैं -
* सूरज -चाँद-सितारों वाले आसमान के नीचे
मेरे देश की बाँहों में सतरंगे बा$ग-बगीचे.
पर्वतमालाओं से बहनेवाली नदियों का संगीत
सुनकर झूम उठे यह दुनिया मेहनतकश मानव के गीत.
अपने ख़ून -पसीने से जो इस धरती को सीँचे,
$फसल काटने के मौसम में नहीं रहेंगे पीछे.*
जब जीवन में राग -तत्व का अभाव होता है, तभी वह 'मौन कराहों और आहों का जीवित शब्दकोश 'बन जाता है, 'एक अजीब दास्तान' बन जाता है जीवन, 'अधूरी नींव पर सपनों का मकान ' लगता है. मानवीय संवेदना मर जाती है, कवि की करुणा फूट पड़ती है-
*कौन सुनेगा तेरी पीड़ा,
अपने में मशगूल यहाँ सब,
ओठों पर रख ले तू उंगली,
मत जोरों से चीख़ जि़ंदगी.*
इसी तरह अपनी एक अन्य रचना में 'करुण' कहते हैं -
*चीख़ रही है जाने कब से
बेगानों के बीच जि़ंदगी
इंसानों को ढूँढ रही है
इंसानों के बीच जि़ंदगी.*
गीत का उद्भव माँ की लोरी से हुआ, जिसके मूल में संवेदना है. आधुनिकता की आँधी में गीत की क्या दशा हो गई है, 'करुण'
के शब्दों में -
*गीतों की झुक गई कमर,
बूढ़ी हर आवाज़ हो गई
सूरज का विश्वास नहीं अब,
किरणे धोखेबाज हो गईं.*
कविता -संग्रह की शीर्षक -रचना में कवि लिखते हैं -
*सोने -चाँदी के चक्कर में चीर रहे धरती
का सीना,
खेती के रिवाज को चाहे पल भर में
गिरा दें लोग.
उनके नक्शे में न जाने दिलवालों का देश कहाँ?
शायद असली के बदले दिल नकली
लगवा दें लोग.*
जो गाँव कभी अपनेपन के लिए जाना जाता था ; पूरा गाँव एक परिवार होता था, सुख-दु:ख में सभी साथ रहते थे, वह अब स्मृतियों में रह गया है-
*भूल गए सब गाँव की दुनिया
पनघट, पीपल, छाँव की दुनिया.
दौड़े आए दूर-दूर तक,
नहीं मिली सदभाव की दुनिया.*
धर्मों के नाम पर हो रहे ख़ूनी झगड़ों ने कवि हृदय को भी आहत किया है. वे कहते हैं -
*पूछ रहे हैं मंदिर -मस्जिद,
पूछ रहे हैं काशी -काबा,
रंग -बिरंगी इस दुनिया में
आख़िर कब तक ख़ून -ख़राबा*
व्यक्ति सबके साथ है, पर अकेला-अचीन्हा हो गया है -
*अनाम पथिक, बोल तेरा गाँव कौन देश रे,
पीठ पर लाद कर पहाड़-सा अभाव
ढूँढ रहा तू यहाँ अँजुरी भर छाँव.
मरुथल की दुनिया में छाँव कौन देश रे*
पर्यावरण की चिन्ता इस सृष्टि के जीव -जगत और वनस्पति -जगत् , दोनों की चिन्ता है. प्रकृति तो प्रकृति है, परंतु मानव की दुश्प्रकृति ने प्रकृति को आहत कर दिया है. फ्लस्वरूप -
*अब नज़र आती नहीं कोई चिड़िया डाल पर,
शिकारी की नज़र है, बिछे हुए जाल पर
थम गया क्यों यहाँ पेड़ों का हिलना
हवाओं का बहना और कलियों का खिलना.*
मानव संघर्ष करके ही सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहलाता है. सच पूछा जाए तो 'करुण' के शब्दों में
*जीवन तो संघर्षो का इतिहास है,
जीतने के बाद हर अध्याय मधुमास है.*
यदि जन्म लेना, साँसें लेना -छोड़ना, रोटी-कपड़ा-मकान आदि ही 'जीवन' के पर्याय होते तो ज्ञान -विज्ञान की अनेक शाखाएँ विकसित नहीं होतीं, न कोई संत होता, न कोई कवि होता, न कोई दार्शनिक होता, न कोई वैज्ञानिक, न कोई गायक होता, न कोई वादक या नर्तक! सारे विश्व - कोश भी आज तक जीवन को परिभाषित नहीं कर सके हैं -- ऐसा है जीवन, जो उसी तरह पकड़ से छूट जाता है, जैसे मु_ी में से रेत! दरअसल, जीवन एक अनुभूति है, एक दृष्टि है. जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि.
जीवन के प्रति आस्था जगाती स्वराज्य 'करुण' की कविता
'प्रीत के छंद लिए जीवन की चाँदनी ' बिखेरती है और कहती है -
*हमें पहुँचना है वहाँ जि़ंदगी के गीत जहाँ
घर -आँगन घूमते हों बाँटते प्रीत जहाँ.*
संक्षेप में स्वराज्य करुण की कविता जीवन के नए-नए आयामों में अर्थ -संधान तो करती ही हैं, जीवन को एक दृष्टि भी देती है -सौंदर्य दृष्टि.
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पुस्तक - दिलवालों का देश कहाँ?
(कविता -संग्रह )
- स्वराज्य करुण
मूल्य - 200/
प्रकाशक-सर्वप्रिय प्रकाशन
1569, प्रथम मंजिल, चर्च रोड
कश्मीरी गेट, दिल्ली -110006
ठ्ठ डॉ. चित्तरंजन कर
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
साहित्य एवं भाषा-अध्ययन शाला,
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
रायपुर (छत्तीसगढ़)