ललित सुरजन की कलम से संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की जरूरत
'अभी हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की जो व्याख्या दो अवसरों पर की है वह हमारे मन में चिंता उपजाती है;
'अभी हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की जो व्याख्या दो अवसरों पर की है वह हमारे मन में चिंता उपजाती है। जनभावना अपनी जगह बिल्कुल उचित है कि जो व्यक्ति अपराध में लिप्त रहे हों वे विधान सदनों में प्रवेश न कर सकें, लेकिन क्या यह सिर्फ कानून बना लेने या कानून की व्याख्या कर देने मात्र से संभव है या इसके लिए अलग हटकर सोचने की जरूरत है? मैंने दो माह पूर्व अपने एक लेख में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या के बाद राजनीतिक दलों को इसका विरोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि जनभावना संसद और विधानसभा में अपराधियों को नहीं देखना चाहती। इसके बाद भी यदि केन्द्र सरकार ने अध्यादेश लाकर न्यायालय के फैसले को बदलने की कोशिश की तो उसकी पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। आज सारे राजनीतिक दल सिध्दांत की राजनीति के बजाय महज चुनावी राजनीति कर रहे हैं और सबसे पहले जरूरत है तो इस प्रवृत्ति को बदलने की। यह महती कार्य न्यायालय के फैसले से नहीं हो सकता।'
(देशबन्धु में 3 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/10/blog-post_2.html