नरेंद्र मोदी सरकार के समक्ष वैधता और भरोसे का गंभीर संकट
भारत की भाजपा सरकार अपनी वैधता के संकट का सामना कर रही है।;
- कृष्णा झा
अब ऐसा समय आ गया है जब लोग भारी राजनीतिक नाराज़गी से घिरे हुए हैं। जो ताकतें पहले अलग-अलग थीं और अलग-अलग मकसदों के लिए लड़ रही थीं, वे अब एक हो गई हैं और एक ही मकसद के लिए बगावत कर रही हैं, और वह मकसद है सत्ता प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना। इस आंदोलन में लोगों की भागीदारी और लामबंदी भी शामिल है। यह भी ज़रूरी है कि जनमत को एकजुट किया जाए।
भारत की भाजपा सरकार अपनी वैधता के संकट का सामना कर रही है। एक दशक से ज़्यादा समय से शासन की नाकामियों, आधिकारिक तौर पर इन्कार करने, सुनियोजित लूट, संस्थाओं पर हमलों, लोकतंत्र को कमज़ोर करने और ऐसी ही कई अन्य वजहों से पार्टी विश्वनीयता के संकट से जूझ रही है। इन सबके साथ-साथ भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के कामकाज ने भी देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है।
अब ऐसा समय आ गया है जब लोग भारी राजनीतिक नाराज़गी से घिरे हुए हैं। जो ताकतें पहले अलग-अलग थीं और अलग-अलग मकसदों के लिए लड़ रही थीं, वे अब एक हो गई हैं और एक ही मकसद के लिए बगावत कर रही हैं, और वह मकसद है सत्ता प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना। इस आंदोलन में लोगों की भागीदारी और लामबंदी भी शामिल है। यह भी ज़रूरी है कि जनमत को एकजुट किया जाए क्योंकि आम लोगों को अपनी ताकत का एहसास हो गया है। इसके अलावा, दोनों पक्षों के लिए पारदर्शिता भी होनी चाहिए। यह सच है कि ईसीआई एक संवैधानिक संस्था है, और हमारा देश लोगों की पसंद की पवित्रता बनाए रखने के लिए जाना जाता है। उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही सरकारी तंत्र का नेतृत्व करते हैं, इसलिए लोगों का भरोसा बनाए रखना ज़रूरी है। लेकिन लोगों का भरोसा कम हुआ है।
मुद्दा सिर्फ़ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) का नहीं है, बल्कि अनियमितताओं, मतदाता सूची और यहां तक कि मतदान के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठे हैं। इन सभी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा है। जिन लोगों के मतदान के अधिकार छीने गए, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। उदाहरण के लिए, बिहार में 17 लाख और बंगाल में 91 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। ये सब मनमाने ढंग से नाम हटाने के मामले हैं। देश में ऐसा संकट पहले कभी नहीं देखा गया। बुनियादी ची•ाों की कमी है। आधिकारिक तौर पर इन्कार करने, संस्थाओं पर हमलों और लोकतंत्र को कमज़ोर करने की वजह से सत्ताधारी भाजपा की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं। पारदर्शिता लगभग न के बराबर है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- ने ईसीआई के कामकाज से जुड़े कई मुद्दों पर आपत्ति जताते हुए 14 सवाल उठाए थे। बिना उन्हें बताए ही फै़सले लिए गए और निर्देश जारी किए गए। ये कदम नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, मतदाताओं के निबंधन के फार्म और तरीके में बदलाव और चुनावी डेटाबेस में सुधार के संदर्भ में उठाए गए थे। ईसीआई ने इन आरोपों पर कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन कहा कि उसके ज़्यादातर फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। मौजूदा संकट की जड़ में देशव्यापी एसआईआर है, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें ईसीआई मतदाता सूची की दोबारा जांच करता है और जिन मतदाताओं के नामों पर सवाल उठता है, उनसे लिस्ट में बने रहने के लिए अपनी पात्रता साबित करने को कहता है। एसआईआर ने 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के ड्राफ़्ट से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटा दिए हैं। इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं, उनमें से ज़्यादातर लोग दोबारा सूची में शामिल हो पाएंगे। कुछ नाम तो वापस जुड़ जाएंगे, लेकिन ज़्यादातर लोग बिना अपनी किसी गलती के सूची से बाहर ही रह सकते हैं।
अगर एसआईआर प्रक्रिया और ईसीआई के काम करने के तरीके को ऐसे ही चलने दिया गया, तो इससे भारत में चुनावी लोकतंत्र की बुनियाद खत्म हो जाएगी। यहां तक कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के तरीके ने भी भारत की चुनावी व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री और केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का दबदबा होता है। यह सत्ताधारी पार्टी और उस संस्था के बीच मिलीभगत की चिंताजनक संभावना की ओर इशारा करता है, जिसे उससे स्वतंत्र होना चाहिए। सिद्धांत के तौर पर, सरकार और ईसीआई के बीच एक दूरी होनी चाहिए। इसके बजाय, समिति का गठन ऐसा है कि सरकार के दो सदस्य, तीसरे अकेले सदस्य यानी विपक्ष के नेता पर हावी रहते हैं। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ईसीआई के कामों और चुनाव आयुक्तों के बचाव में भाजपा के सार्वजनिक बयानों से ऐसा लगता है कि कोई भी सुरक्षा घेरा (फ़ायरवॉल) मौजूद ही नहीं है।
असल में, चुनावी निष्पक्षता को लेकर विवाद एसआईआर से पहले से ही चल रहा है, हालांकि एसआईआर ने इसे एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। बिहार में जून 2025 में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही विपक्षी पार्टियां मतदाता सूची, मतदान के आंकड़ों और चुनाव आयोग के कामकाज में गड़बड़ी के आरोप लगा रही थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि मनमाने ढंग से नाम हटाए गए, संदिग्ध तरीके से मतदाता जोड़े गए और मतदान प्रतिशत में गड़बड़ियां थीं। इन सभी को विपक्ष ने 'वोट चोरीÓ कहा। विपक्षी पार्टियों की चिंताओं पर ध्यान देने के बजाय, ईसीआई ने उन्हें खारिज कर दिया और कहा कि सब कुछ ठीक है और मतदाता सूची में बदलाव तय प्रक्रियाओं के अनुसार किए गए हैं। एक संवैधानिक संस्था के तौर पर, ईसीआई की जिम्मेदारी न सिर्फ चुनाव कराना है, बल्कि उनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखना भी है।
ईसीआई के अंदर का संकट असल में विश्वसनीयता के एक बड़े संकट का नतीजा है। इससे पता चलता है कि देश की चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और काफी हद तक हाल के चुनावों के नतीजों पर नागरिकों का भरोसा कितना डगमगा गया है।
जैसे-जैसे चुनाव व्यवस्था गहरे संकट का सामना कर रही है, अपने इतिहास के सबसे बड़े विश्वसनीयता संकट का सामना करते हुए, हर वर्ग के लोग, खासकर युवा, विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। विरोध का तरीका और इसका व्यापक दायरा यह दिखाता है कि भाजपा सरकार ने भारत के नागरिकों का भरोसा पूरी तरह खो दिया है। ऐसा संकट तब पैदा होता है जब सरकार हर मोर्चे पर नाकाम हो जाती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उस अविश्वास की गहराई को दिखाती है। सिफ़र् इस्तीफ़ा देने से ही नुकसान की भरपाई नहीं होगी। भारत को विवादित फैसलों की स्वतंत्र जांच, मतदाता सूची की पारदर्शी समीक्षा, गलत तरीके से हटाए गए लोगों का तुरंत दोबारा नाम शामिल करने और उन्हें हुई बेवजह परेशानी के लिए मुआवज़े की ज़रूरत है। फिर अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाने से चुनाव के नतीजों पर असर पड़ा है, तो ईसीआई के पास उस चुनाव को रद्द करने और दोबारा चुनाव कराने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होना चाहिए।