जवाबदेही और जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की पैंतरेबाजी

भाजपा ने समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मंदिर को अपनी राजनीतिक पहचान का मुख्य मुद्दा बनाया है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-07-16 21:30 GMT
  • राजेश पांडेय

भाजपा ने समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मंदिर को अपनी राजनीतिक पहचान का मुख्य मुद्दा बनाया है। उसकी प्राथमिकता सूची में गवर्नेंस की महत्वपूर्ण जगह है। प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाने की याद बार-बार दिलाते हैं। वे चुनाव सभाओं और कार्यक्रमों में कहते हैं, उनकी सरकार भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ है। अब उनके वादे और भाषणों की कड़ी परीक्षा का समय है।

भारत में भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है। कई सरकारी दफ्तरों में आम लोगों के काम से जुड़ी फाइलें रिश्वत के बिना आगे नहीं बढ़ती हैं। सरकारी ठेकों के टेंडर पास कराने में धांधली की शिकायतें आम हैं। विभिन्न स्तरों पर हजारों, लाखों और करोड़ों रुपए के घोटाले हो रहे हैं। शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश, सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रतियोगी परीक्षाएं सुरक्षित नहीं हैं। परीक्षाओं से पहले उनके पेपर लीक हो जाते हैं। प्रश्नपत्रों की बिक्री लाखों रुपए में होती है। और तो और लाखों, करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र धर्मस्थल तक घोटालों से परे नहीं हैं। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है। फिर भी, उन लोगों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है जो इसके लिए सीधे जवाबदेह और जिम्मेदार हैं। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्ट आचरण,अनीति और अनैतिकता को सामान्य मान लिया गया है।

अभी हाल के महीनों में कदाचरण के कुछ मामले सुर्खियों में रहे हैं। इनमें राममंदिर, अयोध्या से करोड़ों रुपए के चढ़ावे की चोरी और राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट यूजी) के पेपर लीक होने के मामले प्रमुख हैं। दोनों ही मामलों में सरकारी एजेंसियों ने कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई की है। यूपीए-2 सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को चुनाव अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाकर सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों मामलों में खामोश हैं। उन्होंने मनमोहन सिंह की सरकार के समय टू जी स्पेक्ट्रम के आबंटन और कोयला खदानों की नीलामी में धांधली को प्रमुख मुद्दा बनाया था। वे और भाजपा के नेता चुनाव सभाओं में पूर्व यूपीए सरकार पर तीखे प्रहार करते थे। लेकिन अब मौन हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी रणनीतिक हो सकती है। मोदी मन की बात में छात्रों से परीक्षा पर चर्चा करते हैं। लेकिन उन्होंने नीट पेपर लीक पर एक शब्द नहीं कहा है। वे उन मुद्दों पर ही बोलते हैं जिनसे उन्हें फायदा हो सकता है। हमेशा अपनी उपलब्धियों का जिक्र करते हैं। अपनी सरकार की विफलता और खामियों को स्वीकार नहीं करते हैं। नोटबंदी और कोविड-19 के अचानक घोषित लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त आघात लगा था। लेकिन इन फैसलों के नकारात्मक पहलुओं को कभी याद नहीं किया जाता है। दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार को सत्ता से हटे 12 साल हो चुके हैं लेकिन सत्ताधारी दल के प्रमुख नेता विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, गवर्नेंस, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून व्यवस्था सहित तमाम मसलों पर पूर्व सरकार को निशाना बनाते हैं।

अपनी अक्षमता, गलत फैसलों पर चुप्पी साधने और पूर्व सरकारों को दोषी ठहराने का अनंत सिलसिला जनमत को प्रभावित करने की योजना का हिस्सा है। इसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस नेताओं की तुलना में भाजपा के नेता ज्यादा याद करते हैं। भाजपा समर्थक इकोसिस्टम और ट्रोल आर्मी ने नेहरू के बारे में तरह-तरह के किस्से फैलाए हैं। नेहरू का निधन 62 वर्ष पहले हो चुका है पर आजाद भारत की हर समस्या का दोष उन पर मढ़ा जाता है। संसद में उन पर तीखे प्रहार हुए हैं। नेहरू के लिए भाजपा के अतिशय प्रेम का नतीजा है कि अब सोशल मीडिया मीम्स, अखबारों के कार्टूनों और आपसी चर्चा में लोग मजाक में कहने लगे हैं कि पता लगाओ, फलां समस्या के लिए कहीं नेहरू तो दोषी नहीं हैं। गनीमत है, राममंदिर में हुए भ्रष्टाचार पर किसी ने अब तक नेहरू को जिम्मेदार नहीं ठहराया है।

सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए शायद संघ परिवार उम्मीद कर रहा होगा कि अन्य मामलों के समान कुछ समय बाद लोग अयोध्या के घटनाक्रम को भी भूल जाएंगे। सवाल है, क्या ऐसा हो सकता है। अतीत पर नजर डालने से राजनीति में भ्रष्टाचार के मुद्दे की प्रमुखता और राम मंंदिर आंदोलन पर रोशनी पड़ती है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उमड़ी सहानुभूति लहर के कारण 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिली थीं। भाजपा दो सीटों तक सिमट गई थी। इस बीच, विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर दिया था। फिर बोफोर्स तोपों की खरीद में 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दिए जाने के आरोपों से अलोकप्रिय हुए राजीव गांधी और कांग्रेस को 1989 के चुनाव में सत्ता गंवाना पड़ी थी।

आजादी के बाद पहला मौका था जब केवल भ्रष्टाचार के आरोपों पर किसी सत्ताधारी दल को चुनावी हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस छोड़कर जनता दल बनाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। वीपी सिंह और भाजपा के बीच मतभेद जल्द सामने आ गए। वीपी सिंह ने भाजपा की असहमति के बावजूद शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया। उधर, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सितंबर 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू कर दी। भाजपा ने मंदिर आंदोलन को देश का आध्यात्मिक पुर्नजागरण करार दिया। निश्चित रूप से मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीतिक दिशा बदल दी है।

रथयात्रा से धार्मिक भावनाएं भड़कीं। देश में कई जगह दंगे हुए। 1992 में संघ परिवार की सक्रियता से अयोध्या में जुटे कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। उस वक्त शिला पूजन के लिए लोगों ने उदारता से दान दिया था। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मंदिर निर्माण का रास्ता खोला। फरवरी 2020 में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के समान मंदिर निर्माण समिति के गठन में केंद्र सरकार की निर्णायक भूमिका रही। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साथ भाजपा का एक मुख्य चुनावी वादा अमल में आ गया। यह धर्म के नाम पर तीस साल से चल रहे भाजपा के राजनीतिक प्रोजेक्ट का अहम अध्याय है।

भाजपा और संघ परिवार ने मंदिर आंदोलन से फायदा तो उठाया है पर इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि मंदिर में आ रहे अपार धन को घोटाले से कैसे सुरक्षित रखा जाए। अनुमान है, ट्रस्ट को अब तक 3500 करोड़ रुपए का दान नगद मिला है। सोने, चांदी की इंटें और आभूषण अलग हैं। मंदिर निर्माण से पहले ही परिसर के आसपास जमीनों की खरीद में अनियमितताओं की खबरें सामने आई हैं। इनमें ट्रस्ट के पदाधिकारी शामिल बताए जाते हैं। एक ऑडिट में आगाह किया गया था कि अगर निगरानी तंत्र मजबूत नहीं बनाया गया तो ट्रस्ट की जवाबदेही और उसकी कार्यप्रणाली को साफ-सुथरा बनाए रखना मुश्किल होगा। इस चेतावनी की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया है।

हिंदू जनमानस के बड़े हिस्से में भगवान राम मर्यादा, आदर्श, नैतिकता के प्रतीक हैं। वे अन्याय और भ्रष्ट आचरण से लड़ने वाले योद्धा हैं। उनके प्रमुख पूजा स्थल से दान के धन की चोरी और गबन ने लोगों की आस्था और विश्वास को आघात पहुंचाया है। राममंदिर कोई अकेला धर्मस्थल नहीं है जहां दान की हेराफेरी और अन्य अनियमितताएं हुई हैं। तिरुपति स्थित भगवान वेंकटेश्वर मंदिर का प्रसाद बनाने के लिए घटिया घी की सप्लाई में करोड़ों रुपए का घोटाला हो चुका है। वैष्णो देवी मंदिर भी अनियमितताओं की चपेट में आ चुका है। ये मामले बताते हैं कि हमारा राजनीतिक जीवन तो छोड़िए लोगों की अगाध श्रद्धा के पवित्र स्थान तक लालच और लूट से सुरक्षित नहीं हैं।

भाजपा ने समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मंदिर को अपनी राजनीतिक पहचान का मुख्य मुद्दा बनाया है। उसकी प्राथमिकता सूची में गवर्नेंस की महत्वपूर्ण जगह है। प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाने की याद बार-बार दिलाते हैं। वे चुनाव सभाओं और कार्यक्रमों में कहते हैं, उनकी सरकार भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ है। अब उनके वादे और भाषणों की कड़ी परीक्षा का समय है। सरकार हमेशा नैतिकता और आदर्शों का ढोल पीटती है, वह हर किसी से जवाबदेही और कर्तव्य पालन की अपेक्षा रखती है। इसलिए अब उसकी बारी है। सरकार को अपनी आलोचना में साजिश नजर आती है। उसके फैसलों पर उंगली उठाने वालों को देशद्रोही, पाकिस्तानी और चीनी तक कहा जाता है। इसलिए भी उस पर लोगों की निगाह रहेगी। राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार की गहराई तक पैठ के बावजूद लोग राममंदिर के मामले में किसी पक्षपात के बिना कार्रवाई की अपेक्षा रखते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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