ललित सुरजन की कलम से महावीर प्रसाद द्विवेदी
द्विवेदीजी की एक और पुस्तक है जिसका सरल सा शीर्षक है- 'संकलन'।;
द्विवेदीजी की एक और पुस्तक है जिसका सरल सा शीर्षक है- 'संकलन'। नब्बे वर्ष पूर्व प्रकाशित इस पुस्तक में भी विविध विषयों पर लिखे गए लेख संकलित किए गए हैं। 'अमेरिका के गांव' शीर्षक लेख की पहली पंक्ति है- 'जिस तरह भारत वर्ष अत्यंत दरिद्र है उसी तरह अमेरिका अत्यंत धनवान है।' इसके बाद वे कहते हैं- 'हमारे देश के गांव दरिद्रता और मूर्खता के केन्द्र स्थान हैं... यदि गांवों के झोपड़ों के अधिकारियों को दरिद्रता और अविद्या का मूर्तिमान अवतार कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति नहीं।' इस लेख को पढ़कर पाठक चौंक सकते हैं। वे लोग जिन्हें गांवों का जीवन रोमांटिक लगता है वे नाराज भी हो सकते हैं, किन्तु आगे चलकर बाबा साहेब आम्बेडकर ने भारत के गांवों के बारे में जो विचार प्रगट किए वे उनसे भिन्न नहीं हैं। इस पुस्तक के एक लेख में वे पनडुब्बी की बनावट और उसके उपयोग का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं, तो एक अन्य लेख में वे हवाई जहाज द्वारा यात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत करते हैं। 1912 में प्रकाशित यह लेख उस समय लिखा गया था जब यात्रा एकदम शुरूआती दौर में थी और बड़ी हद तक अजूबा थी। इस लेख का शीर्षक 'व्योमयान से मुसाफिरी' है। इस पुस्तक में भारत, चीन और जापान में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था पर स्वतंत्र लेख तो हैं ही, एक अच्छा लेख 'गूंगों और बहरों के लिए स्कूलÓ शीर्षक से भी है।
(अक्षर पर्व जुलाई 2014 में प्रकाशित)
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