जैसे झालमुड़ी के दिन फिरे
अब प्रधानमंत्री मोदी बता सकते हैं। हुगली नदी ने राजनीति के कितने रंग-रूप बंगाल में देखे हैं।;
बंगाल से लेकर बिहार, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तक झालमुड़ी जबान के अनुरूप अपने रूप-रंग में थोड़े बदलाव के साथ चौराहों, नुक्कड़ों पर खोमचों में नजर आ जाएगी। जैसे पानी और बोली कुछ दूरी पर बदल जाते हैं, बस वैसा ही हाल झालमुड़ी का है। हां, बंगाल में इसकी क्या महत्ता है, यह अब प्रधानमंत्री मोदी बता सकते हैं। हुगली नदी ने राजनीति के कितने रंग-रूप बंगाल में देखे हैं।
कागज़ के ठोंगे (लिफाफे) में बिकने वाली झालमुड़ी अपने भाग्य पर इतरा रही है। उसकी चाह यही थी कि उसका स्वाद कभी किसी महापुरुष की जुबान पर भी चढ़े। इससे ज्यादा वह कुछ और चाह भी नहीं सकती है। पुष्प तो है नहीं, जिसकी चाह यानी अभिलाषा महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने बयां की थी कि-
चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊं,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक।
झालमुड़ी तो सदा से सेवन के बाद बचे-खुचे अस्तित्व के साथ फेंके जाने के लिए ही बनती है। लोग उसकी हैसियत पर सवाल उठाने लगेंगे अगर वह किसी प्यारी ललचाने के लिए महंगे रेस्तरां की नाजुक, चमकती तश्तरियों में पेश की जाए। सम्राटों, देवताओं से भी उसे दूर ही रखा जाएगा, गरीबी और पसीने की मिली-जुली गंधी जो उसमें व्याप्त रहती है। तो बस पथ पर बढ़ते वीरों का साथ देने के लिए झालमुड़ी सर्वाधिक उपयुक्त रहती है।
अश्रु, स्वेद, रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ।
झालमुड़ी का तो जन्म ही अतिसाधारण, बल्कि दयनीय भाव के साथ हुआ। जब गरीब की थाली से भोजन कम हो जाता है, गायब हो जाता है। पेट की आग, जिह्वा की तपिश गरीब को मजबूर करती है, तो वह किसी खोमचे वाले के पास जाता है, जो उसी की तरह गरीब और मजबूर होता है। दोनों एक-दूसरे के हालात समझते हैं और बिना किसी संकोच के उसे साझा करते हैं। मुरमुरे में कभी चने, कभी मूंगफली या सूखी मटर के साथ प्याज़, टमाटर, नींबू, हरी मिर्च, नमक, लाल मिर्च, चाट मसाला, जो उपलब्ध रहे, सबको एक साथ मिलाकर, ऊपर से कड़वा (झाल वाला) सरसों तेल डालकर पुराने अखबार के पन्ने में तरीके से मोड़ कर भर दिया जाता है। चंद रुपयों में पेट को भरे होने का अहसास होता है और जुबान भी तृप्त हो जाती है। सफेद, कुरकुरा मुरमुरा अपने रंग पर गुमान नहीं करता, चना या मूंगफली अपनी पौष्टिकता का घमंड नहीं दिखाते, मिर्च तीखी लगेगी जानते हुए भी उसे प्यार से अपनाया जाता है और प्याज की तीव्र गंध दूर तक जाएगी, बावजूद इसके उसका खास स्थान झालमुड़ी में रहता है। बिल्कुल भारतीय उदारवादी संस्कृति और सभ्यता के अनुरूप। जिसमें सबकी अपनी खासियत और स्थान है, फिर भी सब घुलमिल जाते हैं।
बंगाल से लेकर बिहार, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तक झालमुड़ी जबान के अनुरूप अपने रूप-रंग में थोड़े बदलाव के साथ चौराहों, नुक्कड़ों पर खोमचों में नजर आ जाएगी। जैसे पानी और बोली कुछ दूरी पर बदल जाते हैं, बस वैसा ही हाल झालमुड़ी का है। हां, बंगाल में इसकी क्या महत्ता है, यह अब प्रधानमंत्री मोदी बता सकते हैं। हुगली नदी ने राजनीति के कितने रंग-रूप बंगाल में देखे हैं। अंग्रेजों का आना, बंग-भंग की साजिश, हिंदू-मुसलमान की विभाजनकारी राजनीति, वंदे मातरम, जन गण मन की रचना, मजदूरों के हक में लाल सलाम ठोंका जाना, कांग्रेस, वामदल और अब तृणमूल कांग्रेस की सत्ता, एक बड़ा राजनैतिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक इतिहास बंगाल का रहा है। लेकिन क्या कभी किसी ने ये सोचा कि झालमुड़ी के ठोंगे से वोट भी निकल सकते हैं। मोदीजी शायद इसे मुमकिन करना चाहते हैं। वैसे तो इस बार के चुनाव में मछली भी मुद्दा बन चुकी है। ममता बनर्जी ने बता दिया था कि भाजपा अगर सत्ता में आ गई तो फिर मांस-मछली पर भी प्रतिबंध लगना शुरु हो जाएगा। और उन्होंने कोई गलत दावा नहीं किया था। बंगाल में बीते समय में कुछ ऐसे प्रकरण हुए जिसमें कहीं दुर्गा पूजा के वक्त मांस-मछली को लेकर लोगों को परेशान किया गया तो कहीं किसी खोमचे वाले को प्रताड़ित किया गया। तब तो भाजपा के लोग मांसाहार के सेवन के लिए सामने नहीं आए। लेकिन चुनाव आते ही एक भाजपा प्रत्याशी ने ममता बनर्जी को गलत दिखाने के लिए हाथ में मछली लेकर प्रचार किया। भाजपा विधायक सुवेन्दु अधिकारी का अपने साथियों के साथ मटन खाते हुए वीडियो सामने आया और इसी मंगलवार को भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर बाकायदा माछ-भात खाते दिखे।
बंगाल है तो मंगलवार को मछली खाने का जोखिम भाजपा नेता ने उठा लिया, वर्ना याद कीजिए कि राहुल गांधी ने जब लालू प्रसाद से खास चंपारन मटन बनाना सीखा, फिर उनके साथ खाते हुए वीडियो बनाया, अपनी बहन प्रियंका के लिए पैक करवा कर ले गए, तो भाजपा ने कितनी बातें बनाई थीं। हालांकि राहुल गांधी तो कई बार बता चुके हैं कि उन्हें खाने में बटर चिकन जैसे व्यंजन पसंद हैं। लेकिन भाजपा को तो न राहुल गांधी न उनका साथ देने वाले किसी भी नेता की कोई भी बात अच्छी लगती है। इसलिए उनके खान-पान तक की आलोचना से परहेज नहीं होता, जबकि यह नितांत निजी पसंद का मामला है कि कोई क्या खाए और क्या नहीं। जब मछुआरा समुदाय से आने वाले मुकेश सहनी के साथ तेजस्वी यादव ने हेलीकॉप्टर में चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाई थी, तब भी भाजपा ने ट्रोल किया था कि ये दोनों सावन के महीने में मछली खा रहे हैं। लेकिन वहीं केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जब झटका मटन दुकान का उद्घाटन करते हैं, तो हिंदू संवेदनाओं को झटका नहीं लगता। जबकि बिहार, बंगाल, ओडिशा इन सब राज्यों के खान-पान में भात के साथ मछली, मटन का सेवन सदियों से प्रचलन में रहा है। खान-पान की सामाजिक आदतें क्षेत्र विशेष की जलवायु और भौगोलिक संरचना के अनुरूप ही विकसित हुई हैं और बाद में एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्रों में कामकाज, नौकरी, उद्योग आदि के लिए गए तो साथ में अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान को भी ले गए। इसलिए अब दिल्ली में लिट्टी-चोखा भी मिलता है और झालमुड़ी भी। इंडिया गेट से लेकर कनाट प्लेस तक कई जगहों पर खोमचे वाले झालमुड़ी बेचते मिल जाएंगे।
लेकिन नरेन्द्र मोदी को दिल्ली में रहते कभी झालमुड़ी की याद नहीं आई। एक तो वो दिल्ली में रहते ही बहुत कम हैं और जब रहते हैं तब भी हिंदू भावनाओं की साज-संभाल या मित्रों के कारोबार की देखरेख में उनका काफी समय चला जाता है। वैसे भी वो प्रधानमंत्री हैं, राहुल गांधी की तरह आम आदमी तो हैं नहीं कि कहीं भी कार से उतरे और कभी धान रोपने लग जाएं, जूते सिलने बैठ जाएं, मछली पकड़ने लगें या फिर किसी मिठाई दुकान में जाकर चाय-समोसे का आनंद लें। वैसे ध्यान आया कि राहुल गांधी को पुरानी दिल्ली से लेकर केरल और तमिलनाडु के रेस्तरां तक में विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते देखा गया है। पंजाब के ढाबों पर भी उन्होंने खाया-पिया है, लेकिन बंगाल में उनकी कहीं झालमुड़ी खाते हुए तस्वीर शायद अब तक नहीं आई। शायद इसलिए मोदीजी ने यहां मौका तलाशा और झारग्राम में जैसे ही उन्हें झालमुड़ी की दुकान दिखी, वो फौरन रुक गए और बाकायदा 10 रुपए की झालमुड़ी खरीदी।
इस दस रुपए की झालमुड़ी प्रकरण को सोशल मीडिया पर करीब दस करोड़ व्यूज़ मिल चुके हैं, क्योंकि खुद नरेन्द्र मोदी ने इसका वीडियो डाला। और वहीं गूगल पर इसे काफी सर्च भी किया गया है कि आखिर ये झालमुड़ी चीज़ क्या है।
इसीलिए कहना पड़ा कि कैसे झालमुड़ी के दिन फिरे। क्योंकि झालमुड़ी बेचने वालों के दिन तो फिरने से रहे। मोदीजी तो अब बेरोजगारों को शायद ये भी कहें कि क्यों सरकारी नौकरी के इंतजार में पड़े हो, झालमुड़ी बेचना शुरु करो, ये भी तो रोजगार है। उनके राज्य सूरत से अभी बड़ी संख्या में पलायन हुआ है, एक मजदूर ने तो कैमरे पर कहा भी कि अब वापस नहीं आऊंगा दोस्त। क्योंकि छोटे-बड़े कारखानों में काम करने वाले ये मजदूर ऊर्जा संकट के कारण न महंगा गैस सिलेंडर खरीद पा रहे हैं, न कोई इसका उपाय उनके पास बचा है। क्यों न मोदीजी झालमुड़ी का गुजरातीकरण कर इसे अपने राज्य में बिकवाना शुरु कर दें और फिर अंबानी-अडानी की दुकानों पर मोदीजी की तस्वीरों वाले पैकेट पर झालमुड़ी तैयार होने लगे। एक साथ कितनों को साध लेंगे मोदीजी। और हां, चाय के साथ भी झालमुड़ी का स्वाद खूब जमेगा। तो जैसे झालमुड़ी के दिन फिरे, वैसे सबके फिरें, इससे ज्यादा और क्या चाह करें। किसी विश्वासी कवि की नजर झालमुड़ी पर पड़े तो फिर कहने ही क्या?