ललित सुरजन की कलम से अंतिम सच का सामना कैसे करें
'एक समय था जब वयप्राप्त जनों के बारे में बहुत ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी।
'एक समय था जब वयप्राप्त जनों के बारे में बहुत ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी। भारत जैसे पारंपरिक समाज में तो लगभग बिल्कुल नहीं। भारत और एशिया के अनेक देशों में संयुक्त परिवार व्यवस्था कमोबेश आज भी चली आ रही है। यह सामान्य तौर पर माना जाता है कि परिवार के युवतर सदस्य अपने बड़े-बूढ़े की फिक्र कर ही लेते होंगे, किन्तु सच्चाई इतनी सरल नहीं है। काशी और वृंदावन की विधवाएं तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करती हैं। प्रेमचंद की 'बेटों वाली विधवा' से लेकर रमेश याज्ञिक की 'दादा जी तुम कब जाओगे' जैसी कहानियों में भी सत्य का दूसरा पक्ष उभरकर आता है। उषा प्रियंवदा की 'वापसी' कहानी को तो मैं भुला ही नहीं पाता। 'बागबान' जैसी फिल्म की कहानी भी तो यही है।'
(अक्षर पर्व मार्च 2015 अंक की प्रस्तावना)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/03/blog-post_6.html