महंगाई और उसे बनाने वाला नया सूचकांक
अब 1.8 फीसदी कोई ऐसा संकेत नहीं है कि डर के मारे हम शोर मचाने लगें कि महंगाई जान मार रही है और सरकार को तुरन्त कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए।
अरविन्द मोहन
बाहरी दिखावों, सामाजिक आयोजनों और परिवहन के खर्च बढ़ाने का मतलब उस परिवार की सामाजिक-आर्थिक हैसियत का बढ़ाना भी होता है जबकि गरीब के बजट का ज्यादा से ज्यादा बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। इस बदलाव का यह एक खामोश पक्ष है लेकिन बताने के लिए जरूरी भी है। इससे सरकार, सूचकांक बनाने वालों और बाजार चलाने वालों की सोच की दिशा का पता चलता है।
अब 1.8 फीसदी कोई ऐसा संकेत नहीं है कि डर के मारे हम शोर मचाने लगें कि महंगाई जान मार रही है और सरकार को तुरन्त कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए। महंगाई के मोर्चे पर सरकार लगातार सक्रिय भी रही है। बल्कि कई बार हम उसकी सक्रियता को लेकर ही यह सवाल उठाते रहे हैं कि उसे सिर्फ उपभोक्ताओं की चिंता है उत्पादकों, खासकर किसानों की नहीं। आखिर उत्पादकों की संख्या उपभोक्ताओं से कम है और चुनावी राजनीति में गिनती का बहुत महत्व है। पर आंकड़े के इतने पर आते ही दसेक महीने का रिकार्ड अर्थात थोक मूल्यों में साल के सबसे अधिक स्तर पर आने की सूचना मिले तो कान खड़े होने ही चाहिए। इसकी वजह महंगाई नहीं उसको मापने के पैमाने को बनाया जाना चाहिये। अपने निजी अनुभव से हमें महंगाई बढ़ने का ही एहसास होता है। लेकिन जब भी उससे संबंधित आंकड़े आते हैं वे उलटी तस्वीर पेश करते थे। हम मन मसोस कर रह जाते थे।
उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार द्वारा जारी नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लागू होने के बाद से ऐसा कम होगा और जनवरी 2026 के आंकड़े इस दिशा में संकेत करने भी लगे हैं। जनवरी में यह 2.75 फीसदी आया। थोक मूल्य सूचकांक एकदम अलग आधार पर चलता है लेकिन उसमें भी बढ़ोतरी का मतलब बाजार का गरमाना ही है। खाद्य पदार्थों और फल-सब्जी की महंगाई हम वैसे भी झट से अनुभव करने लगते हैं पर चर्चा महंगाई पर नहीं सूचकांक पर करनी चाहिए और इस बदलाव का स्वागत होना चाहिए। असल में सूचकांक शहरी उपभोक्ताओं के लिए होता है और उससे भी ज्यादा सरकारी और संगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए होता है जिन्हें इस सूचकांक के हिसाब से महंगाई भत्ता मिलता है। देश की बड़ी और बाकी आबादी के लिए यह एक सूचना भर है तो सरकार के लिए खतरे की घंटी। उसे जैसे ही महंगाई की भनक लगती है वह सक्रिय हो जाती है पर दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कई बार सरकारी फैसलों के चलते भी महंगाई आती है और अकसर प्रशासनिक असफलता मुनाफाखोरों के लिए लूट का रास्ता बनाती है।
हमारी खान-पान और जीवन शैली के बदलाव के चलते समय-समय पर सूचकांक में बदलाव लाना जरूरी हो जाता है। एक आम शहरी वेतनभोगी के जीवन में जिन वस्तुओं और सेवाओं की जितनी और जैसी जरूरत होती है, उसका एक भारांक सूचकांक में तय किया जाता है। फिर उनके चालू बाजार मूल्य को उठाकर पूरा सूचकांक बनता है जिसका चढ़ना-गिरना महंगाई की सही तस्वीर देता है। यह नहीं हो सकता कि चावल और गेहंू का भारांक वही हो हो जो नमक का होगा। मकान किराया, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, परिवहन का खर्च, मनोरंजन, दूध-दही, मांस-मछली, फल-सब्जी अगर खर्च के बड़े आइटम होते हैं तो उन्हें सूचकांक में भी वही महत्व देने की कोशिश की जाती है। लेकिन बदलाव तो जीवन का नियम है। जैसे इस बार सूचकांक से डीवीडी, कैसेट और वीसीआर को निकाल दिया गया है तो ओटीटी सब्सक्रिप्शन के खर्च को जोड़ लिया गया है। कभी ईंधन के रूप में कोयला और लकड़ी का वजन काफी था तो आज गैस ने उसकी जगह ली है। खाने-पीने के आइटमों में तो और बदलाव आ गया है। जाहिर तौर पर 2024 के मूल्यों को आधार बनाने वाले इस बार के नए सूचकांक में इस बदलाओं को समेटने की कोशिश हुई है।
लेकिन इस बार जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है और जो जल्दी ही खुदरा मूल्य सूचकांक के उतार-चढ़ाव को प्रभावित करेगा वह है मुफ़्त राशन योजना में मिलने वाले आइटमों को सूचकांक की गणना से बाहर रखने का। विकसित देशों में ऐसा लाभ पाने वालों की संख्या पांच से दस फीसदी तक हुआ करती है जबकि अपने यहां राजनैतिक वजहों से 75 फीसदी ग्रामीण आबादी और पचास फीसदी शहरी आबादी मुफ़्त अनाज योजना से कवर होती है तो कई तरह के सामान(मुफ़्त बिजली, पानी, साइकिल, लैपटाप, टीवी, सोना वगैरह) और सेवाओं का लाभ उससे भी ज्यादा लोग पाते हैं। जिस कमेटी ने नए सूचकांक को आखिरी रूप दिया उसके सभी 22 सदस्य इन सभी की गिनती को सूचकांक के दायरे से बाहर ले जाने के पक्ष में थे। पर कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि खाद्यान्न के बाजार मूल्य और राशन मूल्य का औसत लेने से सूचकांक ज्यादा अच्छी और सच्चे तस्वीर देगा।
सूचकांक में 2012 वाली शृंखला के 299 आइटमों की जगह 350 आइटम शामिल किए गए हैं जो इस अवधि में हुए बदलाव को संभालने का प्रयास है। जैसा पहले बताया गया है कई चीजों का भारांक(वेटेज) भी बदला है। लेकिन जानकार मानते हैं कि अभी कई चीजों की गिनती ही नहीं हुई है या भारांक गलत बताए गए हैं जिससे सूचकांक पूरी तरह सही तस्वीर नहीं देगा। इनमें नगर परिवहन में काफी प्रभावी हो चुके मेट्रो के भाड़े को शामिल न करना एक प्रमुख चूक है। साइकिल रिक्शा और तांगे के किराए को जोड़ने का कोई मतलब नहीं है जब मेट्रो और ई-रिक्शा जैसे सबसे ज्यादा उपभोग में आने वाले साधनों को छोड़ दिया गया है। एप आधारित परिवहन सेवा को शामिल करना सही फैसला है तो ग्रामीण इलाकों में भी मकान भाड़ा का हिसाब सूचकांक के दायरे में लाना एक जमीनी हकीकत को स्वीकार करना है। आज गांवों में भी भाड़े पर मकान लेकर रहने का चलन कम है लेकिन शुरू हो गया है। शहरी जीवन में बाहर भोजन करना भी एक जरूरी खर्च बनाता गया है।
इस बार के सूचकांक में इलाज और शिक्षा पर खर्च का भारांक बढ़ा यही जो वास्तविकता के करीब है। अब इसमें यह भेद सूचकांक के माध्यम से नहीं सुलझाया जा सकता है। दोनों में खर्च बढ़ाने की मुख्य वजह यहां निजी क्षेत्र का जोर बढ़ाना और सरकार का यहां से हाथ खींचते जाना है। यह विषय सूचकांक तय करने वालों से अलग है। कपड़े-लत्ते के खर्च को भी ज्यादा वेटेज दिया गया है जो सही है। लेकिन इस बार भोजन वाले कुल आइटमों का भारांक काफी गिरा है। अब बाहरी दिखावों, सामाजिक आयोजनों और परिवहन के खर्च बढ़ाने का मतलब उस परिवार की सामाजिक-आर्थिक हैसियत का बढ़ाना भी होता है जबकि गरीब के बजट का ज्यादा से ज्यादा बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। इस बदलाव का यह एक खामोश पक्ष है लेकिन बताने के लिए जरूरी भी है। इससे सरकार, सूचकांक बनाने वालों और बाजार चलाने वालों की सोच की दिशा का पता चलता है।