कर्नाटक में देसी बीज बचाने वाली महिलाएं

कर्नाटक राज्य में उत्तर कन्नड़ जिले की सिरसी तालुका में महिला किसानों का समूह है, जो जंगल में घरेलू कृषि बागवानी को बढ़ावा देता है।

Update: 2026-02-20 21:10 GMT

— बाबा मायाराम

वनस्री व गांवों में घरेलू कृषि बागवानी का महत्व पता चला। परंपरागत बीजों का महत्व पता चला, जो सदियों से विकसित हुए हैं। ये बीज, स्थानीय मिट्टी पानी और जलवायु के अनुकूल होते हैं। इनमें कीट, सूखा और प्रतिकूल मौसम सहने की क्षमता होती है। जैवविविधता और पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका रेखांकित की, जो सदियों से है। बीज संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान के आदान प्रदान में महिलाएं सदैव आगे रही हैं।

कर्नाटक राज्य में उत्तर कन्नड़ जिले की सिरसी तालुका में महिला किसानों का समूह है, जो जंगल में घरेलू कृषि बागवानी को बढ़ावा देता है। परंपरागत देसी बीजों, जैव विविधता और पर्यावरण का संवर्धन और संरक्षण करता है। वनस्री नामक संस्था के काम से ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों के लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। आज इस अनूठे महिला समूह के बारे में बात करना चाहूंगा, जिससे देसी बीजों को बचाने की इस पहल को जाना जा सके। जलवायु बदलाव के दौर में इसके महत्व को समझा जा सके।

मैं कर्नाटक में वनस्री के काम को देखने के लिए कुछ साल पहले गया था। कई गांव घूमा था। और महिला समूह के सदस्यों से मिला था। इसके बाद भी वनस्री के कार्यकर्ताओं से एक दो बार अलग-अलग कार्यक्रमों में मुलाकात हुई है। यहां महिलाओं ने लगातार देसी बीज बचाने, विशेषकर सब्जियों के बीज संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वन बागवानी के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे देसी बीजों के साथ पारंपरिक ज्ञान भी बचाया जा सके। जलवायु बदलाव के दौर में प्रतिकूल परिस्थितियों, जैव विविधता व पर्यावरण को बचाया जा सके। इससे न केवल गांव, कस्बों, शहरों की महिलाओं को जोड़ा है, बल्कि दूरदराज के आदिवासियों महिलाओं को भी जोड़ा है और उन्हें प्रशिक्षित किया है।

वनस्री की शुरूआत 2001 में हुई। सुनीता राव ने इसकी पहल की थी, जो अपनी पढ़ाई के दौरान ही जापान के मशहूर कृषि वैज्ञानिक मोसानोबू फुकूओका से मिली थीं और प्रभावित हुई थीं। तब वह पांडिचेरी में पढ़ रही थीं, उस दौरान फुकूओका वहां आए थे। उनसे प्रभावित होकर वैसा ही काम करना चाहती थीं। एक जमाने में फुकूओका की किताब एक तिनके से आई क्रांति काफी चर्चित रही थी। फुकूओका ने खुद जापान में उनके खेत में प्राकृ तिक खेती के प्रयोग किए थे, जो बाद में दुनिया भर में चर्चित हुए।

संस्था की कार्यकर्ता सुनीता राव ने बताया था कि वनस्री को काम करते हुए कई साल हो गए हैं। इससे जुड़कर बड़ी संख्या में महिला किसान जंगल घरेलू कृषि बागवानी का अनूठा काम कर रही हैं। इससे खाद्य, चारा, ईंधन, रेशा, औषधियां मिलती हैं। यह बेहतर स्वास्थ्य के साथ टिकाऊ जीवनशैली का आधार है। प्रकृति से जुड़ने का एक माध्यम भी है।

सुनीता राव बताती हैं कि 'इसकी शुरूआत अनौपचारिक रूप से हुई। जब भी हम किसी के घर जाते थे तब वे सबसे पहले उनका सब्जी का बगीचा दिखाते थे, बाद में घर के अंदर ले जाते थे। उनके लिए सब्जी का बगीचा बहुत महत्वपूर्ण होता था। यह बगीचा घर के बाहर छोटे हिस्से में होता है। एक एकड़ से कम या ज्यादा भूमि के टुकड़े में हो सकता है। जिसमें मिश्रित फसलें होती हैं। विविध तरह की सब्जियां, फल- फूल, जंगली कंद-मूल व औषधिपूर्ण पौधे होते हैं।'

वे आगे बताती हैं कि 'ये महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर व स्वावलंबी हैं। वे अपने बगीचे में सब्जियां व फल उगाती हैं। फसल कटाई के बाद बीजों को चुनती हैं, उन्हें संभालती हैं, और उनका आदान-प्रदान करती हैं। परंपरागत बीजों की धरोहर व उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजती हैं। मैं भी ऐसा ही कुछ काम करना चाहती थी। देसी बीजों का संरक्षण करना चाहती थी, परंपरागत ज्ञान एकत्र करना चाहती थी। इस काम को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं को जोड़ने की इच्छा थी। वनस्री की शुरूआत इसी तरह से हुई।'

वनस्री ने इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए अलग-अलग समय में कई तरह के काम किए हैं। उन्होंने जगह-जगह जाकर देसी बीज एकत्रित किए, आपस में आदान प्रदान किए, उनके गुणधर्म जाने, और इसका प्रचार- प्रसार किया।

इस संस्था ने कोविड के दौरान रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने व स्वस्थ रहने के लिए पारंपरिक काढ़े को बढ़ावा दिया है। यह हल्दी, अदरक, काली मिर्च, ब्राम्ही, तुलसी, अजवाइन, जीरे का उपयोग कर बनाया जाता है। इस काढ़े को दूध या पानी के साथ पीते हैं। लेमनग्रास, अदरक व तुलसी की चाय पी। यह पारंपरिक नुस्खा सदियों से आजमाया गया है, जो लोगों के अनुभव व पारंपरिक ज्ञान से निकला है।

वनस्री ने अखबारी कागज के गमले बनाए हैं। उनमें बीज और पौधे रोपकर स्थानीय स्तर पर वितरित किए। इस मुहिम में स्वैच्छिक कार्यकर्ता के रूप में कुछ युवा भी जुड़े। वनस्री के काम के प्रचार-प्रसार में डाकघर व डाकिया का योगदान अहम है। एक डाकिया ने शुरूआत में पर्चे बांटने में मदद की थी।

पारंपरिक बीजों के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए हर साल मलनाड़ मेला होता है। इसके आयोजन में वनस्री भी शामिल है। इससे ग्रामीण व शहरी समुदायों को जोड़ने की कोशिश है। इसे मलनाड वार्षिक मेला कहते हैं, जो मेलनाडु पहाड़ी शृंखला के नाम पर है। जिसमें महिला किसान व वनस्त्री के सदस्य आते हैं। उनके खेती व जंगल के उत्पाद लाते हैं, जिसमें बीज, औषधीय पौधे, खाद्य व गैर खेती खादय व हस्तशिल्प होता है। यह मेला एक दिन का होता है और यह भी ग्रामीण व शहरी लोग आते हैं और पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाते हैं।

इस पूरी पहल से कुछ बातें कही जा सकती हैं वनस्री व गांवों में घरेलू कृषि बागवानी का महत्व पता चला। परंपरागत बीजों का महत्व पता चला, जो सदियों से विकसित हुए हैं। ये बीज, स्थानीय मिट्टी पानी और जलवायु के अनुकूल होते हैं। इनमें कीट, सूखा और प्रतिकूल मौसम सहने की क्षमता होती है। जैवविविधता और पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका रेखांकित की, जो सदियों से है। बीज संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान के आदान प्रदान में महिलाएं सदैव आगे रही हैं। वे न केवल पारंपरिक बीज बल्कि रसोईघर की व्यवस्था, संस्कृति और जीवनशैली को बचाने में भी आगे रही हैं।

कुल मिलाकर, यह परंपरागत बीजों को बचाने और बढ़ाने की, टिकाऊ खेती की, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और पर्यावरण बचाने की छोटी सी पहल है। आत्मनिर्भर, स्थानीयकरण व स्वावलंबन की ओर बढ़ने की पहल है। महिला किसानों को नई पहचान देने की पहल है, जो खेती की अधिकांश काम करती हैं परंतु पीछे रहती हैं।

इससे यह भी समझ आता है कि बागवानी, सब्जी, फल-फूल, औषधीय पौधों व सब्जी बाड़ी (किचिन गार्डन) पर ध्यान दिया जाना चाहिए,जो बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी है वनस्री की छोटी पहल उम्मीद की किरण भी दिखाती है, जो दीर्घकालीन उपायों की दिशा दिखाती है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ेंगे?

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