संगठन से समाज तक की यात्रा
जानाधारित संगठन की कल्पना बहुत पुरानी है। 'एकता परिषद' को हमने हमेशा एक जन-संगठन के रूप में परिभाषित किया है।
— राजगोपाल पी.व्ही.
लम्बे अंतराल की संगठन की यात्रा संस्थाओं से प्रारम्भ होकर कार्यकर्ताओं की ओर और अब कार्यकर्ताओं से आम ग्रामीणों की ओर चल पड़ी है। अब जरूरत इस बात की है कि अनुभवी कार्यकर्ता जो लम्बे समय से एक जन-संगठन का सपना देख रहे थे वे इस प्रक्रिया को गतिशील बनाने और जन-संगठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में जुट जायें।
जानाधारित संगठन की कल्पना बहुत पुरानी है। 'एकता परिषद' को हमने हमेशा एक जन-संगठन के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रक्रिया में लंबे समय तक जनता की भागीदारी सशक्त रही है, भले ही कार्यकर्ताओं का सहयोग बाहर से मिलता रहा हो। इसलिए अब तक इसे पूर्ण रूप से जन-संगठन मानना कठिन हो रहा था, जबकि कार्यकर्ता उसी समाज से आए हुए थे, जिस समाज के हित में संघर्ष हो रहा था।
इन सीमाओं के बावजूद 'एकता परिषद' एक जन-संगठन के रूप में लम्बे समय से काम करता रहा।
'जनादेश 2007,' 'जनसत्याग्रह 2012' और 'जनांदोलन 2018' के आन्दोलनों ने संगठन को मजबूत बनाया और इसी मजबूती के आधार पर सरकार की नीतियों को बदलने में हम लोग सफल हुए। 'वनाधिकार अधिनियम,' '10 सूत्रीय आगरा समझौताÓ और 'भूमि अधिगृहण और पुनर्वास नीति 2013' आदि इस बात का उदाहरण हैं कि एक व्यवस्थित जन-संगठन के सहारे काफी हद तक नीतियों को प्रभावित किया जा सकता है।
इन तमाम नीतियों और कानूनों के सहारे जमीनी स्तर पर जो बदलाव आया है उसे देखने और समझने के लिए मैंने पिछले दिनों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का दौरा किया। वनाधिकार के तहत भूमि प्राप्त 25,000 किसानों के साथ दमोह और कटनी में महत्वपूर्ण काम हो रहा है। उन किसानों के साथ काम करने वाले करीब 60 कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद करने का प्रत्यक्ष मौका मिला। इन कार्यकर्ताओं में जो उत्साह और आत्मविश्वास देखने को मिला उससे मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ हूं।
ऐसा लगता है कि 25,000 परिवार नैसर्गिक खेती के माध्यम से अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। वे स्वयं जल, जंगल, जमीन को व्यवस्थित कर रहे हैं और अपने आर्थिक, सामाजिक हालातों को सुधार रहे हैं। अब ये परिवार किसी पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे उलटा संगठन को मदद करने की स्थिति में हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिन भूमिहीनों को संगठित करने के लिए 10 कार्यकर्ता लम्बे समय तक काम करते रहे थे, वहां अब 25,000 किसान कार्यकर्ता हैं जो स्वयं अपनी दम पर अन्य भूमिहीन लोगों के लिए काम कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर संगठन की व्यापकता के लिए आर्थिक सहयोग भी दे सकते हैं।
इससे एक बात साफ हो रही है कि एक समय जो संगठन कार्यकर्ताओं पर आधारित था, अब वह पूर्ण रूप से जनाधारित संगठन बन चुका है। अब जन-संगठन की कल्पना साकार होते हुए दिखाई पड़ रही है। इस यात्रा के दौरान मध्यप्रदेश के उमरिया जिले से आए आदिवासी किसानों से भी चर्चा करने का मौका मिला। इनके अनुमान के अनुसार उमरिया एवं शहडोल जिले के करीब 25,000 आदिवासियों को 'वनाधिकार' के तहत जमीन मिल चुकी है। लगभग 2 एकड़ प्रति परिवार के हिसाब से भी गणना करें, तो करीब 50,000 एकड़ जमीन भूमिहीनों को मिल चुकी है। कल जो अपने आपको भूमिहीन मान रहे थे, वे अपने आप को आज किसान कहने लगे हैं।
इस संवाद में मीरा बहन भी शामिल थीं जो स्वयं एक गोंड़ आदिवासी परिवार से हैं। मीरा बहन ने अपने खेत को इस ढंग से सजाया है कि रास्ते से गुजरने वाला हर व्यक्ति खड़े होकर उनके खेत को निहारता है। मीरा बहन के अनुसार, जिन आदिवासियों को जमीन प्राप्त हुई है उनमें से करीब 80 प्रतिशत लोग अपने पैरों पर खड़े हो गये हैं और स्वावलम्बन की ओर बढ़ रहे हैं। मीरा बहन की बात को उनके सहयोगी महिपाल बैगा, धर्मदास सिंह, मास्टर साहब ने भी सही करार दिया। उन्होंने बात को आगे बढ़ाने हेतु कहा कि 20 प्रतिशत लोग जिन्हें खेती करने में कठिनाई हो रही है, उन्हें संगठन के द्वारा मदद पहुंचानी होगी, ताकि वे भी अन्य लोगों की तरह स्वावलम्बन की दिशा में आगे बढ़ सकें। उनका अनुमान है कि 'वनाधिकार कानून' के तहत आवेदन दे चुके आदिवासियों में 50 प्रतिशत लोगों को अभी भूमि अधिकार मिलना बाकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि उन परिवारों को भी 'वनाधिकार' के तहत जमीन जल्दी प्राप्त होगी।
इन मित्रों के अनुमान के अनुसार अब उमरिया, शहडोल जिलों में 25,000 परिवार ऐसे हैं जो जन-संगठन को अपनी ही दम पर आगे ले जा सकते हैं। उनके अनुसार जो परिवार भूमि-स्वामी बने हैं, वे नि:संकोच हर साल एक क्विंटल अनाज संगठन की व्यापकता के लिए देना चाहेंगे। एक कार्यकर्ता आधारित संगठन अब तेजी से जन-संगठन बनता जा रहा है। चर्चा के दौरान इन मित्रों के चेहरे पर जो उत्साह देखने को मिला, उससे मुझे भरोसा होने लगा है कि जन-संगठन की कल्पना अब तेजी से साकार होती जा रही है। अगर कटनी, दमोह, उमरिया, शहडोल में हजारों किसान अपनी ही दम पर संगठन को आगे ले जाने की तैयारी में हैं तो मैं इस बात को मान सकता हूं कि यही तस्वीर अन्य जिलों में भी देखने को मिलेगी।
टीकमगढ़ जिले का संगठन बहुत दिनों से बिना किसी सहयोग के संगठनात्मक गतिविधियों को अपनी दम पर आगे बढ़ा रहा है। श्योपुर, शिवपुरी, ग्वालियर, सिवनी, सीधी और सतना से भी ऐसी ही खबरें निरन्तर मेरे पास आ रही हैं। 40 साल के लम्बे अंतराल की संगठन की यात्रा संस्थाओं से प्रारम्भ होकर कार्यकर्ताओं की ओर और अब कार्यकर्ताओं से आम ग्रामीणों की ओर चल पड़ी है। अब जरूरत इस बात की है कि अनुभवी कार्यकर्ता जो लम्बे समय से एक जन-संगठन का सपना देख रहे थे वे इस प्रक्रिया को गतिशील बनाने और जन-संगठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में जुट जायें। अब इस जन-संगठन के माध्यम से शेष भूमिहीनों को भूमि दिलाने का काम संगठन को अपने हाथ में लेना होगा। संगठन की संरचना के पीछे गांधी और विनोबा का जो आदर्श प्रबल योग रहा है उन आदर्शों को साकार करना आज की आवश्यकता है। हम सबके प्रयासों से संगठन ने जो लम्बा रास्ता तय किया है, उस पर हम गर्व कर सकते हैं। यह नमूना सिर्फ हमारे लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बनकर प्रेरणा दे सकता है।
(लेखक वरिष्ठ गांधी विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)