ललित सुरजन की कलम से - 21 वीं सदी में जनतंत्र!

'पहले दिन परिसंवाद की शुरूआत नागपुर के प्रोफेसर युगल रायलु के बीच वक्तव्य के साथ हुई

By :  Deshbandhu
Update: 2026-02-11 22:00 GMT

'पहले दिन परिसंवाद की शुरूआत नागपुर के प्रोफेसर युगल रायलु के बीच वक्तव्य के साथ हुई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय जनता के लिए जनतंत्र सिर्फ एक राजनैतिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारत व्यापक विविधताओं का देश है तथा इस विविधता का संरक्षण जनतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। किसी भी तरह की तानाशाही अथवा अधिनायकवाद में विविधता का निषेध ही होता है। प्रोफेसर रायलु ने इस खतरे की ओर आगाह किया कि देश में जनतांत्रिक प्रक्रिया को भीतर ही भीतर नष्ट करने का महीन षड़यंत्र चल रहा है। एक तरफ अतिदक्षिणपंथी हैं जो भारत के संविधान को बदल देना चाहते हैं, तो दूसरी ओर अतिवामपंथी हैं जो संविधान में विश्वास ही नहीं रखते। इन दोनों से ही सावधान रहने की आवश्यकता है। एक अन्य वक्ता डॉ. अजय पटनायक ने इस बात पर चिंता जताई कि जनता और मीडिया में कथित विकास को लेकर तो बहसें हो रही हैं, किंतु गैरबराबरी और नाइंसाफी को लेकर जिस गंभीरता के साथ बहस होना चाहिए वह दूर-दूर तक नहीं दिखती। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि धर्मनिरपेक्षता हमारे जनतंत्र का प्रमुख आधार है और इसे बचाना बेहद जरूरी है।'

(देशबन्धु में 06 फरवरी 2014 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/02/21.html

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