विरोध और असहमति के दमन से कमजोर पड़ता लोकतंत्र

सरकार ने असहमति और असंतोष की आवाजों को दबाने की सुनियोजित मुहिम चला रखी है। निश्चित रूप से इसका गवर्नेंस पर असर पड़ रहा होगा।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-23 21:30 GMT
  • राजेश पांडेय

सरकार ने असहमति और असंतोष की आवाजों को दबाने की सुनियोजित मुहिम चला रखी है। निश्चित रूप से इसका गवर्नेंस पर असर पड़ रहा होगा। जब मंत्री अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं तो इसका सीधा संदेश नीचे तक जाता है। अफसरशाही अपने हिसाब से काम करने लगती है। उसे किसी तरह की कार्रवाई का भय नहीं रहता है।

पिछले कुछ दिनों से देश की राजधानी दिल्ली का घटनाक्रम और उसकी कुछ तस्वीरों ने निराशा और असंतोष का भाव पैदा किया है। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस के बेरहम लाठीचार्ज से लोग विचलित हुए हैं। उसके बाद प्रधानमंत्री आवास के पास धरना दे रहे विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ धक्का-मुक्की और उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत लेने की घटना भी अप्रत्याशित है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की अगुआई में छात्र 20 जून से जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं। उनके समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगुचक 28 जून से अनशनरत हैं। केंद्र की एनडीए सरकार ने छात्रों और वांगचुक से बातचीत की पहल देर से की है। नीट पेपर लीक के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे छात्रों का आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण रहा है। लिहाजा, उनके खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग समझ से परे है। छात्रों की मांग के समर्थन में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का आक्रामक रूख विरोध के दमन और तिरस्कार की रणनीति का हिस्सा है।

छात्रों के मुद्दे का संबंध उनके भविष्य से जुड़ा है। बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। इसलिए पेपर लीक ने युवाओं को ज्यादा उद्वेलित किया है। किसी परीक्षा में बैठ रहे छात्रों की मानसिक हालत का अंदाजा लगाइए जब उन्हें पता लगता है कि वे जिस परीक्षा के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं, उसका पेपर तो पहले ही लीक हो चुका है। पिछले कुछ वर्षों से बड़ी संख्या में परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का गठन प्रतियोगी परीक्षाओं को साफ-सुथरा और सक्षम बनाने के उद्देश्य से किया गया है। लेकिन नतीजे उलटे निकले हैं। एजेंसी पेपर लीक नहीं रोक पाई है। कुछ मामूली लोगों के खिलाफ कार्रवाई के अलावा सिस्टम में बड़े सुधार के प्रयास सामने नहीं आए हैं। यह उच्च पदों पर आसीन लोगों की जवाबदेही तय नहीं करने का नतीजा है।

12 साल में पहला मौका है जब दिल्ली में हजारों युवाओं का कूच हुआ है। वैसे, मोदी सरकार के खिलाफ दो बड़े आंदोलन हुए हैं। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में दिसंबर 2019 में शुरु हुआ धरना मार्च 2020 तक चला था। शाहीन बाग, दिल्ली में मुस्लिम महिलाओं का धरना दुनियाभर में चर्चित हुआ था। कोविड-19 लॉकडाउन के कारण आंदोलन पर परदा गिर गया। 2020 में कृषि सुधारों के नाम पर लाए गए तीन कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लगभग एक साल तक आंदोलन छेड़ा था। विरोध को तरजीह न देने की नीति के तहत सरकार चुपचाप बैठी रही। उसने आंदोलन को बेअसर करने के कई तरीके आजमाए थे। किसान एक बड़ा वोट बैंक है। इसलिए सरकार को मजबूर होकर तीनों कानून वापस लेने पड़े थे।

छात्रों के मौजूदा आंदोलन ने 2011-12 के अन्ना आंदोलन की याद दिलाई है। अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन किया था। उनके समर्थन में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांतभूषण, योगेंद्र यादव और कई एक्टिविस्ट, फिल्म स्टार सामने आए थे। योग गुरू बाबा रामदेव और आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर भी सक्रिय रहे। आंदोलन लंबा चला। उसमें देश के कई राज्यों से लोग जुटे थे। कई दूसरे शहरों में लोगों ने विरोध जताया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आंदोलन को सहारा दिया था। वह परदे के पीछे सक्रिय थी। उस वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आंदोलनकारियों से बातचीत के लिए वरिष्ठ मंंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुआई में मंत्रियों की समिति बनाई। समिति ने धरना स्थल पर जाकर आंदोलनकारियों से बातचीत की थी। अन्ना आंदोलन से सबसे अधिक फायदा भाजपा को मिला है। वह 2014 में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई। उसने 2015 में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर सिंहासन की कमान संभाली थी।

2011-12 और मौजूदा राजनीतिक स्थितियों में काफी अंतर आ चुका है। उस दौर में सत्ता के प्रमुख स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका काफी हद तक जीवंत और स्वतंत्र थे। लोकतंत्र का चौथा खंभा मीडिया आजादी से काम करता था। इन दिनों संसद और अधिकतर विधानसभाओं में बहस का दायरा सिमट रहा है। संसद में विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों और विषयों पर अक्सर बहस की अनुमति नहीं मिलती है। महत्वपूर्ण विधेयक चर्चा के बिना कानून बन जाते हैं। संसदीय नियमों की आड़ में बहस पर अंकुश लगा दिया गया है। कार्यपालिका तो पूरी तरह नतमस्तक है। न्यायपालिका की स्थिति भी उम्मीदें नहीं जगाती है। कई अहम मसलों पर वह सरकार के पक्ष में रहती है।

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका विपक्ष के पूरक जैसी होती है। वह शासकों से जवाब मांगता है, कानून का शासन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। याद कीजिए अन्ना आंदोलन को किस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबारों का समर्थन मिला था। टीवी चैनलों पर आंदोलन का लाइव प्रसारण चलता था। आए दिन सरकार के खिलाफ सनसनीखेज भंडाफोड़ होते थे। आरोपों के सीरियल जैसे चलते थे।

आज देखिए अखबार, टीवी चैनल और डिजिटल मीडिया विपक्ष की आवाज को अहमियत नहीं देते हैं। उलटे मीडिया का एक हिस्सा विपक्ष के पीछे पड़ा रहता है। सरकार की खामियों को सामने लाने की बजाय वह विपक्ष को निशाना बनाता है। यह आश्चर्यजनक बदलाव पहले नहीं देखा गया था। इसके पीछे प्रलोभन के अलावा सरकारी कार्रवाई के डर की भूमिका हो सकती है। लोकतंत्र के लिए ऐसी स्थिति चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत में सिर्फ इमरजेंसी के दौरान मीडिया दमन का शिकार हुआ था। उस वक्त सेंसरशिप लागू थी। कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था।

इन दिनों सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को मीडिया में अपेक्षित जगह नहीं मिलती है। 2015 से मीडिया के बड़े हिस्से ने सरकार के सामने जैसे समर्पण कर रखा है। प्रधानमंत्री के लगभग हर भाषण का लाइव प्रसारण होने लगा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी, मीडिया के स्वामित्व का केंद्रीकरण, उसके एक हिस्से का राजनीतिकरण और सिविल सोसायटी पर दबाव की वजह से ऐसी स्थिति बनी है। सरकार के लिए असुविधाजनक संस्थानों को कुछ पूंजीपतियों ने खरीद लिया है। 2024 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण मीडिया के स्वर में थोड़ा बदलाव आया है। अब विपक्ष को पहले से अधिक जगह मिल रही है। मीडिया में सरकार विरोधी तेवर दिखाई पड़ने लगे हैं।

मोदी सरकार यह मानकर चल रही है चूंकि उसे चुनाव में बहुमत मिल गया है इसलिए वह मनमाने तरीके से काम कर सकती है। देश को नुकसान पहुंचाने वाले फैसलों के लिए अब तक किसी मंंत्री को इस्तीफा नहीं देना पड़ा है। गलतियों को स्वीकार करने की परंपरा खत्म हो चुकी है। हालांकि, भारत में केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफों का इतिहास बहुत पुराना है। जवाहरलाल नेहरू की सरकार में टीटी कृष्णमाचारी और कृष्ण मेनन को इस्तीफा देना पड़ा था। यूपीए सरकार में नटवरसिंह, ए राजा और दयानिधि मारन को पद छोड़ना पड़ा था। लेकिन मोदी सरकार के साथ ऐसा नहीं है।

आंदोलन, आलोचना और विरोध के प्रति सरकार का रवैया उदार नहीं है। खुली बहस के अधिकतर दरवाजे बंद किए जा रहे हैं। डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने के लिए संबंधित कानूनी प्रावधान कड़े किए गए हैं। इस रुख की तस्वीर प्रेस की आजादी और लोकतंत्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय मानदंडों में भारत की गिरती रैकिंग में देख सकते हैं। पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने भारत को 180 देशों में 157 वें स्थान पर रखा है। स्वीडन की वी डेम इंस्टीट्यूट ने उदार लोकतंत्र सूचकांक में भारत को निर्वाचित तानाशाही की श्रेणी में शामिल किया है। उसे 105वीं रैंक दी है।

सरकार ने असहमति और असंतोष की आवाजों को दबाने की सुनियोजित मुहिम चला रखी है। निश्चित रूप से इसका गवर्नेंस पर असर पड़ रहा होगा। जब मंत्री अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं तो इसका सीधा संदेश नीचे तक जाता है। अफसरशाही अपने हिसाब से काम करने लगती है। उसे किसी तरह की कार्रवाई का भय नहीं रहता है। ये सब प्रवृत्तियां सुशासन के साथ लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती हैं। स्वस्थ लोकतंत्र को बहस, संवाद, आंदोलनों और अभिव्यक्ति की आजादी से मजबूती मिलती है। इन प्रवृत्तियों और गतिविधियों को दबाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था सही अर्थों में जीवंत नहीं रह सकेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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