देशभक्ति के बाद अब हिन्दू होने का भी सर्टिफिकेट !
राहुल ने देश की राजनीति से हिन्दू मुसलमान के सवाल को हटाकर शिक्षा, स्कूल, नौकरी, गरीबी, महंगाई जैसे असली सवालों को ला खड़ा किया है।;
- शकील अख्तर
राहुल ने देश की राजनीति से हिन्दू मुसलमान के सवाल को हटाकर शिक्षा, स्कूल, नौकरी, गरीबी, महंगाई जैसे असली सवालों को ला खड़ा किया है। इसकी कोई काट मोदी के पास नहीं है। इसलिए भागवत उनकी मदद के लिए आए हैं। और हिन्दू-मुसलमान को नए रंग में लाकर कोशिश कर रहे हैं कि देश में अजेंडा फिर इसी मुद्दे पर सेट हो जाए।
राहुल की बातों और मोहन भागवत की बातों में यही फर्क है। राहुल जो कहते हैं करने के लिए और मोहन भागवत से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक जो कहते हैं वह सामने वाले को बेवकूफ बनाने के लिए। और सामने उनके अपने ही लोग होते हैं उन्हें ही मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं। समस्या यह है कि उनकी पूरी ट्रेनिंग ही नकारात्मक विचारों के बीच हुई है। यह मानकर कि कु छ भी कहा जा सकता है और किया उसका ठीक उल्टा भी जा सकता है।
भागवत जी अमेरिका में हिन्दुओं पर ही सवाल उठा रहे हैं। उन्हीं हिन्दुओं पर जिनके लिए सौ साल पहले उनका संगठन बना था और आज भी वह नहीं कहता कि यह भारतीयों का संगठन है, वही कहता है कि हिन्दुओं का संगठन। वहां न्यूयार्क में वे कहते हैं कि जो हिन्दू यह समझता है कि मुस्लिम भारत में नहीं रह सकते वह हिन्दू नहीं है।
वाह! हालांकि यह बयान बहुत विरोधाभासी है और संघ के लिए इस तरह की बातें करना कोई नई चीज नहीं है मगर फिर भी इसकी छुपी हुई परतें खोलना होगीं। क्योंकि भाजपा संघ इसके सहारे अपने को उदार बताने की कोशिश करेगा और गोदी मीडिया इसका ढोल पीटेगा। जो उसने शुरू कर दिया है।
तो नंबर एक यह बयान राहुल के छात्र- युवा, महिला, दलित, ओबीसी के मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए दिया गया है। और अपने एवं भाजपा के प्रिय विषय हिन्दू-मुसलमान पर फिर से बहस को लाने के लिए। हिन्दू-मुसलमान ही इनकी प्राण वायु है। वह कम होते ही यह छटपटाने लगते हैं।
राहुल ने देश की राजनीति से हिन्दू मुसलमान के सवाल को हटाकर शिक्षा, स्कूल, नौकरी, गरीबी, महंगाई जैसे असली सवालों को ला खड़ा किया है। इसकी कोई काट मोदी के पास नहीं है। इसलिए भागवत उनकी मदद के लिए आए हैं। और हिन्दू-मुसलमान को नए रंग में लाकर कोशिश कर रहे हैं कि देश में अजेंडा फिर इसी मुद्दे पर सेट हो जाए।
लेकिन वे राहुल को नहीं जानते। यह समय उनका आ गया है। और वे बहुत साफ कहते हैं कि भाजपा-संघ क्या कह रहे हैं इससे मुझे कोई मतलब नहीं। प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेकर शनिवार को प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि- उनके कहने या न कहने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। और राहुल जब इस तरह संघ भाजपा के मुद्दों को नजरअंदाज करेंगे तो वह फिर देश का मुख्य मुद्दा बन ही नहीं सकता। और बिना हिन्दू-मुसलमान के मुद्दे के मोदी राजनीति नहीं कर सकते और भागवत संघ नहीं चला सकते।
दूसरी बात भागवत ने यह बयान न्यूयार्क में दिया है। 2018 के एक कार्यक्रम का हवाला देकर। उसके बाद लंबा समय हो गया। 8 साल। भारत में भी यह बात कह सकते थे। मगर अमेरिका में कहा क्यों? क्योंकि वहां उनकी विभाजनकारी नीतियों का बहुत विरोध हो रहा है। लोग प्लेकार्ड लेकर सड़कों पर उतरे हैं। न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा कि मेरे पास अधिकार नहीं हैं वरना मैं किसी विभाजनकारी विचारधारा को यहां फैलाने की इजाजत नहीं देता।
न्यूयार्क बहुलतावादी विचारों का शहर है। और संघ के विचार इसके ठीक उलट हैं। उनके अलावा मानवाधिकार संगठनों ने साफ कहा कि संघ की विचारधारा असहिष्णुता और भेदभाव को बढ़ावा देती है। और वहां खासतौर से क्रिश्चयन की बात ज्यादा हुई कहा कि उनके और मुस्लिम के खिलाफ नफरत फैलाते हैं। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद सबसे पहले चर्च जलाने, उन्हें तोड़ने की ही घटनाएं हुईं।
तो भागवत के लिए वहां अपनी सफाई देना जरूरी था। भारत के बाद दुनिया के लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए। मगर विचार बदले बिना चोला बदलने से कुछ नहीं होगा। आज के जमाने में जब जानकारियां सबके पास हों तो आपका कहो कुछ करो कुछ नहीं चल सकता।
संघ और भाजपा अपनी सबसे बड़ी ताकत अपने कई चेहरे ही समझते थे। मगर जब तक आपको कुछ काम करने का मौका न मिले तब तक तो चल जाता है। लेकिन जब सत्ता में आ गए और साढ़े बारह साल हो गए तो सबको मालूम पड़ गया कि यह बोलते कुछ हैं और करते कुछ।
अभी न्यूयार्क में जो कहा है उसका संबंध मुस्लिम से उतना नहीं है। जितना हिन्दू से है। उस हिन्दू से जिसे हमेशा मुस्लिम के खिलाफ भड़काते रहे। पचासों उदाहरण हैं। जिन्हें बार-बार बताने से कोई फायदा नहीं। सबको कुछ न कुछ याद हैं। उनसे अब कह रहे हैं कि अगर तुम मुस्लिम को भारत से बाहर करने की सोच रहे हो तो तुम हिन्दू नहीं!
बताइये हिन्दुओं का सबसे बड़े ठेकेदार बनने वाला संघ अब उन्हें कह रहा है कि तुम हिन्दू नहीं! अभी तक देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटते थे अब हिन्दू होने के भी बांटने लगे!
क्या होगा गिरराज सिंह का जो सबको पाकिस्तान भेजा करते हैं। और वे मोदी सरकार में मंत्री हैं इसलिए उनका नाम सबसे ज्यादा याद आ जाता है मगर ऐसे जाने कितने इनके मुख्यमंत्री, सांसद और दूसरे नेता हैं जो भारत से निकालने के साथ और भी क्या-क्या कहते रहते हैं।
भागवतजी क्या इन्हें हिन्दू धर्म से निकालेंगे? अब तो हालत यह कर दी है कि इनके नेता मुख्यमंत्री शंकराचार्यों को भी कुछ भी कह देते हैं। तो क्या भागवत जी वहीं विदेश से मैसेज देंगे कि ऐसे सभी लोगों को मैं भारत आने के साथ धर्म बाहर कर दूंगा?
भागवत एक असफल प्रयास कर रहे हैं। नरेटिव बदलने का। जिस काम के मोदी एक्सपर्ट थे वे नहीं कर पाए तो अब भागवत के कहने से उनकी, मोदी की, संघ की, भाजपा की छवि नहीं सुधरने वाली। देश के साथ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी अब यह स्थापित हो गया है कि संघ भाजपा मोदी विभाजनकारी विचारों के हैं। बहुलतावाद के विरोधी। इसीलिए भागवत को विविधता में एकता कहना पड़ा।
यही तो संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है। और राहुल संविधान की प्रति लेकर यही तो बताते हैं। आज जब देश में दलित, पिछड़े, आदिवासी के खिलाफ दक्षिण के राज्यों के खिलाफ, विभिन्न खान-पान के खिलाफ यहां तक की कपड़ों पर जिसे खुद प्रधानमंत्री कहते हैं कि कपड़ों से पहचान लेते हैं, भाषा, महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है जिसे गर्व से कहते हैं डबल इंजन की सरकार वह कह रही है कि जिन ड्राइवरों को मराठी नहीं आती वे आटो टैक्सी नहीं चला सकते। ये हिन्दी वालों के ही खिलाफ है। वे ही हैं मुम्बई में आटो टैक्सी ड्राइवर। उन हिन्दी प्रदेशों से जहां सब जगह इनकी ही डबल इंजन सरकार है।
हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्थान! इनका मुख्य नारा था। मगर जब देश से लेकर विदेश तक सब जगह इनकी नफरत और विभाजन की विचारधारा को मानवता विरोधी बताया जाने लगा तो भागवत को वहां न्यूयार्क में कहना पड़ा कि पूरी मानवता एक है।
दरअसल नई पीढ़ी जिसे जेन जी और जेन अल्फा कहा जाता है इनके प्रभाव से बिल्कुल बाहर जा चुकी है। एकदम राहुल की तरह कि ये क्या कहते हैं हमें इससे कोई मतलब ही नहीं। इसलिए अब भागवत या मोदी जो भी बातें करें उसका कोई महत्व नहीं है।
पीढ़ीगत बदलाव हो गया है। और यह सिर्फ उम्र के हिसाब से नहीं है विचारों के हिसाब से है। नकारात्मक विचारों के स्थान पर सकारात्मकता। पीछे जाने के बदले आगे बढ़ने का जोश।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)