'मथे ना माखन होय' की ओर बढ़ता देश
इस देश में अल्पसंख्यकों- ख़ास तौर पर मुसलमानों के प्रति घृणा का भाव दूर-दूर और बहुत गहराई तक फैल चुका है
- निर्मला भुराड़िया
यह बात बहुत आम हो चुकी है कि रामनवमी आदि अवसरों पर गले में केसरिया गमछा डाले, हाथ में केसरिया ध्वज और तलवार वगैरह लिए तथाकथित धर्मरक्षक अपना जुलूस मस्जिद के सामने से निकालते हैं, वह भी डीजे पर नफ़रत से भरे गाने बजाते हुए। हाल ही में इस तरह के गाने चुनरी यात्राओं और धार्मिक शोभायात्राओं के लिए खासतौर पर बनाए गए हैं।
इस देश में अल्पसंख्यकों- ख़ास तौर पर मुसलमानों के प्रति घृणा का भाव दूर-दूर और बहुत गहराई तक फैल चुका है। हर उम्र, हर वर्ग और हर लिंग के लोग इस घृणा रोग से पीड़ित दिखाई देते हैं। उनमें अनपढ़ या अर्द्ध शिक्षित तो हैं ही, उच्च शिक्षा प्राप्त भी शामिल हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है बेंगलुरु के पीईएस विश्वविद्यालय में अफ़्फ़ान नामक मुस्लिम छात्र को प्राध्यापक डॉ. मुरलीधर देशपांडे द्वारा एक नहीं, बल्कि 13 बार 'आतंकवादी' कहकर संबोधित किया जाना। डॉ. देशपांडे ने कहा, 'ईरान युद्ध तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से हुआ,' 'ट्रम्प तुम्हें ले जाएगा,' और 'तुम मूर्ख हो, तुम नरक में जाओगे।' ये टिप्पणियां भरी कक्षा में अन्य छात्रों के सामने की गईं। अफ़्फ़ान का समर्थन करने वाले कुछ छात्रों को कथित तौर पर 'कक्षा के दौरान बात करने' के लिए निलंबित कर दिया गया। प्रोफ़ेसर ने बाद में कॉलेज से माफ़ी मांगी, लेकिन पीड़ित छात्र से नहीं।
धार्मिक लेकिन आम तौर पर सांप्रदायिकता से परहेज रखने वाले दक्षिण भारत में यह हुआ, उसके दो दिन बाद राष्ट्रीय राजधानी से सटे गाज़ियाबाद के ओपुलेंट मॉल में पहनावे के आधार पर भेदभाव का शर्मनाक मामला सामने आया। यहां मॉल प्रबंधन ने मोहम्मद सैफुल्ला नामक दुकानदार को कुर्ता-पायजामा पहनने की वजह से कारोबार करने से रोक दिया। मॉल प्रबंधन का कहना था कि मालिकों ने दाढ़ी और कुर्ता पायजामा पहनकर कारोबार करने वाले सभी लोगों का प्रवेश निषेध किया हुआ है। इसके बाद उनकी दुकान कई दिन बंद रही। दुकान सैफुल्ला के नाम से ली गई थी लेकिन कारोबार उनके छोटे भाई फैज़ संभालते थे, जो कि धार्मिक रीति रिवाज़ का पालन करते हुए दाढ़ी रखते हैं और कुर्ता-पायजामा, टोपी पहनते हैं। सैफुल्ला ने इस मामले में पुलिस से गुहार लगाई लेकिन वे अभी तक कार्रवाई का इंतज़ार ही कर रहे हैं।
हाल ही में बनारस में रमज़ान के दौरान 14 मुस्लिम लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया गया, क्योंकि एक भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि इन्होंने नाव में सवार होकर गंगा में इफ़्तार पार्टी की और चिकन बिरयानी खाकर पवित्र जल में हड्डियां फेंक दी। इससे उनकी और अन्य हिन्दुओं की भावनाएं आहत हो गई हैं। इस घटना को मुख्य धारा के टीवी मीडिया ने बहुत जोर-शोर से उछाला। आख़िर आहत भावनाओं से टीआरपी कमाने का मौका था। उत्तेजक उद्घोषों- 'यह ख़बर देखिए, इसे देखकर आपका भी ख़ून खौल उठेगा' के साथ बार-बार यह खबर चलाई गई और कहा गया कि यह सनातन पर हमला है। ज़ाहिर है इसका मकसद धार्मिक उत्तेजना फैलाना और समुदाय विशेष को प्रताड़ित करना ही था, वरना तो गंगा और अन्य पवित्र नदियों को हम सभी जिस तरह प्रदूषित और गंदा कर रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। नदियों की सफ़ाई के बहुप्रचारित प्रोजेक्ट तो कभी पूरे होते ही नहीं। ऐसे में सिर्फ मुस्लिम लड़कों को पकड़ना, साफ़ तौर पर उन्हें निशाने पर लेना ही है।
पिछले एक दशक से यही कुछ चल रहा है। शासन, प्रशासन और तथाकथित धार्मिक संगठनों द्वारा लोगों के दिमाग में ज़हर भरकर मुसलमानों को टारगेट करने, प्रताड़ित और अपमानित करने के मामले इतने हैं कि उनकी केवल फेहरिस्त बनाने पर ही अच्छा-खासा पोथन्ना तैयार हो जाएगा। 2015 में दादरी के एक गांव में अफवाह फैली थी कि अखलाक नामक एक शख्स के घर गौमांस रखा हुआ है। महज इस अफ़वाह और शक की बिना पर ही लोग उसके घर में घुस गए, उसे बाहर निकाला और फिर भीड़ ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। यह न पहली घटना थी न आखिरी। तथाकथित गौ रक्षक दल गांव-गांव घूमते हैं, जाने किस अधिकार से वाहनों को रोककर जांच करते हैं। अक्सर झूठी शंका में वाहन मालिक / चालक के साथ मारपीट करते हैं,अगर वह मुसलमान हुआ तो उसकी जान तक लेने पर उतारू हो जाते हैं।
यह बात बहुत आम हो चुकी है कि रामनवमी आदि अवसरों पर गले में केसरिया गमछा डाले, हाथ में केसरिया ध्वज और तलवार वगैरह लिए तथाकथित धर्मरक्षक अपना जुलूस मस्जिद के सामने से निकालते हैं, वह भी डीजे पर नफ़रत से भरे गाने बजाते हुए। हाल ही में इस तरह के गाने चुनरी यात्राओं और धार्मिक शोभायात्राओं के लिए खासतौर पर बनाए गए हैं, मसलन- 'हम हिंद के गद्दारों को मिलकर सबक सिखाएंगे, अब ऐसे बाबर की छाती में हम भगवा लहराएंगे।' ये धर्मरक्षक मस्जिद पर चढ़कर भगवा झंडा लगाने को बहादुरी समझते हैं। दरअसल, इस तरह मुसलमानों को उकसाया जाता है ताकि वह प्रतिक्रिया करें तो उन्हें और प्रताड़ित किया जा सके। कानून, अदालत सबूत जुटाए, फै़सला करें उसके पहले ही विध्वंस की कार्रवाई हो चुकी होती है। अदालती प्रक्रिया के बगैर ऐसा करना इंसाफ़ है या पाप- यह थोड़ा भी दिमाग दौड़ाने पर समझा जा सकता है।
इस नफ़रत को संस्थागत करने की कोशिश की जा रही है, तरह-तरह के कानून बनाकर। जैसे कांवड़ यात्रा के रास्ते पर दुकानदारों को अनिवार्य रूप से नेम प्लेट लगाने का आदेश, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हमने देखा है कि कांवड़ यात्रा के दौरान बहुत से स्वयंसेवक हाथ में पवित्र जल के पात्र के बजाय लाठी लिए, गले में केसरिया गमछा लटका कर घूमे और दुकान-दुकान जाकर देखा कि कोई ठेले वाला या दुकान वाला मुस्लिम हो और उसने अपनी नेम प्लेट न लगाई हो। कुछ जगह तो यात्रा मार्ग में पड़ने वाली मस्जिदों-मज़ारों पर पर्दा लगाकर उन्हें ढंका गया। गोया उन पर नज़र पड़ने भर से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! इस बीच भगवाधारियों ने तोड़फोड़ भी की, लेकिन खबरिया चैनलों ने बताया कि कांवड़िए अपनी आहत भावनाओं का बदला ले रहे हैं।
लव जिहाद, थूक जिहाद, ज़मीन जिहाद, नौकरी जिहाद, ये जिहाद, वो जिहाद जैसे कई नव आविष्कृत शब्द हमारी शब्दावली में घुसा दिए गए। कोरोना के वक्त यह बात जोर-शोर से उठाई गई कि देश में बीमारी फैलाने के लिए मुस्लिम जान करके खाने की चीजों पर थूकते हैं। इसे थूक जिहाद बताया गया। हद तो यह है कि बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने इस दुष्प्रचार पर विश्वास किया और मुसलमानों को दोगुनी नफ़रत से देखा, अलग-थलग किया। ऐसे झूठे इल्जाम से कभी सब दिलों की धड़कन रहे शाहरुख़ ख़ान को भी नहीं बख्शा गया। लता मंगेशकर के निधन पर शाहरुख ने अपने रिवाज़ के अनुसार दुआ फूंकी तो इस बात ने ज़ोर पकड़ लिया कि शाहरुख़ ने लता जी की श्रद्धांजलि में थूका।
धर्म, सत्ता और मुख्यधारा का मीडिया जैसे सबसे बड़े शक्ति केंद्र, पूरी ताकत से आम आदमी की सोच बदलने में लगे हैं। अदालतों की हिदायत के बावजूद खुलेआम नफ़रती भाषण चल रहे हैं, जिसने आम जनता के दिमाग पर गहरा असर किया है। आज हम आम लोगों के मुंह से लगातार सुनते हैं कि वो लोग तो ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। प्रधानमंत्री खुद कहते हैं कि वे तुम्हारा मंगलसूत्र छीन लेंगे, तुम्हारी भैंस छीन लेंगे। यानी जिन सत्ताधीशों के लिए सारी जनता एक समान होना चाहिए वे भी हमें 'हम और वे' में हमें बांट रहे हैं। घृणा, तिरस्कार और प्रताड़ना का यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब 'हम मथे ना माखन होय' की स्थिति में जा पहुंचेंगे।
(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)