ललित सुरजन की कलम से- मोदी, हिन्दी और संस्कृत

'मेरा कहना है कि जो लोग संस्कृत पर मुग्ध हैं अथवा जो हिन्दी का वर्चस्व चाहते हैं उन्हें सांकेतिकता से आगे बढ़कर कुछ बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए।;

By :  DB Desk
Update: 2026-06-16 22:00 GMT

'मेरा कहना है कि जो लोग संस्कृत पर मुग्ध हैं अथवा जो हिन्दी का वर्चस्व चाहते हैं उन्हें सांकेतिकता से आगे बढ़कर कुछ बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए। पहले संस्कृत की ही बात लें। मैंने जैसा कि ऊपर कहा- संस्कृत में अनुपम साहित्य रचना हुई, लेकिन उससे कितने लोग परिचित हैं।

क्या यह सच नहीं है कि संस्कृत को हमने एक संकीर्ण धार्मिक दायरे में बांधकर रख दिया है? हम समझते हैं कि किसी भी अनुष्ठान में संस्कृत में मांगलिक श्लोक पढऩे से संस्कृत का पुर्नरुद्धार हो जाएगा, लेकिन इसके बरक्स यह देखें कि हमारे देश में संस्कृत की पढ़ाई का क्या हाल है! जो विद्यार्थी संस्कृत विषय लेते हैं वे हिन्दी में प्रश्न पत्र हल करने की मांग करते हैं याने हमारे शिक्षातंत्र में संस्कृत पढ़ाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है।

गिनती के दस श्लोक रट लेने को ही तो संस्कृत ज्ञान नहीं माना जा सकता। यदि सुषमा स्वराज, डॉ. हर्षवर्धन और हमारे पत्रकार बंधु तरुण विजय की संस्कृत के प्रति ऐसी निष्ठा है तो उन्हें स्मृति ईरानी से कहकर सबसे पहले संस्कृत की पढ़ाई सुचारु हो सके इसका प्रबंध करना चाहिए।'

(देशबन्धु में 12 जून 2014 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/06/blog-post_11.html

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