खरगे के सवाल, भागवत के जवाब
प्रियांक खरगे के सवालों का सीधा जवाब न देकर हिंदू धर्म के नाम पर उलझाने की कोशिश में भागवत ने बड़ी गलती कर दी है।;
प्रियांक खरगे के सवालों का सीधा जवाब न देकर हिंदू धर्म के नाम पर उलझाने की कोशिश में भागवत ने बड़ी गलती कर दी है। अगर संघ के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो फिर पंजीकरण कराएं और सारे कागजात पेश कर दें। हिंदू धर्म के पंजीकरण की बात को खरगे ने की नहीं है, उन्होंने संघ के पंजीकरण के बारे में पूछा है। अगर हिंदू धर्म का नाम लेकर कानूनी औपचारिकताओं से बचने का खेल शुरु हो जाए, तो फिर देश में ऐसी अराजकता कायम होगी, जिसे संभालना मुश्किल होगा।
कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कुछ आधिकारिक जानकारियां उपलब्ध कराने कहा है, जिस पर देश की सियासत में नया विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। 1925 में बना संघ इस समय पूरे देश में घूम-घूमकर अपनी शताब्दी का उत्सव मना रहा है। जिस संस्था ने सौ सालों का सफर तय किया हो, उसके पास दिखाने-बताने के लिए बहुत कुछ होगा। संघ कोई अमूर्त कल्पना, आभासी अवधारणा तो नहीं है, जिसके बारे में ठोस तौर पर कुछ कहा न जा सके। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अच्छा-खासा मुख्यालय है, हर साल यहां संघ का स्थापना दिवस दशहरे पर मनाया जाता है। इसमें हिंदुत्व की तरफ झुकाव रखने वाली देश की नामचीन हस्तियां शिरकत करती हैं। संघ के बाकायदा पदाधिकारी बने हुए हैं, सरसंघचालक से लेकर स्वयंसेवक तक सबकी जिम्मेदारियां तय हैं। 2014 के बाद से यानी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विजयादशमी पर संघ प्रमुख के भाषण का प्रसारण प्रसार भारती के तहत आने वाले दूरदर्शन पर होता है, यानी सरकार संघ को कितना महत्व देती है, यह भी जाहिर है। संघ प्रमुख मोहन भागवत को जेड प्लस सुरक्षा मिली है, यानी आम आदमी के दिए गए टैक्स के पैसे से सरकार भागवत को सर्वोच्च श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करा रही है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को सांस्कृ तिक संगठन कहता है। देश में कई कला अकादमियां हैं, इंटैक, स्पीकमैके, इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ जैसे संगठन हैं, जिनका उद्देश्य भारत की कला, संस्कृति, संगीत, साहित्य आदि को संरक्षित और संवर्द्धित करना है, लेकिन इनके प्रमुखों के लिए सरकारी सुरक्षा कभी मुहैया नहीं कराई गई, तो फिर मोहन भागवत को ऐसी सुरक्षा क्यों मिली हुई है, ऐसे सवाल उठते ही हैं। लिहाजा प्रियांक खरगे ने भी कर्नाटक के गृहमंत्री होने के नाते अपने पद के दायरे में रहकर सवाल किए हैं। जिस पर अनावश्यक विवाद खड़ा करने की जगह एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मोहन भागवत को सीधे जवाब देने चाहिए। मगर वे इसमें हिंदू धर्म को बीच में ले आए हैं।
प्रियांक खरगे ने संघ से केवल आठ बिंदुओं पर जवाब मांगा है।
1. राष्ट्रीय स्वयं संघ की कानूनी स्थिति और संगठनात्मक संरचना।
2. इसके पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों का विवरण।
3. दान, योगदान और आय के स्रोत।
4. खर्च और संपत्ति का विवरण।
5. क्या कानून के अनुसार लागू करों का भुगतान किया जा रहा है।
6. वह कानूनी आधार जिस पर औपचारिक पंजीकरण के बिना संगठन की गतिविधियां संचालित की जाती हैं।
7. वह संवैधानिक और वैधानिक ढांचा जिसके तहत यह सार्वजनिक जवाबदेही के बिना इतने बड़े पैमाने पर काम करने का अधिकार होने का दावा करता है।
8. सार्वजनिक कार्यक्रमों, रूट मार्च, जनसभाओं और अन्य संगठित गतिविधियों के लिए अनुमतियों, प्राधिकरणों और अनुपालन तंत्रों का विवरण।
प्रियांक खरगे के पास इस सवालों को पूछने का कारण भी उपलब्ध है। उन्होंने मोहन भागवत को पत्र में लिखा है कि संघ की सबसे बड़ी और अहम फैसला लेने वाली संस्था 'अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा' की 2025-26 की कर्नाटक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में संघ की 4,127 रोजाना शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन, 60 मासिक मंडलियां और 2,194 समाजोत्सव (जिनमें 19.61 लाख लोग शामिल हुए) हैं। इतना ही नहीं 2.21 लाख वर्दीधारी प्रतिभागियों के साथ 562 रूट मार्च भी आयोजित किए गए। इतने बड़े पैमाने और प्रभाव के साथ संघ को अपनी कानूनी स्थिति, रजिस्ट्रेशन, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए जरूरी मंजूरियों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए।
गृहमंत्री होने के नाते उन्हें यह राज्य की सुरक्षा के मद्देनजर ऐसे सवाल करने ही चाहिए, क्योंकि लाखों लोग अगर संघ के कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं, तो उसके लिए सार्वजनिक स्थलों का ही इस्तेमाल हो रहा है और यह सीधे कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला है। इन सवालों में न कहीं आपत्तिजनक बात कही गई है, न कोई ऐसा राज पूछा गया है, जिससे कोई कमजोर नस दबी हो, फिर भी मोहन भागवत को इसमें राजनीति नजर आ रही है।
मोहन भागवत ने संघ के पंजीकरण की मांग को खारिज करते हुए कहा कि संगठन के पास न तो कुछ छिपाने के लिए है और न ही वह जनता की नजरों से बचकर काम करता है। उन्होंने साफ कहा है कि 'बहुत-सी अपंजीकृत चीजें संचालित हो रही हैं और हम कोई बात छिपाते नहीं हैं। हम खुलेआम काम करते हैं। हम लोगों को बुलाते हैं और उन्हें बताते हैं कि हम क्या करते हैं।'
भागवत ने कहा, 'यह राजनीति है। इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं' हमें इसकी आदत हो गई है। संघ के अस्तित्व में आने के 10-15 साल बाद ही हमें इन सब चीजों का सामना करना पड़ा था। अगर ऐसा न हो, तो हमें लगता है कि कुछ गड़बड़ है।'
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित यह संगठन सार्वजनिक बहस और आम सहमति की प्रक्रिया से उभरकर सामने आया। भागवत ने कहा, 'हिंदू धर्म पंजीकृत नहीं है। कई चीजें पंजीकृत नहीं होतीं। जो लोग सरकार से निधि चाहते हैं, उन्हें पंजीकरण कराने की जरूरत होती है। भागवत ने ये भी कहा कि, 'सरकार ने हम पर दो बार प्रतिबंध लगाया। एक प्रतिबंध अदालत के आदेश के तहत और दूसरा सत्याग्रह के बाद हटाया गया। इसका मतलब है कि सरकार को आरएसएस के अस्तित्व के बारे में पता था।' उन्होंने कहा कि संगठन ने 1950 में सरकार को अपना लिखित संविधान सौंपा था और किसी भी अधिकारी ने कभी इस बात पर जोर नहीं दिया कि मान्यता मिलने से पहले उसके लिए पंजीकरण कराना जरूरी है।
भागवत ने कहा, 'पिछले 100 वर्षों में किसी ने हमसे नहीं कहा कि हमें पंजीकरण कराना होगा।'
आरएसएस प्रमुख ने आरोप लगाया कि ऐसी मांगों का मकसद आरएसएस के काम में बाधा डालना और लोगों के मन में संदेह पैदा करना है।
प्रियांक खरगे के सवालों का सीधा जवाब न देकर हिंदू धर्म के नाम पर उलझाने की कोशिश में भागवत ने बड़ी गलती कर दी है। अगर संघ के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो फिर पंजीकरण कराएं और सारे कागजात पेश कर दें। हिंदू धर्म के पंजीकरण की बात को खरगे ने की नहीं है, उन्होंने संघ के पंजीकरण के बारे में पूछा है। अगर हिंदू धर्म का नाम लेकर कानूनी औपचारिकताओं से बचने का खेल शुरु हो जाए, तो फिर देश में ऐसी अराजकता कायम होगी, जिसे संभालना मुश्किल होगा। इस समय राम मंदिर में ही गबन और चोरी का जो खेल हुआ है, वह क्या धर्म के नाम पर कम धोखा देना था, जो अब भागवत भी हिंदू धर्म का नाम लेकर पंजीकरण से मना कर रहे हैं। अगर पंजीकरण हो जाएगा तो क्या संघ का अस्तित्व खतरे में आएगा या उसके पैसों का हिसाब-किताब सामने आ जाएगा, आखिर किस बात की पर्दादारी की जा रही है। मोहन भागवत का यह तर्क भी अजीब है कि हम खुले में शाखाएं लगाते हैं। इस तरह के कुतर्क माने जाएं तो फिर देश का हाल चौपट हो जाएगा। रेहड़ी-पटरी वाले कहेंगे कि हम भी खुले में अपना कारोबार करते हैं तो नियमों को नहीं मानेंगे, गैर सरकारी संगठन भी भवनों की जगह खुले स्थानों पर अपनी गतिविधियां संचालित करेंगे और कहेंगे कि अब हमें सरकार को हिसाब-किताब देने की जरूरत नहीं। खुले में पांच मिनट की नमाज पढ़ने वाले मुस्लिमों के लिए तो भाजपा सरकारों में सौ तरह के नियम बना दिए जाते हैं, उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है। लेकिन खुले में लाठी चलाना हो तो सरकार को कोई दिक्कत नहीं। क्या संघ सरकार से भी ऊपर है।
और मोहन भागवत जो इल्जाम लगा रहे हैं कि संघ को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा करने की कोशिश है, तो साहब आप सारे जवाब देकर इस कोशिश पर पानी फेर दीजिए, इसमें आप झिझक क्यों रहे हैं। दरअसल मोहन भागवत संदेह पैदा करने वाली रणनीति को अच्छे से जानते-समझते हैं। आखिर मुसलमानों के लिए यही काम तो खूब किया जाता है। बार-बार उनसे देशभक्ति का सबूत मांगना, वंदे मातरम या जय श्रीराम न बोलने पर उन्हें पाकिस्तान जाने की सलाह देना ये काम भाजपा के शासन में खूब हो रहे हैं।
भाजपा सरकारों में शिक्षा देने के लिए बने मदरसों को भी शक के दायरे में लाया गया है। तालीम का धोखा, मदरसों का लेखा-जोखा जैसे शीर्षकों से दूरदर्शन पर कार्यक्रम हो चुके हैं। भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध फंडिंग, शिक्षा के आधुनिकीकरण और प्रशासनिक पारदर्शिता के नाम पर मदरसों से सवाल करती आई है। कभी पूछा जाता है कि मदरसों को मिलने वाला धन (विदेशी फंड सहित) कहां से आ रहा है। कभी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भाजपा सरकारें मदरसों के सर्वेक्षण और ऑडिट की मांग करती है, ताकि फर्जी या गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की पहचान की जा सके। भाजपा यह भी आरोप लगाती रही है कि टैक्स देने वालों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा मदरसों के तुष्टीकरण और विशेष समुदाय के अनुचित लाभ के लिए खर्च किया जाता है। तो जो चिंताएं मदरसों को लेकर हैं, वही संघ को लेकर क्यों नहीं हो सकतीं। इसमें भी तो लाखों लोग जुड़े हैं। अगर कभी किसी ने देशविरोधी काम किया तो उसकी पहचान के लिए भी संघ का पंजीकरण जरूरी है। और 1950 में सरकार को संघ का लिखित संविधान देने की बात भागवत ने की है, तो फिर उन्हें नरेन्द्र मोदी को भी ये बताना चाहिए कि देश में 1947 से सरकार चल रही है। क्योंकि हाल ही में मोदी ने खुद को सबसे लंबे वक्त का प्रधानमंत्री बताया है, जबकि नेहरूजी के आसपास अभी मोदी नहीं पहुंचे हैं।
बहरहाल, मोहन भागवत ने प्रियांक खरगे के सवालों के सीधे जवाब न देकर बता दिया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी डिग्री न दिखाने से लेकर पीएम केयर फंड का हिसाब-किताब न देने का दुस्साहस कहां से हासिल किया है।