संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और विपक्ष की चुनौतियां

भारत में केंद्र और राज्य की सरकारें वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी जाती हैं। शहर से लेकर गांवों तक लोग अपने प्रतिनिधि का चुनाव वोट से करते हैं।;

Update: 2026-06-15 21:50 GMT
  • राजेश पांडेय

देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विपक्ष को अपना हर मोर्चा दुरुस्त करना होगा। उसे हर राज्य में कड़ी चुनौती पेश करने के हालात बनाना चाहिए। जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने लगती हैं तो उसे रास्ते पर लाने में विपक्ष दलों की एकजुटता भी अच्छा प्रभाव पैदा कर सकती है। संवैधानिक संस्थाएं सत्ता और उसके अन्य अंगों की असंवैधानिक और गैरकानूनी कार्रवाईयों को रोकने का सबसे प्रभावी औजार हैं।

भारत में केंद्र और राज्य की सरकारें वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी जाती हैं। शहर से लेकर गांवों तक लोग अपने प्रतिनिधि का चुनाव वोट से करते हैं। सभी चुनावों में स्थानीय स्तर पर हेराफेरी की घटनाएं होती हैं। मतदान केंद्रों पर कब्जा, फर्जी वोटिंग, मतगणना में गड़बड़ी जैसे मामले सामने आते हैं। फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर चुनावों की शुद्धता और पवित्रता संदेह से परे रहती थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। पहले वोटर सरकार चुनते थे, अब सत्ताधारी पार्टी तय कर रही है कि वोटर कौन रहेगा और कौन नहीं। कम से कम मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया से तो यही तस्वीर उभरती है। धांधली के आरोपों, विसंगतियों और खामियों की कहीं सुनवाई नहीं है। संवैधानिक संस्थाओं से इंसाफ की उम्मीद खत्म होती जा रही है।

स्वस्थ और सच्चे लोकतंत्र की पहली शर्त स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं। अब इसकी गारंटी नहीं रही। चुनावों में गड़बड़ी के आरोपों की सूची दिन-ब-दिन लंबी हो रही है। हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर गर्व करते हैं लेकिन हकीकत एकदम अलग है। स्वयंसेवी संगठनों- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और महाराष्ट्र स्थित वोट फॉर डेमोक्रेसी ने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कई विसंगतियों का जिक्र किया है। दोनों चुनावों में कुल मतदान और गिने गए वोटों की संख्या में अंतर पाया गया है। वोटिंग के आंकड़े काफी विलंब से जारी हो रहे हैं। वोटिंग के आखिरी घंटों में वोटरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी चिंताजनक और अविश्वसनीय है। एडीआर ने चुनाव आयोग को कई मौकों पर पत्र लिखकर सभी पहलुओं की ओर उसका ध्यान आकर्षित कराया है। लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिले हैं।

चुनाव आयोग की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं है। इसका असर हर जगह दिखाई पड़ रहा है। आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी संदेह के दायरे में हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में इसके सबूत मिले हैं। अपेक्षाकृत महत्वहीन चुनाव तक धांधली की चपेट में आ रहे हैं। चंडीगढ़ मेयर के चुनाव में निर्वाचन अधिकारी गड़बड़ी करते रंगे हाथों पकड़े जा चुके हैं। मध्यप्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करने की ताजा घटना इसकी अगली कड़ी है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

देश की सर्वोच्च अदालत से अनियमितताओं को रोकने की उम्मीद की जाती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अहम मामलों में क्लीन चिट दे दी है। खासतौर से एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 27 मई को आए कोर्ट के फैसले में वोटरों के अधिकारों की रक्षा की फिक्र दिखाई नहीं देती है। कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। अदालत ने यह जरूर माना है कि आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता है। यह केंद्र सरकार का काम है। फिर भी, एसआईआर की जटिलता और खामियों पर उसने गौर नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा चुनावों से पहले कुछ राज्यों में हड़बड़ी में कराई गई प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं कहा है। आयोग को किसी बिंदु पर जवाबदेह नहीं ठहराया है।

अब तक मतदाता सूची में वोटरों का नाम दर्ज करने और हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी और आसान रही है। हर साल वोटर लिस्ट का संक्षिप्त संशोधन (समरी रिवीजन) होता है। चुनाव आयोग 18 साल से अधिक आयु के नए वोटरों को शामिल करने के लिए अभियान चलाता है। लेकिन लगता है कि एसआईआर के जरिये नाम शामिल करने के बदले हटाने की मुहिम चलाई गई है। लगातार खबरें आ रही हैं कि सबसे अधिक नाम अल्पसंख्यकों, दलितों के हटाए गए हैं। दरअसल, भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जिनके पास कई जरूरी दस्तावेज नहीं हैं। इनमें अधिकतर लोग कमजोर और गरीब हैं। भला सोचिए दूरदराज के कस्बों, गांवों में बैठे लोगों के लिए दस्तावेज जुटाना कितना कठिन है। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के जरूरी दस्तावेजों में आधार कार्ड को शामिल कराया है। अनुमान है, 2026 के शुरुआती महीनों में 134 करोड़ लोग आधार का उपयोग कर रहे थे।

चुनाव आयोग का काम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। उसे सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र वोटर मताधिकार के इस्तेमाल से वंचित न रह जाए। लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। एसआईआर के तहत करोड़ों वोटरों को मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चल रहा है। कुछ विशेषज्ञों के अनुमानों में यह संख्या लगभग साढ़े छह करोड़ बताई गई है। पश्चिम बंगाल में अप्रैल, मई में हुए विधानसभा चुनाव में तार्किक विसंगति जैसे नए मापदंड के तहत 27 लाख वोटरों का मताधिकार छीन लिया गया। तमिलनाडु में 97 लाख लोग बाहर हुए हैं। बिहार में 25 लाख वोटरों को जगह नहीं मिली है। सबसे अधिक लोकसभा सीटों के राज्य उत्तरप्रदेश में एक करोड़ से अधिक वोटर अधर में हैं। जाहिर है, ये हालात लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं हैं।

संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी के कारण चुनावों में मुकाबला बराबरी का नहीं रह गया है। दौड़ शुरू होने से पहले ही सत्ताधारी दल निर्णायक बढ़त की स्थिति में रहने लगा है। ऐेसी स्थिति में विपक्षी दलों के सामने कठिन चुनौतियां हैं। उसके अपने विरोधाभास और मतभेद अलग हैं। कई राज्यों में उनके हित आपस में टकराते हैं।

2023 में बने इंडिया गठबंधन के सदस्य कई मौकों पर अलग दिशाओं में चलते हैं। लेकिन उसने इस वक्त एसआईआर के खिलाफ एकजुटता दिखाई है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद 8 जून को हुई उसकी बैठक में आम राय से एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का इरादा जताया गया है। विपक्ष का कहना है कि एसआईआर का उपयोग चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। बैठक में चिंता व्यक्त की गई कि एसआईआर से मतदाता सूचियों में गड़बड़ी करके बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। इसने चुनावों की निष्पक्षता और पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

एसआईआर के बारे में विपक्ष के सवाल जायज हैं। इसके बावजूद एसआईआर को नए सिरे से कानूनी चुनौती देने के नतीजों पर फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है। कानूनी रास्ते तो ठीक हैं पर विपक्ष के लिए मैदानी मोर्चे को संभालना ज्यादा जरूरी है। 8 जून की बैठक में गठबंधन के मतभेद भी सामने आए हैं। सहयोगी दलों ने कहा कि तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की रणनीति ने गठबंधन के प्रमुख सहयोगियों द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। निश्चित तौर पर कांग्रेस को अपनी रणनीति पर नए सिरे से गौर करना होगा। तमिलनाडु में वह द्रमुक को छोड़कर एक्टर विजय की पार्टी के साथ सरकार में शामिल हो चुकी है। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे भविष्य की नीति मानते हैं। उनकी सोच है कि तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ पार्टियों के प्रभाव क्षेत्र से निकलकर दूसरी दिशा में बढ़ रही है।

बंगाल में तृणमूल के साथ उसके मेलजोल की हलचल तेज है। केरल में तो यूडीएफ गठबंधन की प्रमुख पार्टी कांग्रेस का वामपंथियों (एलडीएफ) से हितों के टकराव का सीधा मामला है। वहां यूडीएफ और एलडीएफ के बीच हर पांच साल में सत्ता बदलती रही है। केवल 2021 में एलडीएफ ने विजयन के नेतृत्व में पहली बार दोबारा बहुमत हासिल किया था। सीपीएम की आपत्ति कांग्रेस नेताओं खासकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी द्वारा विजयन पर व्यक्तिगत प्रहार से संबंधित है। वहां कांग्रेस और वामपंथियों के रास्ते अलग हैं लेकिन चुनाव अभियान में बार-बार निजी हमलों से तो बचा ही जा सकता है। बंगाल में कांग्रेस चुनाव से पहले ही तृणमूल के साथ मिलकर चल सकती थी। इससे एसआईआर के जरिये हुई कथित धांधली से निपटने में कुछ हद तक मदद मिल सकती थी। बंगाल में अब तक कांग्रेस की रणनीति को अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता प्रभावित करते रहे हैं। वे तृणमूल की शीर्ष नेता ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक हैं। कांग्रेस ऐसे नेताओं से अलग हटकर नई वास्तविकताओं के हिसाब से अपनी रणनीति तय कर सकती है।

अपने ऐतिहासिक अतीत, लंबे समय तक देश पर शासन करने, मौजूदा लोकसभा में 100 सीटों और चार राज्यों में सरकार होने के कारण इंडिया गठबंधन को आगे बढ़ाने में कांग्रेेस की भूमिका बहुत अहम है। इसलिए उसे अपने सहयोगियों की महत्वाकांक्षाओं, जरूरतों और मैदान की स्थिति को देखकर कदम उठाना होंगे। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में इस समय समाजवादी पार्टी के हाथ में विपक्ष की कमान है। लिहाजा, कांग्रेस के लिए सपा के पीछे चलना व्यावहारिक राजनीति होगी। विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को सीटों के बंटवारे में वास्तविक स्थिति का ध्यान रखना पड़ेगा। वे अपने नफा-नुकसान को परखें लेकिन यह ध्यान रखें कि महत्वाकांक्षा, टकराव और जिद से चुनौती कमजोर न पड़ जाए।

देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विपक्ष को अपना हर मोर्चा दुरुस्त करना होगा। उसे हर राज्य में कड़ी चुनौती पेश करने के हालात बनाना चाहिए। जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने लगती हैं तो उसे रास्ते पर लाने में विपक्ष दलों की एकजुटता भी अच्छा प्रभाव पैदा कर सकती है। संवैधानिक संस्थाएं सत्ता और उसके अन्य अंगों की असंवैधानिक और गैरकानूनी कार्रवाईयों को रोकने का सबसे प्रभावी औजार हैं। अगर वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करेंगी तो सत्ता निरंकुश हो जाएगी और लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा। निश्चय ही यह स्थिति गंभीर और निराशाजनक है। इसलिए विपक्ष की जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ गई है। वह अपनी मैदानी सक्रियता से जनता के एक बहुत बड़े वर्ग को उसके अधिकार हासिल करने में मदद कर सकता है। भारत में मताधिकार हर व्यक्ति को सबके बराबर खड़े होने का अधिकार देता है। हमारे यहां वंचित वर्गों की सबसे बड़ी संपदा और ताकत उसका वोट है। उसके इस अधिकार की रक्षा करना सबकी जिम्मेदारी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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