चुप कबीरा बोल मत!!

किचन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक कचकच करती दुनिया में 'चुप कबीरा बोल मत' ही शांति का अंतिम हथियार हो सकता है

By :  Deshbandhu
Update: 2026-04-04 22:59 GMT
  • भूपेन्द्र भारतीय

किचन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक कचकच करती दुनिया में 'चुप कबीरा बोल मत' ही शांति का अंतिम हथियार हो सकता है। लेकिन कबीरा चुप हो जब। यह शांति का हथियार आपको कैसे भी अपनाना होगा। क्योंकि जरूरी नहीं है कि हर अंधे की औलाद को किसी भी तरह की ठोकर खाने पर अंधा ही कहा जाए। ओर यदि आप ऐसा कहने के आदि हो गए हैं तो फिर किसी भी तरह के महायुद्ध के लिए तैयार रहें। युद्ध में फिर सब कुछ होगा। फिर आपके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था भी कुछ नहीं कर सकती। ओर वास्तव में उसके बस में कुछ है भी नहीं। कटपुतलीयों वाला मंच भर है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि 'चार साल से रूस-नॉटो व करीब एक माह से ऊपर से अमेरिका-ईरान के युद्ध से पर्यावरण कितना अच्छा हो गया है, दुनिया का हवा-पानी स्वच्छता के अपने मानक स्तर पर सबसे ऊपर है, बच्चों-महिलाओं के मानव अधिकार सुरक्षित है और यदि कोई साल में एक बार दिवाली पर आतिशबाजी करके थोड़ा बहुत वायु प्रदूषण करते हो, होली पर थोड़ा बहुत पानी बर्बाद करते हो! तो उन्हें कबीरा के लोग पर्यावरण व जल संरक्षण का लेक्चर फटकारते हैं। वहीं यह भी अद्भुत विडंबना है कि संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में इनसे जुड़े देश कितना अच्छा पर्यावरण संरक्षण करके विकास का मॉडल बाकी दुनिया के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का विश्व शांति का यह मॉडल हमें भी अपने अन्य मित्रों के साथ अपना लेना ही चाहिए! युद्ध में हमें भी कूद ही जाना चाहिए। वैसे भी युद्ध के नाम पर संयुक्त राष्ट्र के मुँह में दही जमा रहता हैं। वह मौन रहकर शांति की तपस्या में लगा रहता है।'

अभी तक कबीरा बाजार में सिर्फ खड़ा था लेकिन अब उसे चुपचाप भी रहना होगा। कबीरा जैसे ही कुछ बोलता है बाजार के भाव बढ़ने-घटने लगते हैं। बाजार समुद्री लहरों की तरह हिलौरे मारता है। बाजार युद्ध में भी अपना व्यापार बढ़ा रहा है। कबीरा व्यापार के लिए नये नये तरीकें खोज रहा है। जनता सोशल मीडिया चौराहे पर यह सब देख रही हैं। जनता को कोविड के बाद फिर डर सता रहा है कि लाईन में लगना पड़ेगा। जनता डर में संग्रह करने लगती हैं। कबीरा ने अपनी अद्भुत वाणी के बल यह चमत्कार कर दिया! बाजार की चाल बढ़ा दी। जनता फिर कर्ज लेकर घी पियो वाले मकड़जाल में फंसने के लिए कमरकसने लगी हैं।

कबीरा अब जब जब जुबान खोलता है, युद्ध शुरू हो जाता है। 'यह युद्ध पति-पत्नी की जुबानी जंग जैसा ही रहता है। यह जुबानी जंग माता-पिता के बीच चलती हैं और अंतोगत्वा बच्चे कूटे-पीटे जाते हैं। परिवार में शांति स्थापित करने का यह मॉडल कबीरा ही ला सकता है।'

इधर जैसे ही कबीरा चुप रहने लगता है तो बाजार को घबराहट होने लगती है। बाजार चाहता है कि कबीरा की वाणी धाराप्रवाह चलती रहे और बाजार गुलजार रहे।

बाजार, कबीरा व युद्ध के गठबंधन ने दुनिया को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है कि इसमें आम आदमी ना घर का रहा और ना ही घाट का! वह धोबी के कुत्ते से भी दयनीय स्थिति में पहुंच गया है। उसे बाजार की हर चौखट से लात ही पड़ रही है।

इधर जैसे तैसे कबीरा को चुप करवाओ, उसकी चाल टेढ़ी होने लगती है। वह पृथ्वी को तीन पग में पाना चाहता है। कबीरा के लिए पृथ्वी खिलौना हो गई है। वह उसे बाजार की एक वस्तु भर मान बैठा है। जैसे जैसे कबीरा उम्र के एक पड़ाव पर पहुंच रहा है उसकी जबान व जज्बात उसे भटका रहे हैं। लगता है कबीरा को अब बाजार से लंबी यात्रा पर निकल ही जाना चाहिए। या फिर कबीरा को सबसे पहले बार बार यह कहना बंद करना होगा कि 'कबीरा खड़ा बाजार में..!!' बल्कि उसे बाजार में खड़ा रहना नहीं चाहिए। आजकल बाजार एआई के भरोसे अच्छे से चल सकता है। चलाने वाले चला रहे हैं। चलने वाले चल भी रहे हैं और बनने वाले बन भी रहे हैं! कबीरा को बाजार से निकलकर अपने घर की ओर जाना चाहिए। वहां पर उसके लिए शांति है और बाकी दुनिया के लिए भी शांति रहेगी। जिस दिन कबीरा ने 'चुप कबीरा बोल मत' बात को आत्मसात कर लिया, वह दिन उसके लिए अच्छे दिनों की बेला की शुरुआत रहेगी, वरना दुनिया कबीरा का तेल कब भी निकाल सकती है..!!

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