रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ.. भारत का अमेरिका को जवाब-समझौता नहीं करेंगे, अपने हिसाब से खरीदेंगे

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में भारत की ऊर्जा नीति की प्राथमिकता को स्पष्ट किया। सरकार के मुताबिक, देश की ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है और बड़ी आबादी की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आयात संबंधी फैसले लिए जाते हैं।;

Update: 2026-09-17 07:32 GMT

नई दिल्ली: रूस और ईरान से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच एक नया मुद्दा सामने आया है। अमेरिकी कांग्रेस में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर संभावित 100 फीसदी टैरिफ का रास्ता खोलने वाला संशोधन पारित होने के बाद भारत सरकार ने पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने की बात कही है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा जरूरतों से समझौता नहीं किया जाएगा।

अमेरिकी कांग्रेस के कदम पर भारत की नजर

विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को अमेरिकी कांग्रेस में Sanctioning Russia and Iran Act के पारित होने का संज्ञान लेने की बात कही। मंत्रालय के अनुसार, भारत इस कानून से जुड़े आगे के घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। सरकार ने फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया है कि अमेरिकी कानून के संभावित प्रभावों का भारत की अर्थव्यवस्था या रूस से होने वाले ऊर्जा आयात पर कितना असर पड़ेगा। नई दिल्ली की ओर से यह भी नहीं बताया गया है कि यदि प्रस्तावित टैरिफ लागू होता है तो भारत की तत्काल प्रतिक्रिया क्या होगी।

ऊर्जा जरूरतों से समझौता नहीं

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में भारत की ऊर्जा नीति की प्राथमिकता को स्पष्ट किया। सरकार के मुताबिक, देश की ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है और बड़ी आबादी की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आयात संबंधी फैसले लिए जाते हैं। MEA ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों या व्यापारिक दबावों के बावजूद भारत अपने ऊर्जा हितों को ध्यान में रखकर आगे की नीति तय करेगा।

कई देशों से ऊर्जा खरीद की रणनीति

भारत ने संकेत दिया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक देश या स्रोत पर निर्भर रहने की नीति नहीं अपनाएगा। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीद जारी रखेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अपने फैसले लेगा। सरकार का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतों, उपलब्धता और परिस्थितियों में बदलाव के अनुसार आयात संबंधी फैसलों की समीक्षा की जा सकती है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर भारत की नीति भी व्यापक ऊर्जा सुरक्षा और बाजार की परिस्थितियों के संदर्भ में देखी जाएगी।

भारत-अमेरिका के बीच पहले भी हुई चर्चा

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों और उनके असर से जुड़े मुद्दे को भारत ने अमेरिका के साथ उच्च स्तर पर उठाया है। हाल के महीनों में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच इस विषय पर कई दौर की बातचीत होने की बात कही गई है। भारत ने अमेरिका के सामने केवल अपने द्विपक्षीय व्यापारिक हितों का मुद्दा नहीं रखा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर किसी भी नई प्रतिबंध व्यवस्था के संभावित असर की ओर भी ध्यान दिलाया है।

व्यापारिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा पर जोर

अमेरिकी कानून से संभावित आर्थिक प्रभावों को देखते हुए भारत ने अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का संकेत दिया है। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने फिलहाल किसी विशिष्ट जवाबी कार्रवाई या वैकल्पिक व्यवस्था की घोषणा नहीं की है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि आगे की रणनीति तय करते समय भारतीय व्यापार और उद्योग जगत के साथ समन्वय किया जाएगा। संभावित प्रभावों का आकलन करने और उनसे निपटने के उपायों पर उद्योग संगठनों के साथ चर्चा की जाएगी।

आगे क्या करेगा भारत?

अमेरिकी कांग्रेस के कदम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि 100 फीसदी टैरिफ का प्रावधान आगे बढ़ता है तो भारत की ऊर्जा खरीद और व्यापार नीति पर इसका वास्तविक असर क्या होगा। फिलहाल सरकार ने किसी अंतिम आर्थिक आकलन को सार्वजनिक नहीं किया है। विदेश मंत्रालय का मौजूदा संदेश दो प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित है—भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा और अपने व्यापार एवं आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। हालांकि, अमेरिकी कानून के अंतिम स्वरूप, उसके लागू होने की प्रक्रिया और भारत पर वास्तविक प्रभाव को लेकर आगे के घटनाक्रम का इंतजार करना होगा।

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