वॉशिंगटन में ‘शांति बोर्ड’ की पहली बैठक, ट्रंप ने दिया चीन-रूस को शामिल होने का न्योता

वॉशिंगटन डीसी में हुई इस उद्घाटन बैठक में 40 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। ट्रंप ने इस मंच को वैश्विक संकटों से निपटने के लिए एक नए बहुपक्षीय तंत्र के रूप में पेश किया और स्पष्ट किया कि वे चाहते हैं कि चीन और रूस भी इसमें शामिल हों।

Update: 2026-02-20 04:38 GMT
वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक संघर्षों के समाधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से गठित ‘शांति बोर्ड’ (Peace Board) की पहली बैठक आयोजित की। वॉशिंगटन डीसी में हुई इस उद्घाटन बैठक में 40 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। ट्रंप ने इस मंच को वैश्विक संकटों से निपटने के लिए एक नए बहुपक्षीय तंत्र के रूप में पेश किया और स्पष्ट किया कि वे चाहते हैं कि चीन और रूस भी इसमें शामिल हों।

चीन और रूस को औपचारिक न्योता

बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने चीन और रूस दोनों को शांति बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है। हालांकि, अब तक दोनों देशों की ओर से कोई औपचारिक निर्णय सामने नहीं आया है। ट्रंप ने कहा, “हम चाहते हैं कि यह मंच वास्तव में वैश्विक प्रतिनिधित्व वाला हो। चीन और रूस जैसे बड़े देशों की भागीदारी से इसका प्रभाव और बढ़ेगा।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं और वे अप्रैल में चीन की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने संकेत दिया कि इस यात्रा के दौरान इस विषय पर आगे चर्चा हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर भी नजर रखेगा बोर्ड

राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति बोर्ड की भूमिका को केवल संघर्ष समाधान तक सीमित न बताते हुए कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की कार्यप्रणाली पर भी नजर रखेगा। उनके अनुसार, बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्यों के अनुरूप प्रभावी ढंग से काम करे। ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका इस पहल के लिए 10 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देगा। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है और अमेरिका इस दिशा में सहयोग करेगा। “हम संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाना चाहते हैं। अगर वैश्विक संस्थाएं मजबूत होंगी, तभी दुनिया में स्थिरता आएगी,” ट्रंप ने कहा।

गाजा पर रहेगा शुरुआती फोकस

राष्ट्रपति ने बताया कि शांति बोर्ड का प्रारंभिक ध्यान गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण और वहां शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने पर होगा। उन्होंने याद दिलाया कि सितंबर में अमेरिका की मध्यस्थता से प्रस्तावित 20 सूत्रीय गाजा युद्धविराम योजना के दूसरे चरण के तहत इस बोर्ड का विचार सामने आया था। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि गाजा क्षेत्र में स्थायी शांति और पुनर्निर्माण के लिए एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय समन्वय की जरूरत है, जिसे यह नया मंच उपलब्ध करा सकता है।

किन देशों ने हिस्सा नहीं लिया?

हालांकि, बैठक में 40 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडल मौजूद थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कुछ प्रमुख सदस्य इस पहल से दूरी बनाए हुए दिखे। फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य इस उद्घाटन बैठक में शामिल नहीं हुए। इसके अलावा, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूरोपीय संघ ने भी इस बोर्ड में औपचारिक रूप से सीट लेने का विकल्प नहीं चुना है। भारत को भी इस शांति बोर्ड में शामिल होने का न्योता मिला है, लेकिन अब तक भारत की ओर से कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत इस पहल के व्यापक प्रभाव और संरचना को समझने के बाद ही अपना रुख स्पष्ट करेगा।

बोर्ड की संरचना और प्रमुख सदस्य

राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति बोर्ड की शुरुआती एग्जिक्यूटिव टीम की भी घोषणा की। इसमें उनके दामाद और पूर्व वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुश्नर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर शामिल हैं। इन सदस्यों को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, मध्यस्थता और नीति-निर्माण का अनुभव रखने वाला बताया गया है। ट्रंप ने कहा कि यह टीम विभिन्न क्षेत्रीय संघर्षों पर काम करने के लिए अलग-अलग देशों और संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करेगी।

वैश्विक संकट समाधान तंत्र को मजबूत करना

ट्रंप के अनुसार, शांति बोर्ड का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संघर्ष समाधान की मौजूदा प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना और वैश्विक संकटों के समाधान में तेजी लाना है। उन्होंने कहा कि मौजूदा संस्थागत ढांचे में कई बार निर्णय लेने की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाती है। ऐसे में एक समर्पित मंच, जो सीधे तौर पर मध्यस्थता और समन्वय पर केंद्रित हो, बेहतर परिणाम दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल अमेरिकी नेतृत्व में एक वैकल्पिक वैश्विक तंत्र खड़ा करने की कोशिश के रूप में भी देखी जा सकती है, खासकर ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।

महत्वाकांक्षी पहल


शांति बोर्ड की पहली बैठक को ट्रंप प्रशासन की एक महत्वाकांक्षी पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने प्रमुख देश इसमें सक्रिय रूप से शामिल होते हैं और इसे कितनी व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है। चीन और रूस जैसे देशों की भागीदारी से इसकी विश्वसनीयता बढ़ सकती है, जबकि उनकी अनुपस्थिति इसे सीमित दायरे का मंच बना सकती है। फिलहाल, अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक शक्तियां इस नए मंच को किस नजरिए से देखती हैं और क्या यह वास्तव में अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों में नई दिशा दे पाता है।
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