अमेरिकी सांसद रैंडी फाइन के बयान से बवाल: ‘कुत्तों और मुसलमानों’ वाली टिप्पणी पर देशव्यापी विवाद

किसवानी और उनके समर्थकों ने रैंडी फाइन पर मुसलमानों और फिलिस्तीनियों को अमानवीय रूप में पेश करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा इस तरह की भाषा का इस्तेमाल समाज में नफरत और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है।

Update: 2026-02-18 15:16 GMT
न्यूयॉर्क। अमेरिका में रिपब्लिकन सांसद रैंडी फाइन के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया है। X (पूर्व में ट्विटर) पर की गई उनकी टिप्पणी को लेकर वॉशिंगटन से लेकर न्यूयॉर्क तक तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। डेमोक्रेटिक नेताओं, सिविल राइट्स संगठनों और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने इसे इस्लामोफोबिक और अमानवीय करार दिया है, जबकि फाइन अपने बयान को “जवाबी प्रतिक्रिया” बता रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

मंगलवार को रैंडी फाइन ने X पर लिखा कि अगर “कुत्तों और मुसलमानों में से एक को चुनना पड़े तो यह मुश्किल फैसला नहीं है।” यह टिप्पणी न्यूयॉर्क की फिलिस्तीनी-अमेरिकी एक्टिविस्ट नरदीन किसवानी की एक पोस्ट के जवाब में की गई थी। किसवानी ने अपने पोस्ट में लिखा था कि “कुत्ते अपवित्र हैं। ऐसे समय में जब न्यूयॉर्क इस्लाम की ओर बढ़ रहा है, कुत्तों को घर के अंदर नहीं रखना चाहिए। इन्हें बैन कर देना चाहिए।” इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। फाइन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दुनिया में 57 ऐसे देश हैं, जहां शरिया कानून लागू है। अगर कोई ऐसा चाहता है तो वहां जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि “अमेरिका 58वां मुस्लिम देश नहीं बनेगा।”

किसवानी ने दी सफाई

विवाद बढ़ने के बाद नरदीन किसवानी ने अपने बयान पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनका पोस्ट व्यंग्य था और न्यूयॉर्क में सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों की गंदगी को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में किया गया था। उन्होंने दावा किया कि उनका उद्देश्य उन लोगों की मानसिकता को उजागर करना था, जो मुस्लिम समुदाय के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को खतरे के रूप में देखते हैं। किसवानी ने यह भी कहा कि उनके बयान के बाद उन्हें मौत की धमकियां मिलीं। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जब होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम ने अपने फार्म पर एक कुत्ते को गोली मारने की बात स्वीकार की थी, तब उतना आक्रोश नहीं दिखा। लेकिन एक मुस्लिम द्वारा पालतू जानवरों पर टिप्पणी करने पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई।

फाइन पर ‘अमानवीयकरण’ का आरोप

किसवानी और उनके समर्थकों ने रैंडी फाइन पर मुसलमानों और फिलिस्तीनियों को अमानवीय रूप में पेश करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा इस तरह की भाषा का इस्तेमाल समाज में नफरत और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है। अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस काउंसिल (CAIR) ने फाइन के बयान की कड़ी निंदा करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। संगठन ने कहा कि एक सांसद द्वारा इस तरह की टिप्पणी अस्वीकार्य है और इससे मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

कार्रवाई की मांग तेज

फाइन के बयान के बाद कई प्रमुख डेमोक्रेटिक नेताओं और सामाजिक संगठनों ने सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना की। 

- एरिजोना की कांग्रेस सदस्य यास्मीन अंसारी ने हाउस स्पीकर से तत्काल निंदा की मांग की। 

- कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने फाइन को “नस्लवादी” करार देते हुए इस्तीफा देने की बात कही। 

- ब्रिटिश पत्रकार पीयर्स मॉर्गन ने भी सोशल मीडिया पर फाइन को फटकार लगाई। 

सोशल मीडिया पर यह पोस्ट तेजी से वायरल हुआ और इसे 42 मिलियन से अधिक व्यूज मिले। हजारों लोगों ने लाइक, रीपोस्ट और कमेंट कर अपनी प्रतिक्रिया दी।

फाइन का पलटवार

विरोध के बीच रैंडी फाइन ने अपने बयान पर कायम रहते हुए कहा कि उनका पोस्ट किसवानी के लिखित बयान के जवाब में था। न्यूजमैक्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि असली समस्या वह विचारधारा है जो अमेरिका में शरिया कानून थोपने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा, “अमेरिका में कुत्ते हमारे परिवार के सदस्य हैं। हम यूरोप की तरह शर्मिंदा होकर या दबाव में आकर अपनी संस्कृति नहीं छोड़ेंगे।” फाइन ने ‘डोंट ट्रेड ऑन मी’ स्लोगन के साथ कुत्तों की तस्वीरें भी शेयर कीं। यह स्लोगन ऐतिहासिक गैड्सडेन फ्लैग से जुड़ा है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा सरकारी दखल के विरोध का प्रतीक माना जाता है।

यूरोप और ‘इस्लामिक टेकओवर’ की बहस

फाइन और कई अन्य राइट-विंग नेताओं का दावा है कि यूरोप में बड़े पैमाने पर मुस्लिम इमिग्रेशन के कारण “इस्लामिक टेकओवर” हो रहा है। उनके अनुसार, कुछ क्षेत्रों में स्थानीय कानून कमजोर पड़ गए हैं और सांस्कृतिक बदलाव तेज हो गया है। हालांकि, कई विशेषज्ञ इस दावे को अतिरंजित बताते हैं। उनका कहना है कि यूरोप में बहुसांस्कृतिक समाज की जटिलताएं हैं, लेकिन “नो-गो जोन” और पूर्ण सांस्कृतिक पतन जैसी बातें राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं। फाइन पहले भी “नो शरिया” जैसा बिल पेश कर चुके हैं और सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि अमेरिका इस्लामिक देश नहीं बनेगा।

गाजा पर पुराने बयानों से भी घिरे रहे फाइन

रैंडी फाइन इससे पहले भी गाजा को लेकर अपने बयानों के कारण विवादों में रहे हैं। 2025 में उन्होंने कहा था कि गाजावासियों को तब तक कड़ी सजा मिलनी चाहिए जब तक इजराइली बंधकों को रिहा नहीं किया जाता। उन्होंने गाजा की तुलना हिरोशिमा और नागासाकी से भी की थी, जिसे लेकर उन्हें व्यापक आलोचना झेलनी पड़ी थी। वे इजराइल के प्रबल समर्थक माने जाते हैं और फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष पर अक्सर आक्रामक रुख अपनाते रहे हैं।

न्यूयॉर्क की राजनीति और ‘इस्लाम की ओर बढ़ता शहर’ बहस 


किसवानी के बयान को कुछ लोगों ने न्यूयॉर्क के मौजूदा मेयर जोहरान ममदानी से जोड़कर देखा। ममदानी 2025 में न्यूयॉर्क के मेयर चुने गए और वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले मुस्लिम हैं। उनका कार्यकाल 1 जनवरी 2026 से शुरू हुआ है। ममदानी किराया नियंत्रण, मुफ्त बस सेवा, किफायती आवास और जीवनयापन की लागत कम करने जैसे मुद्दों पर काम कर रहे हैं। हालांकि, किसवानी ने अपने बयान में उनका सीधा उल्लेख नहीं किया था।

रैंडी फाइन: प्रोफाइल एक नजर में

रैंडी फाइन का जन्म 20 अप्रैल 1974 को एरिजोना के ट्यूसन में हुआ। उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से बीए और एमबीए की डिग्री हासिल की। वे पहले जुआ उद्योग से जुड़े रहे और बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने 2016 से 2024 तक फ्लोरिडा स्टेट हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में सेवा दी। 2025 में एक विशेष चुनाव के जरिए वे फ्लोरिडा के 6वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य बने। वे खुद को कड़ा राष्ट्रवादी और इजराइल समर्थक बताते हैं। उनके बयानों को अक्सर विवादास्पद माना जाता है।

बहस तेज


यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और बहुसांस्कृतिक समाज की सीमाओं को लेकर बहस तेज है। एक ओर फाइन जैसे नेता इसे “अमेरिकी मूल्यों की रक्षा” का मुद्दा बता रहे हैं, तो दूसरी ओर आलोचक इसे घृणा फैलाने और समाज को विभाजित करने वाली राजनीति मान रहे हैं। हाउस नेतृत्व की ओर से अभी तक कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। लेकिन दबाव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह विवाद केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है या औपचारिक राजनीतिक कार्रवाई का रूप लेता है।

इस बीच, यह प्रकरण एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं की भाषा और सोशल मीडिया पर दिए गए बयान किस हद तक समाज की संवेदनशीलताओं और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करते हैं।

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