ग्रीनलैंड संकट में आयरन लेडी बनकर उभरीं मेटे फ्रेडरिक्सन: शांत और अडिग रहकर अमेरिका को ‘ना’ कहने वाली नेता
आज मेटे फ्रेडरिक्सन दुनिया की सबसे जटिल कूटनीतिक चुनौतियों में से एक के केंद्र में हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी ने यूरोप की संप्रभुता और सुरक्षा संतुलन पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। ऐसे समय में फ्रेडरिक्सन ने महीनों तक बेहद नाजुक संतुलन साधे रखा।
कोपेनहेगन। कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के जीवन पर यह कहावत पूरी तरह सटीक बैठती है। स्कूल के दिनों में जब अप्रवासी बच्चों को परेशान किया जाता था, तब वह चुपचाप तमाशा देखने वालों में नहीं थीं। वह उन बदमाश लड़कों के सामने डटकर खड़ी हो गईं। इसकी कीमत उन्हें अपने चेहरे पर मुक्का खाकर चुकानी पड़ी, लेकिन उसी क्षण उनके व्यक्तित्व की बुनियाद पड़ गई-अन्याय के सामने झुकने से इनकार। दशकों बाद वही दृढ़ता वैश्विक राजनीति के मंच पर दिखाई दी, जब ग्रीनलैंड के मुद्दे पर वह अमेरिका जैसे सुपरपावर के सामने बिना उकसावे और बिना झुके ‘ना’ कहने वाली यूरोप की सबसे मुखर आवाज़ बनकर उभरीं।
ग्रीनलैंड विवाद: वैश्विक राजनीति का केंद्र
आज मेटे फ्रेडरिक्सन दुनिया की सबसे जटिल कूटनीतिक चुनौतियों में से एक के केंद्र में हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी ने यूरोप की संप्रभुता और सुरक्षा संतुलन पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। ऐसे समय में फ्रेडरिक्सन ने महीनों तक बेहद नाजुक संतुलन साधे रखा। एक ओर अमेरिका जैसे पुराने सहयोगी को पूरी तरह नाराज न करना, तो दूसरी ओर डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर कोई समझौता न होने देने का स्पष्ट संदेश देना- यह रणनीति आसान नहीं थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर संप्रभुता देना डेनमार्क के लिए “रेड लाइन” है, जिस पर कोई सौदा संभव नहीं।
ट्रंप के सामने शांत लेकिन अडिग रुख
डोनाल्ड ट्रंप अपनी आक्रामक शैली और दबाव बनाने वाली कूटनीति के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में उनके सामने खड़े होना कई अनुभवी नेताओं के लिए भी असहज स्थिति बन जाती है। लेकिन फ्रेडरिक्सन ने टकराव को बढ़ाने के बजाय संयमित लेकिन दृढ़ रणनीति अपनाई। उन्होंने न तो व्यक्तिगत आरोप लगाए और न ही सार्वजनिक मंचों पर उकसावे की भाषा का इस्तेमाल किया। इसके बजाय उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और यूरोपीय एकजुटता को अपने तर्कों का आधार बनाया। इसी रणनीति का नतीजा माना जा रहा है कि ट्रंप को फिलहाल अपने कदम पीछे खींचने पड़े और सैन्य कार्रवाई की खुली धमकियां थम गईं।
युवा प्रधानमंत्री से यूरोप की बड़ी शख्सियत तक
41 वर्ष की उम्र में 2019 में डेनमार्क की सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने वाली मेटे फ्रेडरिक्सन के लिए यह संकट केवल कूटनीतिक चुनौती नहीं है। यह देश की पहचान, भू-राजनीतिक भूमिका और भविष्य से जुड़ा सवाल है। ग्रीनलैंड के साथ डेनमार्क दुनिया का 12वां सबसे बड़ा संप्रभु देश बनता है और आर्कटिक क्षेत्र में उसकी निर्णायक भूमिका तय होती है। यही कारण है कि फ्रेडरिक्सन ने इसे केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बना दिया।
यूरोप को एकजुट करने की रणनीति
ट्रंप के दबाव के बीच फ्रेडरिक्सन ने एक साहसिक लेकिन सोचा-समझा कदम उठाया। उन्होंने ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और आइसलैंड के सीमित सैन्य दल को ग्रीनलैंड आमंत्रित किया। यह सैन्य दृष्टि से बड़ा कदम नहीं था, लेकिन इसका प्रतीकात्मक संदेश बेहद सख्त था। इस कदम के जरिए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की कीमत केवल डेनमार्क को नहीं, बल्कि पूरे यूरोप को चुकानी पड़ेगी। इस पहल ने यूरोपीय देशों के बीच एकजुटता को मजबूत किया और अमेरिका को भी यह संकेत मिला कि यह मुद्दा दबाव की राजनीति से हल नहीं होगा।
देश में बढ़ती लोकप्रियता
डेनमार्क के भीतर इस फैसले को व्यापक समर्थन मिला। जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार ग्रीनलैंड संकट के बाद फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में तेज़ उछाल आया है। कई सर्वे संकेत देते हैं कि वह इस साल होने वाले आम चुनावों में तीसरी बार सत्ता में लौट सकती हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने छोटे देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी आत्मसम्मान और संप्रभुता की राजनीति का उदाहरण पेश किया है।
कड़े फैसलों के लिए जानी जाती हैं फ्रेडरिक्सन
मेटे फ्रेडरिक्सन का राजनीतिक करियर कठिन और कई बार विवादास्पद फैसलों से भरा रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान मिंक उद्योग को बंद करने का उनका फैसला तीखी आलोचनाओं के घेरे में आया। यूक्रेन युद्ध के दौरान सबसे पहले एफ-16 लड़ाकू विमान देने का निर्णय भी जोखिम भरा माना गया। इसके अलावा उनकी शरण नीति यूरोप की सबसे सख्त नीतियों में गिनी जाती है। आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने हर संकट में राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखा और अपनी नीतियों के पीछे खड़े रहने का साहस दिखाया।
अमेरिका से रिश्ते, लेकिन अधीनता नहीं
व्यक्तिगत जीवन और राजनीतिक दृष्टिकोण दोनों में संयमित फ्रेडरिक्सन अमेरिका से रिश्ते पूरी तरह तोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। वह बार-बार कहती हैं कि यूरोप की सुरक्षा में अमेरिका की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनका स्पष्ट कहना है कि उनका लक्ष्य टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि टकराव को संभालते हुए समाधान निकालना है। ग्रीनलैंड संकट में उन्होंने इसी सोच को व्यवहार में उतारकर दिखाया।
यूरोप की नई नेतृत्व छवि
ग्रीनलैंड विवाद ने मेटे फ्रेडरिक्सन को केवल डेनमार्क की प्रधानमंत्री नहीं रहने दिया। वह अब एक ऐसी यूरोपीय नेता के रूप में उभरी हैं, जो ताकत के सामने शोर नहीं मचाती, लेकिन शांत और अडिग रहकर अपनी सीमाएं तय करना जानती हैं। यूरोप की बदलती राजनीति में फ्रेडरिक्सन की यह भूमिका आने वाले वर्षों में महाद्वीप की रणनीतिक दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।