लास एंजेलिस: गाजियाबाद में कोरियन ऑनलाइन गेम्स की लत से जुड़ी तीन बहनों की आत्महत्या की दर्दनाक घटना ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों के प्रभाव पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। बच्चों और किशोरों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच अब यह सवाल और तेज हो गया है कि क्या इंटरनेट मीडिया कंपनियां अपने उत्पादों को इस तरह डिजाइन कर रही हैं, जो बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखें—चाहे उसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक ही क्यों न हो। दुनियाभर की सरकारें और नीति-निर्माता इस चुनौती से जूझ रहे हैं। इसी बीच अमेरिका के लॉस एंजेलिस में इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसी प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ एक बहुचर्चित मुकदमा चल रहा है, जिसमें आरोप है कि इन प्लेटफार्मों के एल्गोरिदम और फीचर बच्चों में लत जैसी प्रवृत्ति पैदा करते हैं। सोमवार को इस मामले में अहम सुनवाई हुई।
‘कैसीनो और नशीली दवाओं’ से तुलना
वादी पक्ष के प्रमुख वकील मार्क लैनियर ने अदालत में इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्मों की तुलना कैसीनो और नशीली दवाओं से करते हुए तीखे आरोप लगाए। उनका कहना है कि इंस्टाग्राम (मूल कंपनी मेटा) और यूट्यूब (गूगल के स्वामित्व में) ने जानबूझकर ऐसे डिजाइन विकल्प विकसित किए हैं, जो बच्चों और किशोरों को बार-बार प्लेटफार्म पर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं। लैनियर ने तर्क दिया कि इन कंपनियों ने मनोवैज्ञानिक शोध के आधार पर ऐसे एल्गोरिदम तैयार किए हैं, जो उपयोगकर्ताओं की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को समझकर उन्हें अधिक से अधिक समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति है।
कंपनियों का बचाव: ‘लत’ शब्द पर सहमति नहीं
दूसरी ओर, मेटा की ओर से पेश हुए वकील पाल श्मिट ने इन आरोपों को खारिज किया। उनका कहना है कि वैज्ञानिक समुदाय में “इंटरनेट मीडिया लत” शब्द पर सर्वसम्मति नहीं है। कुछ शोधकर्ता इसे अतिशयोक्ति बताते हैं और मानते हैं कि समस्या का कारण बहुआयामी है—जिसमें पारिवारिक माहौल, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत मानसिक स्थिति भी शामिल हैं। कंपनियों का तर्क है कि वे सुरक्षा फीचर, पेरेंटल कंट्रोल और स्क्रीन टाइम मॉनिटरिंग जैसे उपकरण उपलब्ध कराती हैं, ताकि अभिभावक बच्चों के उपयोग पर नजर रख सकें।
आंतरिक दस्तावेजों से उठे सवाल
वादी पक्ष ने अदालत में कई आंतरिक ईमेल, अध्ययन और दस्तावेज पेश किए। लैनियर ने दावा किया कि मेटा और गूगल को बच्चों की मनोवैज्ञानिक संवेदनशीलता की पूरी जानकारी थी। उन्होंने मेटा के “प्रोजेक्ट मिस्ट” नामक एक अध्ययन का उल्लेख किया, जिसमें पाया गया था कि तनाव या आघात झेल चुके किशोर इंटरनेट मीडिया के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और अभिभावकीय निगरानी का प्रभाव सीमित रहता है। इसी तरह गूगल के कुछ आंतरिक दस्तावेजों में कंपनी के उत्पादों की तुलना कैसीनो से किए जाने का उल्लेख किया गया। मेटा के कर्मचारियों के बीच हुए कथित संवाद का भी जिक्र हुआ, जिसमें इंस्टाग्राम को “ड्रग की तरह” बताया गया था और यह स्वीकार किया गया था कि उपयोगकर्ताओं को प्लेटफार्म पर बनाए रखने के लिए मनोवैज्ञानिक ट्रिगर का उपयोग किया जाता है। हालांकि कंपनियों ने इन दावों की व्याख्या को संदर्भ से काटकर पेश किया गया बताया है।
‘बेलवेदर ट्रायल’ और केजीएम का मामला
मुकदमे के केंद्र में 20 वर्षीय एक युवती है, जिसकी पहचान “केजीएम” के रूप में की गई है। यह मामला ‘बेलवेदर ट्रायल’ के तौर पर चुना गया है। ऐसे ट्रायल का उद्देश्य समान प्रकृति के हजारों लंबित मामलों के संभावित परिणामों का आकलन करना होता है। वादी पक्ष का दावा है कि केजीएम ने छह वर्ष की उम्र में यूट्यूब का उपयोग शुरू किया और नौ वर्ष की उम्र में इंस्टाग्राम से जुड़ गईं। किशोरावस्था तक वह सैकड़ों वीडियो पोस्ट कर चुकी थीं। लैनियर का तर्क है कि इतनी कम उम्र में डिजिटल प्लेटफार्म से गहरे जुड़ाव ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाला। बचाव पक्ष का कहना है कि व्यक्तिगत मामलों में कई अन्य कारक भी होते हैं और केवल प्लेटफार्म को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं।
बढ़ते मुकदमे, ‘बिग टोबैको’ से तुलना
यह मामला अकेला नहीं है। अमेरिका के कई राज्यों, स्कूल जिलों और अटॉर्नी जनरलों ने इंटरनेट मीडिया कंपनियों के खिलाफ अलग-अलग मुकदमे दायर किए हैं। न्यू मेक्सिको और कैलिफोर्निया सहित कई राज्यों में कानूनी कार्रवाई चल रही है। विशेषज्ञ इन मुकदमों की तुलना 1998 के “बिग टोबैको” मुकदमों से कर रहे हैं, जिनमें तंबाकू कंपनियों पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने उत्पादों के स्वास्थ्य जोखिमों को जानते हुए भी उन्हें बढ़ावा दिया। उन मुकदमों के बाद कंपनियों को भारी आर्थिक दंड और सख्त नियमन का सामना करना पड़ा था। कुछ मामलों में टिकटॉक और स्नैप जैसी कंपनियों ने समझौते किए हैं, लेकिन मेटा और गूगल पर कानूनी दबाव लगातार बढ़ रहा है।
एल्गोरिदम और ‘डिजिटल इकोसिस्टम’ की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म अत्यंत उन्नत एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं। ये एल्गोरिदम उपयोगकर्ता की रुचियों, क्लिक पैटर्न, देखने की अवधि और भावनात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर कंटेंट सुझाते हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब यह प्रक्रिया बच्चों और किशोरों के साथ जुड़ती है, जिनका मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। न्यूरोसाइंटिस्टों का कहना है कि बार-बार मिलने वाला डिजिटल ‘रिवार्ड’ डोपामिन सर्किट को सक्रिय करता है, जिससे बार-बार प्लेटफार्म पर लौटने की प्रवृत्ति बन सकती है। हालांकि, तकनीकी कंपनियां कहती हैं कि एल्गोरिदम का उद्देश्य उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाना है, न कि नुकसान पहुंचाना।
भारत और अन्य देशों में चिंता
गाजियाबाद जैसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह समस्या केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत सहित कई देशों में किशोरों में गेमिंग और इंटरनेट मीडिया की लत को लेकर चिंता बढ़ रही है। स्कूलों और परिवारों में स्क्रीन टाइम को लेकर बहस तेज हो गई है। भारत सरकार ने भी समय-समय पर ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नियमन से समस्या का समाधान नहीं होगा; डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है।
समाधान की राह
इस वैश्विक बहस का केंद्र बिंदु यह है कि जिम्मेदारी किसकी है कंपनियों की, अभिभावकों की, या समाज की? कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्लेटफार्मों को बच्चों के लिए अलग एल्गोरिदम विकसित करने चाहिए। स्क्रीन टाइम की सख्त सीमाएं लागू की जानी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य संसाधनों को डिजिटल प्लेटफार्मों में एकीकृत किया जाना चाहिए। अभिभावकों और शिक्षकों को डिजिटल व्यवहार के प्रति प्रशिक्षित किया जाए।
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए मिसाल
लॉस एंजेलिस में चल रहा यह मुकदमा आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए मिसाल बन सकता है। यदि अदालत कंपनियों के खिलाफ फैसला देती है, तो यह डिजिटल उद्योग में बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है। गाजियाबाद जैसी घटनाएं इस बहस को और संवेदनशील बना देती हैं। इंटरनेट मीडिया आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके प्रभावों को समझना और संतुलन बनाना अब समय की मांग है। दुनिया भर की नजरें अब इस मुकदमे और संभावित नीतिगत परिवर्तनों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।