ढाका। बांग्लादेश की राजनीति, जो तीन दशकों से अधिक समय तक दो शक्तिशाली महिला नेताओं खालिदा जिया और शेख हसीना के इर्द-गिर्द घूमती रही, अब अभूतपूर्व संक्रमण के दौर से गुजर रही है। जुलाई 2024 के रक्तरंजित विद्रोह के बाद होने जा रहे पहले आम चुनाव में देश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदला हुआ है। खालिदा जिया अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना निर्वासन में हैं। 12 फरवरी को 17 करोड़ की आबादी वाला यह देश 300 संसदीय सीटों के लिए मतदान करेगा। हालांकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इस बार मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर पहुंच गई है।
अंतरिम सरकार और संयुक्त राष्ट्र से सहयोग
मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार इस चुनाव को स्थिरता की दिशा में पहला कदम मान रही है। सरकार ने छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय से सहयोग मांगा है। विद्रोह के दौरान हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों ने सरकार की विश्वसनीयता को चुनौती दी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय निगरानी और सहयोग को पारदर्शिता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त करने और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसा कायम करने की कोशिश है।
घटती महिला भागीदारी
दक्षिण एशिया में महिला नेतृत्व के प्रतीक के रूप में पहचाने जाने वाले बांग्लादेश में इस बार चुनावी मैदान में महिलाओं की उपस्थिति बेहद सीमित है। कुल 1,981 उम्मीदवारों में से केवल 76 महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं—यानी कुल का चार प्रतिशत से भी कम। विश्लेषकों का कहना है कि कट्टरपंथी तत्वों की धमकियों और बढ़ते सामाजिक दबाव के कारण कई महिला नेताओं ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाई है। एक युवा मतदाता ने कहा, “हमें गर्व था कि हमारे शीर्ष नेतृत्व में दो महिलाएं थीं। अब लगता है कि महिला नेतृत्व को व्यवस्थित रूप से किनारे किया जा रहा है।”1991 से 2024 तक देश की सत्ता महिलाओं के हाथ में रही। इस लंबे दौर को कई लोग ‘दो बेगम’ युग के नाम से जानते हैं। लेकिन इस चुनाव के बाद पहली बार शासन की कमान लगभग पूरी तरह पुरुषों के हाथों में जाने की संभावना है।
कट्टरपंथ के बढ़ते संकेत
ढाका स्थित बीआरएसी इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट (बीआइजीडी) की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा की राजनीति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के लेखक डॉ. मिर्जा एम. हसन के अनुसार, विद्रोह से अपेक्षित संरचनात्मक परिवर्तन नहीं हुआ और राजनीतिक शून्य ने कट्टरपंथी समूहों को अवसर दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस उभार के व्यापक नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी पर। सामाजिक माहौल में बढ़ती असहिष्णुता और धार्मिक रूढ़िवाद के कारण महिला उम्मीदवारों के लिए चुनावी अभियान चलाना कठिन हो गया है।
जमात-ए-इस्लामी का रुख
सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी ‘जमात-ए-इस्लामी’ ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। इसे राजनीतिक विश्लेषक महिलाओं की घटती भागीदारी के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं। जमात-ए-इस्लामी लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में प्रभावशाली भूमिका निभाती रही है। हालांकि पार्टी का कहना है कि उम्मीदवारों का चयन “योग्यता और संगठनात्मक प्राथमिकताओं” के आधार पर हुआ है, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि यह निर्णय वैचारिक रुझान को दर्शाता है।
नेतृत्व का संकट
खालिदा जिया और शेख हसीना के बिना हो रहे चुनाव ने नेतृत्व के शून्य को उजागर किया है। दोनों नेताओं के समर्थकों का व्यापक जनाधार था, जिसने देश की राजनीति को दशकों तक ध्रुवीकृत रखा। अब राजनीतिक परिदृश्य में कई मध्यम स्तर के नेता उभरे हैं, लेकिन उनमें से कोई भी राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य चेहरा नहीं बन पाया है। युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकती है, क्योंकि वे परंपरागत राजनीतिक वफादारियों से हटकर विकल्प तलाश रहे हैं।
आरक्षित सीटें बनाम वास्तविक प्रतिनिधित्व
संविधान के तहत 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिन्हें दलों के अनुपात के आधार पर नामित किया जाता है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण का विकल्प नहीं हो सकती। उनका तर्क है कि महिलाओं को सीधे चुनाव जीतकर संसद में पहुंचने का अवसर मिलना चाहिए। मौजूदा स्थिति में आरक्षित सीटें तो भरी जाएंगी, लेकिन जमीनी राजनीति में उनकी सक्रियता सीमित होती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय नजरें और लोकतांत्रिक भविष्य
जुलाई 2024 के विद्रोह और उसके बाद की अस्थिरता के कारण बांग्लादेश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हैं। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने निष्पक्ष चुनाव और राजनीतिक हिंसा पर नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि बांग्लादेश किस दिशा में आगे बढ़ेगा—उदार लोकतांत्रिक परंपरा की ओर या अधिक रूढ़िवादी राजनीतिक ढांचे की ओर।
कट्टरपंथी दलों का प्रभाव
मतदान के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू होगी, लेकिन असली चुनौती चुनाव के बाद की स्थिरता होगी। यदि संसद में कट्टरपंथी दलों का प्रभाव बढ़ता है, तो नीति निर्माण और सामाजिक सुधारों की दिशा बदल सकती है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि राजनीतिक दलों को महिलाओं की सुरक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, दक्षिण एशिया में महिला नेतृत्व का प्रतीक रहा यह देश अपनी पहचान खो सकता है।
पूरे क्षेत्र की निगाहें
बांग्लादेश का यह चुनाव एक युगांतकारी मोड़ पर हो रहा है। ‘दो बेगम’ युग की समाप्ति, बढ़ता कट्टरपंथ, महिलाओं की घटती राजनीतिक भागीदारी और अंतरिम सरकार की चुनौतियां ये सभी मिलकर देश के भविष्य को आकार देंगे। 12 फरवरी का मतदान केवल नई संसद का गठन नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि बांग्लादेश अपनी लोकतांत्रिक और समावेशी विरासत को किस हद तक बचा पाता है। आने वाले परिणाम देश की राजनीति में स्थिरता लाएंगे या नए संघर्षों का द्वार खोलेंगे, इस पर पूरे क्षेत्र की निगाहें टिकी हैं।