पेरिस। इंटरनेट मीडिया के बढ़ते प्रभाव और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहे उसके गंभीर असर को देखते हुए दुनिया भर में नीतिगत स्तर पर बड़ा बदलाव साफ नजर आने लगा है। ऑस्ट्रेलिया के बाद अब फ्रांस ने भी इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने एक ऐसे विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएगा। सोमवार देर रात हुए मतदान में यह विधेयक 130-21 के भारी बहुमत से पारित हुआ। यह कानून न केवल सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स को सख्ती से विनियमित करेगा, बल्कि हाई स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी पूरी तरह रोक लगाएगा। इसे फ्रांस में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में अब तक का सबसे कठोर और निर्णायक कदम माना जा रहा है।
राष्ट्रपति मैक्रों का सख्त रुख
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस कानून को जल्द से जल्द लागू करने के लिए ‘फास्ट-ट्रैक’ प्रक्रिया अपनाने का अनुरोध किया है। सरकार की योजना है कि इसे सितंबर में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से ही देशभर में लागू कर दिया जाए। मैक्रों ने इस विधेयक का खुलकर समर्थन करते हुए कहा, “हमारे बच्चों के दिमाग बिक्री के लिए नहीं हैं -न तो अमेरिकी प्लेटफार्म्स के लिए और न ही चीनी नेटवर्क के लिए। उनके सपने एल्गोरिदम द्वारा तय नहीं होने चाहिए।” मैक्रों का यह बयान वैश्विक टेक कंपनियों और उनके एल्गोरिदम-आधारित बिजनेस मॉडल पर सीधा हमला माना जा रहा है, जो अधिक से अधिक स्क्रीन टाइम और यूज़र एंगेजमेंट के लिए बच्चों को भी निशाना बनाते हैं।
क्यों पड़ी इस सख्त कानून की जरूरत?
फ्रांस की स्वास्थ्य निगरानी संस्था की हालिया रिपोर्ट ने सरकार और समाज दोनों को चिंतित कर दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं—12 से 17 वर्ष की आयु के लगभग 90 प्रतिशत बच्चे रोजाना इंटरनेट का उपयोग करते हैं। इनमें से 58 प्रतिशत किशोर इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय हैं। औसतन हर दूसरा किशोर दिन में 2 से 5 घंटे स्मार्टफोन पर बिताता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट मीडिया का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग किशोरों में आत्म-सम्मान की कमी, चिंता, अवसाद, सामाजिक अलगाव और आत्मघाती प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहा है।
आत्महत्याओं से जुड़ते सोशल मीडिया के आरोप
फ्रांस में हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां परिवारों ने दावा किया कि उनके बच्चों की आत्महत्या के पीछे इंटरनेट मीडिया पर दिखाए जाने वाले हानिकारक और उकसाने वाले कंटेंट की भूमिका थी। विशेष रूप से टिकटाक जैसे शॉर्ट-वीडियो प्लेटफार्म्स पर मुकदमे दर्ज किए गए हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि एल्गोरिदम बच्चों को लगातार ऐसे वीडियो दिखाते हैं, जो आत्म-हानि, अवसाद या जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य बनाते हैं। सरकार का मानना है कि केवल ‘सेल्फ-रेगुलेशन’ पर भरोसा करना नाकाफी साबित हुआ है और अब कानूनी हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया है।
स्कूलों में मोबाइल फोन पर पूरी तरह रोक
नए कानून का एक अहम पहलू हाई स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है। फ्रांसीसी शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि स्कूलों में मोबाइल फोन पढ़ाई में बाधा बनते हैं, ध्यान और एकाग्रता को कम करते हैं, साइबर बुलिंग और सोशल प्रेशर को बढ़ाते हैं। सरकार का उद्देश्य है कि स्कूलों को फिर से सीखने और सामाजिक संवाद के सुरक्षित स्थान के रूप में विकसित किया जाए, न कि स्क्रीन पर निर्भरता के केंद्र के रूप में।
यूरोप और दुनिया में बढ़ता रुझान
फ्रांस का यह कदम किसी एक देश का अलग फैसला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक रुझान का हिस्सा माना जा रहा है। यह विधेयक यूरोपीय संघ के ‘डिजिटल सेवा अधिनियम’ (Digital Services Act) के अनुरूप तैयार किया गया है। पूरे यूरोप में नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए न्यूनतम आयु 16 वर्ष करने पर गंभीर चर्चा चल रही है। ब्रिटेन भी किशोरों को हानिकारक कंटेंट और अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बचाने के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण पर विचार कर रहा है।
ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण: लाखों अकाउंट बंद
ऑस्ट्रेलिया इस दिशा में पहले ही बड़ा कदम उठा चुका है। वहां 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया प्रतिबंधित किया जा चुका है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस फैसले के बाद लगभग 47 लाख बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए गए। स्कूलों में बच्चों की एकाग्रता और आपसी संवाद में सुधार के संकेत मिले। फ्रांस सरकार का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का अनुभव यह साबित करता है कि सख्त कानून लागू करना संभव भी है और प्रभावी भी।
कानून का दायरा और अपवाद
हालांकि यह कानून बेहद सख्त है, लेकिन इसे पूर्ण डिजिटल प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता। इसमें कुछ महत्वपूर्ण अपवाद भी शामिल किए गए हैं—ऑनलाइन विश्वकोश जैसे विकिपीडिया, शैक्षिक और वैज्ञानिक निर्देशिकाएं, ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर साझा करने वाले प्लेटफार्म्स। इन प्लेटफार्म्स को प्रतिबंध के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि बच्चों की शिक्षा और ज्ञान तक पहुंच बाधित न हो।
विपक्ष की आपत्ति: व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल
फ्रांस में विपक्ष के कुछ नेताओं और नागरिक अधिकार समूहों ने इस कानून को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है। उनका तर्क है कि अभिभावकों को बच्चों के डिजिटल उपयोग पर फैसला करने का अधिकार होना चाहिए। सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप भविष्य में सेंसरशिप का रास्ता खोल सकता है। हालांकि सरकार का जवाब साफ है कि “जब सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन जाए, तब राज्य का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।”
अमेरिका में टेक कंपनियों पर ऐतिहासिक मुकदमा
इसी बीच इंटरनेट मीडिया को लेकर एक और बड़ी वैश्विक घटना सामने आई है। लास एंजिलिस में दुनिया की तीन सबसे बड़ी टेक कंपनियों मेटा (इंस्टाग्राम), बाइटडांस (टिकटाक) और गूगल (यूट्यूब) के खिलाफ एक ऐतिहासिक मुकदमा शुरू हो रहा है। इन कंपनियों पर आरोप है कि उनके प्लेटफार्म-बच्चों को जानबूझकर लत लगाते हैं, एल्गोरिदम के जरिए नुकसानदेह कंटेंट को बढ़ावा देते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज करते हैं। इस सप्ताह लास एंजिलिस काउंटी सुपीरियर कोर्ट में जूरी का चयन शुरू हो रहा है। यह पहला मौका है जब ये कंपनियां जूरी के सामने सीधे अपने बचाव में दलील देंगी। इस मुकदमे के नतीजे न केवल इनके कारोबार, बल्कि बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।
डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा की नई बहस
फ्रांस का यह कानून सिर्फ एक राष्ट्रीय फैसला नहीं, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक बहस का नया अध्याय है। जहां एक ओर इंटरनेट मीडिया अभिव्यक्ति और कनेक्टिविटी का साधन है, वहीं दूसरी ओर वह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी बन चुका है। अब यह साफ होता जा रहा है कि आने वाले वर्षों में दुनिया भर की सरकारें टेक कंपनियों को खुली छूट देने के बजाय सख्त नियमन की राह चुन सकती हैं। फ्रांस ने इस दिशा में पहला साहसिक कदम बढ़ा दिया है और दुनिया की नजर अब इसके नतीजों पर टिकी है।
इस सप्ताह लास एंजिलिस काउंटी सुपीरियर कोर्ट में जूरी का चयन शुरू हो रहा है। यह पहला मौका है जब ये कंपनियां जूरी के सामने सीधे अपने बचाव में दलील देंगी। इस मुकदमे के नतीजे न केवल इनके कारोबार, बल्कि बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा
फ्रांस का यह कानून सिर्फ एक राष्ट्रीय फैसला नहीं, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक बहस का नया अध्याय है। जहां एक ओर इंटरनेट मीडिया अभिव्यक्ति और कनेक्टिविटी का साधन है, वहीं दूसरी ओर वह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी बन चुका है। अब यह साफ होता जा रहा है कि आने वाले वर्षों में दुनिया भर की सरकारें टेक कंपनियों को खुली छूट देने के बजाय सख्त नियमन की राह चुन सकती हैं। फ्रांस ने इस दिशा में पहला साहसिक कदम बढ़ा दिया है और दुनिया की नजर अब इसके नतीजों पर टिकी है।