ग्रीनलैंड पर अमेरिका‑यूरोप रिश्तों में बढ़ता अविश्वास,यूरोप की एकजुटता से ढीले पड़े ट्रंप के तेवर

यूरोपीय नेताओं के हालिया बयानों से साफ हो गया है कि अमेरिका के साथ ‘हर हाल में साथ’ वाली नीति अब अतीत की बात हो चुकी है। यूरोप ने यह तय किया है कि वह न तो ब्लैकमेल वाली कूटनीति स्वीकार करेगा और न ही किसी दबाव में आकर अपने मूल हितों से समझौता करेगा।

Update: 2026-01-26 09:31 GMT
लंदन : यूक्रेन युद्ध को लेकर उपजी असहमतियों ने अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में पहले ही तनाव पैदा कर दिया था। अब ग्रीनलैंड के मुद्दे ने इस तनाव को और गहरा कर दिया है। वर्षों तक सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में अमेरिका के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला यूरोप अब खुलकर यह संकेत दे रहा है कि वह हर मसले पर वाशिंगटन की सरपरस्ती स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुख ने यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उनकी संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों के मामले में अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा करना अब जोखिम भरा हो सकता है।

चापलूसी की कूटनीति से दूरी

यूरोपीय नेताओं के हालिया बयानों से साफ हो गया है कि अमेरिका के साथ ‘हर हाल में साथ’ वाली नीति अब अतीत की बात हो चुकी है। यूरोप ने यह तय किया है कि वह न तो ब्लैकमेल वाली कूटनीति स्वीकार करेगा और न ही किसी दबाव में आकर अपने मूल हितों से समझौता करेगा। यह बदलाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोप अपनी सामूहिक ताकत और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है।

ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की नई सक्रियता

यूरोप की तीन प्रमुख ताकतें—ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी—इस बदले हुए रुख की अगुवाई कर रही हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता के सवाल पर उनका देश किसी भी तरह की नरमी नहीं दिखाएगा। स्टार्मर का बयान इस बात का संकेत है कि ब्रेक्ज़िट के बाद भी ब्रिटेन यूरोपीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर महाद्वीप के साथ खड़ा रहना चाहता है। फ्रांस और जर्मनी भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रणनीतिक स्वायत्तता की बात को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है, जबकि जर्मनी अपनी रक्षा क्षमताओं और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने पर जोर दे रहा है।

नार्वे और डेनमार्क की सख्त चेतावनी

ग्रीनलैंड का मुद्दा सीधे तौर पर डेनमार्क से जुड़ा है, क्योंकि यह उसका स्वायत्त क्षेत्र है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अमेरिका को दो टूक संदेश दिया है कि यूरोप अब हर बात मानने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा, “हम बुरे सहयोगी नहीं हैं, लेकिन हर बात को मानना हमने बंद कर दिया है।” उनका यह बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की उस टिप्पणी के जवाब में आया, जिसमें उन्होंने डेनमार्क को ‘अच्छा सहयोगी’ न होने की बात कही थी। नॉर्वे के प्रधानमंत्री यूनास गार स्टोरे ने भी अमेरिका के रुख पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि सहयोगियों के बीच धमकियों के लिए कोई स्थान नहीं होता और किसी भी तरह की धमकी को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इन बयानों से यह स्पष्ट है कि उत्तरी यूरोप के देश भी इस मुद्दे पर एकजुट हैं।

ग्रीनलैंड का स्पष्ट संदेश

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन ने अमेरिका में अपने क्षेत्र के विलय की किसी भी संभावना को सख्ती से खारिज कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि ग्रीनलैंड की जनता अपने भविष्य का फैसला खुद करेगी। इस राजनीतिक रुख के साथ-साथ ग्रीनलैंड में आम लोगों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। वहां की जनता ने अमेरिकी सैन्य अड्डे के सामने प्रदर्शन कर यह दिखा दिया कि वे किसी भी तरह के अमेरिकी दबाव या विस्तारवादी सोच के खिलाफ हैं।

ट्रंप और मैक्रों के बीच तल्खी

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच सबसे ज्यादा तल्खी देखी गई। ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने यूरोप में असहजता पैदा की, जबकि मैक्रों ने खुलकर यूरोपीय एकजुटता और संप्रभुता की वकालत की। दोनों नेताओं के बीच यह टकराव दरअसल अमेरिका और यूरोप के बीच बदलते शक्ति संतुलन का प्रतीक माना जा रहा है।

बदला हुआ अमेरिकी सुर

यूरोप की बढ़ती एकजुटता का असर अमेरिकी रुख पर भी दिखाई देने लगा है। माना जा रहा है कि इसी दबाव के चलते ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मामले में अपने कदम पीछे खींचे हैं। अब वह सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की खुली बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि यूरोप की सुरक्षा और सामूहिक हितों का हवाला दे रहे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि यूरोप अगर एकजुट होकर खड़ा होता है, तो वह अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के रुख को भी प्रभावित कर सकता है।

नई यूरोपीय एकजुटता


ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल एक भू-राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह अमेरिका‑यूरोप रिश्तों के भविष्य की दिशा तय करने वाला संकेतक भी बन गया है। यूरोप अब यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह सहयोग चाहता है, लेकिन अधीनता नहीं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह नई यूरोपीय एकजुटता कितनी टिकाऊ साबित होती है और क्या इससे ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में संतुलन का नया अध्याय शुरू होता है।

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