चुनाव आयुक्त के दौरे से पहले कोलकाता में सीएम ममता का धरना, मृत घोषित हो चुके 22 लोगों को लाएंगी सामने

ममता बनर्जी ने मतदाता सूची से लाखों नाम हटने पर कोलकाता में धरना शुरू किया है। उनका आरोप है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के बाद मनमाने ढंग से नाम हटाए गए, जिससे निष्पक्ष चुनाव खतरे में है। मुख्यमंत्री ने 'मृत' घोषित किए गए जिंदा लोगों को सामने लाने की बात कही है, जो चुनाव आयोग और टीएमसी के बीच गहरे विवाद को दर्शाता है।

Update: 2026-03-07 05:25 GMT

कोलकाता। देशभर के कई राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद अलग-अलग राज्यों से लाखों की संख्या में लोगों के नाम काटे गए हैं। पश्चिम बंगाल में भी बड़ी संख्या में नाम काटे गए हैं। इसको लेकर सूबे की सीएम ममता बनर्जी शुरुआत से ही विरोध कर रही हैं। अब सीएम ममता ने नाम काटे जाने को लेकर कोलकाता में धरना शुरू कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पोस्ट-SIR प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से मनमाने तरीके से नाम हटाए जा रहे हैं।

ममता बनर्जी अपनी पार्टी के कई नेताओं के साथ कोलकाता के एस्प्लेनेड मेट्रो चैनल इलाके में धरने पर बैठीं हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने कई ऐसे लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए उन्हें मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वे अभी जिंदा हैं। उन्होंने कहा कि वे इस साजिश को बेनकाब करेंगी। सीएम ममता का यह धरना ऐसे समय में हो रहा है, जब कुछ ही दिनों में मुख्य चुनाव आयोग का बंगाल दौरा होने वाला है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वह ऐसे 22 लोगों को मीडिया के सामने पेश करेंगी, जिन्हें चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में मृत दिखाया है। जबकि वे जिंदा हैं। इसके अलावा 8 ऐसे परिवारों को भी मंच पर लाया जाएगा, जिनका कहना है कि SIR की प्रक्रिया में उन्हें नुकसान हुआ है।

क्यों बढ़ रहा ये विवाद?

ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच लंबे समय से विवाद देखने को मिल रहा है। ममता एसआईआर प्रक्रिया की शुरुआत से ही चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगा रही हैं। विवाद तब बढ़ा जब चुनाव आयोग की तरफ से 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की फाइनल वोटर लिस्ट जारी की गई थी। इस प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए या उनके वोट देने के अधिकार पर सवाल खड़े हो गए।

लोगों को वोट देने से वंचित किया जा रहा

पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी आरोप लगाया कि पहले ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में करीब 58 लाख नाम हटाए गए। बाद में यह संख्या बढ़कर लगभग 63 लाख हो गई। वहीं 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम अभी जांच के अधीन हैं। उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटना संयोग नहीं हो सकता है।

उन्होंने कहा कि संविधान हर नागरिक को वोट देने का अधिकार देता है और अगर लाखों लोगों को वोट से वंचित किया जाता है तो निष्पक्ष चुनाव पर सवाल उठते हैं।

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