साम्प्रदायिकता की आंच में तपती देवभूमि

हमारा देश जब लोकतंत्र की स्थापना के 78वें वर्ष की ओर कदम बढ़ा रहा था, तब देवभूमि कहे जाने वाले उसके ही एक प्रान्त में एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी विरासत पर भद्दी गालियों, जय श्रीराम और बजरंग बली की जय जैसे आक्रामक नारों के साथ हथौड़े और सब्बल चलाये जा रहे थे

By :  Deshbandhu
Update: 2026-01-27 20:48 GMT

हमारा देश जब लोकतंत्र की स्थापना के 78वें वर्ष की ओर कदम बढ़ा रहा था, तब देवभूमि कहे जाने वाले उसके ही एक प्रान्त में एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी विरासत पर भद्दी गालियों, जय श्रीराम और बजरंग बली की जय जैसे आक्रामक नारों के साथ हथौड़े और सब्बल चलाये जा रहे थे, वहां रखे धार्मिक ग्रंथों को नुकसान पहुंचाया जा रहा था और धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश की जा रही थी। दरअसल, मसूरी के एक मिशनरी स्कूल की निजी ज़मीन पर स्थित बाबा बुल्ले शाह की मजार बहुसंख्यक गुंडागर्दी की बलि चढ़ गई। उसके साथ मौजूद दो अन्य मज़ारों को भी तोड़ दिया गया, वहीं दानपेटी को तोड़कर नकदी निकाल ली गई। भाईचारे और सौहार्द्र का प्रतीक रही बुल्ले शाह की मज़ार के परिसर में रविवार की शाम मुट्ठी भर हिन्दूवादी जूते पहनकर घुस गये और अपने घटिया इरादों को अंजाम दिया। इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया। मसूरी पुलिस ने तीन नामजद आरोपियों सहित 25-30 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इस बीच हिन्दू रक्षा दल के अध्यक्ष भूपेंद्र उर्फ पिंकी चौधरी ने अपने संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा इस तोडफ़ोड़ की ज़िम्मेदारी ली है। पुलिस कब और कैसे इस दावे का संज्ञान लेती है, देखना होगा। हालांकि इस पूरे प्रकरण में राहत की बात ये रही कि पुलिस में शिकायत करने जाने वालों में केवल मुस्लिम संगठन ही नहीं, दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल थे।

बाबा बुल्ले शाह- जिन्हें बुल्लेया कहकर भी संबोधित किया जाता है, एक क्रांतिकारी दार्शनिक, समाज सुधारक और कवि थे, जिन्हें पंजाबी भाषा के महानतम कवियों में से एक माना जाता है और जिनका सम्मान 'पंजाबी ज्ञानोदय के जनक' के रूप में है। उनका असल नाम सैयद अब्दुल्लाह शाह कादरी था और उन्हें हजऱत मुहम्मद साहब की पुत्री फातिमा का वंशज माना जाता है। उनके पिता शाह मुहम्मद थे जिन्हें अरबी, फारसी और कुरान शरीफ़ का अच्छा ज्ञान था। पिता के नेक जीवन का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा और शायद इसीलिए 'सैयद' यानी ऊंची जाति से होते हुए भी उन्होंने निचली जाति 'आराइन' के शाह इनायत को अपना गुरु बनाया। हिन्दी और पंजाबी में अनगिनत गीत बुल्ले शाह की रचनाओं पर आधारित हैं या उनमें बुल्ले शाह का हवाला है। 1970 के दशक में नरेंद्र चंचल का गाया गीत- 'बेशक मंदिर-मस्जिद तोड़ो, बुल्ले शाह ये कहता / पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, जिस दिल में दिलबर रहता' हरेक किशोर और युवा की ज़बान पर हुआ करता था। लगभग दो दशक पहले मशहूर पंजाबी गायक रब्बी शेरगिल ने 'बुल्ला की जाणा मैं कौन' गाकर तारीफें हासिल की तो करीब एक दशक पहले रणबीर कपूर पर फिल्माया गया 'यार बुल्लेया' गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ। 'दमादम मस्त कलंदर' तो बाबा बुल्ले शाह की सदाबहार रचना है ही।

लेकिन धर्म का इकहरा और बेसुरा राग अलापने वाले जाहिल क्या जानें कि कविता क्या होती है और उसे संगीत में पिरोना क्या होता है, बुल्ले शाह की रचनाओं और उनके दर्शन को समझना तो बहुत दूर की बात है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बुल्ले शाह की मज़ार पर हमला सुनियोजित ढंग से किया गया हो। ताज्जुब है कि एक हिन्दूवादी संगठन खुलकर इस हमले की जिम्मेदारी ले रहा है, लेकिन उसकी भनक तक पुलिस को नहीं लगी। क्या यह सीधे-सीधे पुलिस के निगरानी और सूचना तंत्र की असफलता नहीं है। वैसे, उत्तराखंड जिस तेजी से हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनता जा रहा है, उसे देखकर यह माना जा सकता है कि धर्म के नाम पर उपद्रव करने वालों को कहीं न कहीं से शह मिल रही है और कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिये ज़िम्मेदार केवल खानापूरी कर रहे हैं। 'सबरंग इंडिया' वेबसाइट ने इस पहाड़ी प्रदेश में हुई सांप्रदायिक घटनाओं पर नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए गठित संघ (एपीसीआर) की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें 2021 और 2025 के बीच उत्तराखंड के कई जिलों में मुसलमानों को प्रभावित करने वाली सांप्रदायिक हिंसा, धमकी, बेदखली, विस्थापन और उनके धर्मस्थलों पर हमले की घटनाओं की एक श्रृंखला का दस्तावेजीकरण किया गया है। 'बहिष्कृत, लक्षित और विस्थापित :उत्तराखंड में सांप्रदायिक कथाएं और हिंसा साम्प्रदायिक' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट ज़मीनी जांच, पीड़ितों के बयानों, पुलिस रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेजों, आधिकारिक नोटिसों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है।

एपीसीआर ने दिसंबर 2021 की हरिद्वार धर्म संसद को एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में चिह्नित किया है। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में कई हिन्दुत्ववादी धार्मिक नेताओं ने भाषण दिये जिनमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और इस्लाम एवं ईसाई धर्म के दमन का आह्वान किया गया। 2023 में, उत्तराखंड सरकार ने सरकारी भूमि पर बने 'अवैध ढांचों' की पहचान करने और उन्हें हटाने के लिए राज्यव्यापी अभियान शुरू किया। मई 2024 तक, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दावा किया कि 5 हज़ार एकड़ भूमि वापस ले ली गई है। 2023 में ही उत्तरकाशी जिले के पुरोला में एक मुस्लिम और एक हिन्दू युवक द्वारा एक नाबालिग हिन्दू लड़की के कथित अपहरण के मामले ने कोहराम मचा दिया। लड़की ने बाद में अदालत में कहा कि उसका अपहरण नहीं हुआ था और पुलिस ने उससे जबरन बयान लिया था।

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि 24 अक्टूबर, 2024 को स्वामी दर्शन भारती के नेतृत्व में एक रैली ने उत्तरकाशी मस्जिद को गिराने की मांग की। रैली हिंसक हो गई, पांच पुलिसकर्मी और 30 से अधिक नागरिक घायल हो गये। मुस्लिम दुकानदारों के यहां तोडफ़ोड़ और लूटपाट की गई, जिसमें उन्हें भारी नुकसान हुआ। इस मामले में उच्च न्यायालय को आश्वासन दिए जाने के बावजूद, 1 दिसंबर 2024 को हिन्दुत्व महापंचायत की अनुमति दी गई, जहां तेलंगाना के भाजपा विधायक टी. राजा और अन्य वक्ताओं ने मस्जिद पर बुलडोज़र चलवाने जैसी धमकियां दीं। एपीसीआर के रिकॉर्ड से पता चलता है कि यह उच्च न्यायालय के निर्देशों की भावना का सीधा उल्लंघन था। टिहरी के श्रीनगर में 'लव जिहाद' के आरोपों के बाद कम से कम 15 मुस्लिम दुकानदारों को नजीबाबाद लौटने के लिए मजबूर किया गया। 15 अक्टूबर, 2024 को चमोली के गौचर में एक हिंदू और एक मुस्लिम के बीच पार्किंग को लेकर हुआ विवाद साम्प्रदायिक हिंसा में तब्दील हो गया। दक्षिणपंथी समूहों के हस्तक्षेप के कारण कम से कम 10 मुस्लिम दुकानदारों को उनकी दुकानों से बेदखल कर दिया गया। इससे पहले सितंबर में नंदा घाट में एक मुस्लिम नाई पर छेड़छाड़ के इल्जाम के बाद हुए विरोध प्रदर्शन तोडफ़ोड़ तक पहुंच गये। कई दुकानों को लूटा गया, वाहनों को नदियों में फेंक दिया गया और एक अस्थायी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।

एपीसीआर की रिपोर्ट में ऐसी और भी घटनाओं की जानकारी दी गई है, जिनका उल्लेख यहां किया जाना संभव नहीं है। इंडिया हेट लैब की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक भी उत्तराखंड उन शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है जहां सबसे अधिक नफ़रत भरे भाषण (हेट स्पीच) दर्ज किये गये। यह देश का पहला राज्य है जहां सबसे पहले समान नागरिक संहिता लागू की गई और धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया। इसके अलावा मदरसा बोर्ड अधिनियम को निरस्त कर राज्य के तमाम मदरसों को स्कूल शिक्षा बोर्ड से संबद्ध करने का निर्णय लिया गया है, जिसे इस साल लागू होना है। उनके इन फैसलों और बेकाबू साम्प्रदायिक तत्वों की करतूतों से ज़ाहिर है कि राज्य में अल्पसंख्यकों को सबक सिखाने के लिये कानूनी और गैर कानूनी तरीकों से भी, जो कुछ किया जा सकता है, किया जा रहा है। गौरतलब है कि दो बार मुख्यमंत्री बनकर सबसे लंबा कार्यकाल पाने वाले पुष्कर सिंह धामी प्रदेश के पहले राजनेता हैं, लेकिन इन फैसलों के अलावा उपलब्धियों के नाम पर गिनाने को उनके पास ख़ास कुछ नहीं है। वे अपने सूबे को पर्यटन और फ़िल्म निर्माण का केन्द्र बनाने का इच्छा ज़ाहिर करते हैं, तो उन्हें यह बताना चाहिये कि प्राकृतिक रूप से ठंडी लेकिन साम्प्रदायिक तौर पर गर्म रखी जा रही देवभूमि में कोई क्यों आना चाहेगा।

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