राष्ट्रपति को राजनीति में घसीटने की भूल

पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा से राज्य की राजनीति में 'आदिवासी अस्मिता' और 'संवैधानिक मर्यादा' की नयी बहस छिड़ गई है

By :  Deshbandhu
Update: 2026-03-09 02:45 GMT

पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा से राज्य की राजनीति में 'आदिवासी अस्मिता' और 'संवैधानिक मर्यादा' की नयी बहस छिड़ गई है। शनिवार को राष्ट्रपति 9 वीं अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में शामिल होने के लिए उत्तर बंगाल गई थीं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू संथाल समुदाय से हैं और वे इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि थीं। हालांकि यह भी बड़ी अजीब बात है कि देश की प्रथम नागरिक की पहचान उनकी जाति या समुदाय से की जा रही है। कायदे से तो राष्ट्रपति के लिए दलित, पिछड़े, आदिवासी, सवर्ण, अल्पसंख्यक, महिला, पुरुष सब एक समान होना चाहिए, क्योंकि संविधान सबको एक जैसी बराबरी देता है और राष्ट्रपति ही उस संविधान की रक्षक हैं। मगर अफसोस कि भाजपा उनके जरिए आदिवासी कार्ड भुना रही है। जिसका सियासी और चुनावी मकसद किसी से छिपा नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को लेकर खुद राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि इसे पहले बिधाननगर में आयोजित होना था, लेकिन फिर इसे सिलीगुड़ी के पास गोसाईंपुर में बदल दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि मैदान बदलने से बहुत से संथाल लोग कार्यक्रम में नहीं आ पाए। बिधाननगर का मैदान बहुत बड़ा था, वहां 5 लाख लोग आसानी से आ सकते थे, लेकिन प्रशासन ने कहा कि जगह छोटी और भीड़भाड़ वाली है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, 'मुझे लगता है कि कोई संथालों को एकजुट नहीं होने देना चाहता, उन्हें पढ़ना-लिखने देना नहीं चाहता, उन्हें मजबूत नहीं होने देना चाहता।'

यह सीधे-सीधे राजनैतिक आरोप है कि कोई संथालों को एकजुट नहीं होने देना चाहता। ऐसी बात कोई भाजपा नेता कहता तो उसमें हर्ज नहीं था। मगर राष्ट्रपति भी अगर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का हिस्सा बनेंगी तो फिर देश की संवैधानिक व्यवस्था कैसे बरकरार रहेगी। संथाल हो या कोई और समुदाय उनकी एकजुटता और पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का माहौल देश में सरकारें बनाएं, राष्ट्रपति को इसकी चिंता होनी चाहिए। मगर इस वाकये से यही लग रहा है कि वे प.बंगाल में टीएमसी की सरकार पर निशाना साध रही हैं। क्योंकि ममता बनर्जी को छोटी बहन कहते हुए द्रौपदी मुर्मू ने कहा, 'गोसाईंपुर बहुत दूर है। शायद उन्हें लगा कि राष्ट्रपति आएंगी और चली जाएंगी क्योंकि वहां कोई नहीं होगा। मैं सच में बहुत दुखी हूं। आम तौर पर, जब राष्ट्रपति कहीं जाते हैं, तो मुख्यमंत्री आते हैं, मंत्री आते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री नहीं आईं। उन्होंने खुद को बंगाल की बेटी बताते हुए कहा कि ममता बनर्जी मेरी बहन हैं 'शायद वह मुझसे नाराज़ हैं। लेकिन कोई बात नहीं, मैं उनके अच्छे होने की दुआ करती हूं।'

इस सियासी आरोप का जवाब ममता बनर्जी ने बड़े सलीके से दे दिया। उन्होंने कहा कि 'जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ या मणिपुर में आदिवासियों पर अत्याचार होते हैं, तब आप क्यों चुप रहती हैं? बात सही भी है, क्योंकि द्रौपदी मुर्मू के सामने मणिपुर जलता रहा, लेकिन उन्होंने एक बार यह कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि नरेन्द्र मोदी को वहां फौरन जाना चाहिए था। ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल में कोई चूक नहीं हुई। अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट में मुख्यमंत्री ने उन दावों को भी खारिज कर दिया कि राष्ट्रपति को किसी ने स्वागत नहीं किया। उन्होंने लिखा, 'एक निजी आयोजक इंटरनेशनल संथाल काउंसिल ने राष्ट्रपति को कॉन्फ्रेंस में आमंत्रित किया था। एडवांस सिक्योरिटी के संपर्क के बाद जिला प्रशासन ने राष्ट्रपति सचिवालय को लिखकर बताया कि आयोजक ठीक से तैयार नहीं लग रहा था; यह चिंता टेलीफोन पर भी जताई गई थी। माननीय राष्ट्रपति को सिलीगुड़ी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के मेयर, दार्जिलिंग के डीएम और सिलीगुड़ी पुलिस कमिश्नरेट के सीपी ने राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा साझा किए गए मंजूर लाइनअप के अनुसार ही उनका स्वागत किया और विदा किया। उन्होंने यह भी बताया कि जब राष्ट्रपति पधारी थीं, तब वे कोलकाता में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ धरने पर बैठी थीं।

इस स्पष्टीकरण के बाद कायदे से इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप होता, तब भी राष्ट्रपति राजनीति करने के आरोप से बच सकती थीं, लेकिन अब केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर रविवार शाम 5 बजे तक इस पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की। गृह मंत्रालय ने मुख्य सचिव से मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। राष्ट्रपति के आगमन पर उनके स्वागत के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं किया गया? मुख्यमंत्री या राज्य के मंत्रियों की उपस्थिति होनी चाहिए थी। दार्जिलिंग जिले में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन का स्थान अंतिम समय में क्यों बदला गया? कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं में हुई कथित खामियों पर भी जवाब मांगा गया है।

अब प.बंगाल के मुख्य सचिव इसका क्या जवाब देते हैं, और गृहमंत्रालय इस जवाब से संतुष्ट होता है या नहीं, यह बाद में पता चलेगा। लेकिन इतना तय है कि ऐन चुनाव से पहले भाजपा ने अपने प्रचार के लिए राष्ट्रपति को उतारने की चाल चली है। इस प्रकरण पर प्रधानमंत्री का बयान भी यही संकेत दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर लिखा, 'यह शर्मनाक और अभूतपूर्व है। लोकतंत्र और आदिवासी समुदाय के सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाले सभी लोग दुखी हैं। राष्ट्रपति जी, जो खुद आदिवासी हैं, उनके दर्द ने पूरे देश को दुखी किया है। टीएमसी सरकार ने हद पार कर दी है। उनका प्रशासन राष्ट्रपति का अपमान करने के लिए जिम्मेदार है। संथाल संस्कृति को इतने हल्के में लिया जाना अफसोस की बात है। राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर है, उसका सम्मान होना चाहिए।'

काश अपनी बातों को नरेन्द्र मोदी खुद पढ़ते तो उन्हें वाकई समझ आता कि राष्ट्रपति पद की गरिमा बनाए रखना कितना जरूरी है। लेकिन मोदी सरकार में तो राष्ट्रपति महोदया को दही-चीनी खिलाने के काम में लगा दिया गया है और दावा इस पद के सम्मान का है।

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