जेन जी को नहीं चाहिए माफी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बारह साल पहले जब सत्ता संभाली थी तो नेहरू जी की नकल करते हुए खुद को प्रधानमंत्री की जगह प्रधानसेवक बताया था।;
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बारह साल पहले जब सत्ता संभाली थी तो नेहरू जी की नकल करते हुए खुद को प्रधानमंत्री की जगह प्रधानसेवक बताया था। लेकिन उनका व्यवहार किसी राजा की तरह ही बना रहा, जो इस देश के नागरिकों को प्रजा की तरह देखता है। इसलिए उन्होंने कहा है कि मैं गुमराह बच्चों को माफ करता हूं। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी इन दिनों संसद की जगह इंस्टाग्राम पर ज्यादा नजर आ रहे हैं। उनकी जो नयी रील आई है, उसमें उन्होंने फिर से खुद को पीड़ित की तरह पेश करते हुए देश की नयी पीढ़ी को माफ करने का संदेश दिया है। माफी का यह फरमान मोदी के लिए अब बड़ी फांस बन गया है। और तमाम लोग इस पर उनके पुराने वीडियो निकाल कर बैठे हैं, जिसमें वो खुद अपशब्द कह रहे हैं या उन लोगों को सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर फॉलो कर रहे हैं, जिन्होंने गालियों की राजनीति की।
प्रधानमंत्री के इस माफ करने के फरमान पर अब सैकड़ों रील्स और मीम्स इस समय सोशल मीडिया पर वायरल हैं। अगर भाजपा को लगता है कि वो दमनकारी हथकंडे यानी पुलिस का डर दिखाकर, अदालतों के चक्कर लगवाकर इन युवाओं को डराएगी, तो वो खुद को ही अंधेरे में रख रही है। मोदी ने तो कह दिया है कि हम नयी पीढ़ी को अदालतों के चक्कर नहीं लगवाना चाहते, उन्हें सही राह पर लाना चाहते हैं, तो इसका भी जवाब अब जेन जी दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी ताजा रील में कल्चरल शॉक यानी सांस्कृतिक तौर पर लगने वाले झटके की बात भी कही कि लड़कियां गाली दे रही हैं। इस एक वाक्य ने उनके मन में बैठे भेदभाव को सामने ला दिया। लड़के गाली दें तो उन्हें झटका नहीं लगता, लड़कियों की भाषा पर आपत्ति है। और सबसे पहली बात तो यही है कि मुद्दा गाली होना चाहिए या पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में हुए खिलवाड़ का होना चाहिए। जंतर-मंतर पर आंदोलन क्यों खड़ा हुआ, लाखों लोग क्यों चंद दिनों में एक ही मकसद के लिए जुट गए, किसलिए निहत्थी जनता ने बिना संसाधनों के सरकार के सामने प्रतिरोध करना शुरु किया, क्यों पुलिस के अत्याचार को हंसते-मुस्कुराते सह लिया, लेकिन अपने मकसद से पीछे लोग पीछे नहीं हटे, जिन युवाओं और बच्चों को अब तक गैरजिम्मेदार और अपने ही मोबाइल में गुम मानकर पिछली पीढ़ी के लोग डांटते-फटकारते रहते थे, उन लोगों ने कैसे देश को आंदोलन करने की एकदम नयी राह दिखा दी, इन सारे सवालों को गालियों के मुद्दे से दबाने की कोशिश मोदी सरकार कर रही है।
पिछले दस दिनों में प्रधानमंत्री मोदी ने चार-चार रील्स बनाकर खुद को जेन-ज़ी से जोड़ने की कोशिश की। पहली रील 23 जुलाई को रात बारह बजने में आठ मिनट कम पर यानी 11.52 पर आई। मोदी इतना तो जानते हैं कि आज के बच्चे सोने या जागने के लिए दिन-रात के मोहताज नहीं हैं। जब इनका मन करता है सोते हैं, जब मन करता है रात भर जाग कर काम करते हैं। खैर मोदी ने हैलो फ्रैंड्स कहकर नीट पेपर लीक पर सरकार ने क्या-क्या किया, यह सब बताया। लेकिन इस रील में अपने कैमरा एंगल पर मोदी खूब फंसे। फिर दूसरी रील उन्होंने 24 जुलाई की रात को बनाई, इस बार पहली रील पर मिले भारी रिस्पॉन्स और सुझावों के लिए युवाओं का आभार जताया था। जबकि हकीकत ये है कि 23 तारीख वाली रील पर उनका मजाक ज्यादा बना था। खैर 26 जुलाई को एक और रील मोदी की आई, उन्होंने बताया कि नंदन नीलेकणि अब परीक्षा सुधार का काम करेंगे, सब कुछ हाईटेक होगा। लेकिन पिछली दोनों रील्स की तरह इस बार भी जेन-ज़ी ने उनसे जुड़ने से इंकार किया। तो फिर मोदी की चौथी रील शुक्रवार रात को आ गई, जिसमें उन्होंने अपने लिए कहे अपशब्दों पर बात की और साथ ही मैं माफ करता हूं, जैसा राजशाही फरमान सुनाया।
इस रील पर राहुल गांधी ने भी लिखा कि अपने बच्चों को खोने वाले माता-पिता के आंसू, उनका बिलखना- इससे बड़ा कोई दु:ख नहीं होता... उसके बाद भी प्रधानमंत्री की ये हिम्मत है कि वो छात्रों को 'माफ़Ó करने की बात करते हैं। क्या वो एक भी शोकाकुल परिवार से मिले जिन्होंने अपने बच्चे को खोया है या उन लोगों से जिनकी जमा पूंजी, ज़िंदगी, वक्त और सपने सब पेपर लीक से छीन लिए गए? जवाब है नहीं!
भारत के छात्रों को प्रधानमंत्री की क्षमा की ज़रूरत नहीं- मोदी जी को उनसे माफ़ी मांगनी चाहिए।
लेकिन माफी मांगना तो दूर, मोदी ने उन परिवारों के लिए संवेदना के दो शब्द भी नहीं कहे, जिनके बच्चों की जिंदगी पेपर लीक के कारण तबाह हो गई। बल्कि वे अब भी अपने मनोरंजन में लगे हैं। शनिवार को आंध्रप्रदेश के दौरे पर प्रधानमंत्री थे, जहां उनका ऐसा स्वागत हुआ मानो उनकी ताजपोशी हुई हो। राजाओं के दौर में जिस तरह स्वागत के लिए लड़कियों और महिलाओं से डांस करवाया जाता था, वैसे ही 13 हजार लड़कियों का डांस मोदी के सामने करवाया गया।
मोदी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि पेपर लीक के खिलाफ उन्होंने एक कड़ा कानून बना दिया है। इस मानसून सत्र में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू हो गया है, जिसके प्रमुख प्रावधानों में 10 साल तक की जेल, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, और फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा 3 महीने में फैसला शामिल हैं। यानी अब पेपर लीक हुआ तो दोषी के लिए जेल और जुर्माने की सख्ती तो बढ़ा दी गई है, लेकिन जो असल सवाल है यानी पेपर लीक क्या रुकेगा, इस पर सरकार चुप है। मोदी जो कभी आधी रात को कभी सुबह-सुबह रील्स बनाकर हैलो, हाय फ्रैंड्स कर रहे हैं, क्या उससे पेपर लीक होना बंद हो जाएंगे। माफीनामे राजशाही में जारी किए जाते थे। राजाओं के आगे गुस्ताखी माफ करने की अर्जी पेश की जाती थी फिर राजा की मर्जी हुई तो माफ किया, नहीं हुई तो सूली पर लटका दिया। लेकिन नरेन्द्र मोदी के सामने तो किसी ने माफी की पेशकश नहीं की, जेन-ज़ी ने उन्हें राजा मानने से भी इंकार कर दिया। बल्कि उन्हें उनकी जिम्मेदारियां याद दिलाईं तो उस पर भी मोदी अब यही दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि जेन-ज़ी ने उनके साथ कितना दुर्व्यवहार किया है। अब तक मोदी गालियों को अपने लिए टॉनिक बताया करते थे, इसी तर्क के सहारे वो विपक्ष को घेरते थे कि मुझे जितना भला-बुरा कहोगे उतना तुम्हारा नुकसान होगा। लेकिन जेन-ज़ी के साथ यही चालाकी मोदी ने की, तो उल्टा फंस गए।