विपक्ष के आगे लाचार सत्तारुढ़ भाजपा

कांग्रेस समेत विपक्ष को घेरने के लिए जो शब्दावली इस्तेमाल में लायी जा रही है, वो एक ही कलम से निकली हुई लग रही है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-04-30 21:30 GMT

संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की मुहिम अब भाजपा के लिए चुनावी हथियार बन चुकी है। पाठक जानते हैं कि हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच 16 अप्रैल को केंद्र सरकार ने संसद का तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया था। जबकि सारे जरूरी काम कुछ दिन पहले खत्म बजट सत्र में भी किए जा सकते थे। लेकिन विशेष सत्र बुलाने पर विशेष कवरेज भी सरकार को मिलता और यही भाजपा का मकसद भी था। महिलाओं के आरक्षण से जुड़ा नारी शक्ति वंदन अधिनियम तो 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका था।

फिर भी इसे तीन साल तक अमल में लाने लायक नहीं बनाया गया। मोदी सरकार ने इसे आगामी जनगणना और संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन तक ठंडे बस्ते में डाल दिया था। जबकि महिला आरक्षण को लागू करके 2024 के लोकसभा और तब से संपन्न कई विधानसभा चुनाव कराए जा सकते थे। लेकिन इसमें भाजपा को चुनावी फायदा शायद नहीं होता। इसलिए 131वें संविधान संशोधन विधेयक की आड़ में पहले से ही पारित महिला आरक्षण विधेयक को दोबारा संसद के पटल पर रखने की चाल भाजपा ने चली। मगर विपक्ष की एकजुटता और दमदार विरोध से यह विधेयक संसद में गिर गया। कायदे से इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि इससे उनकी सरकार के अल्पमत में होने का प्रमाण मिल चुका था। लेकिन इसकी जगह अब विपक्ष को महिला विरोधी बताने की मुहिम देश भर में भाजपा ने छेड़ दी है।

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में विधानसभाओं के विशेष सत्र इसी मुद्दे पर बुलाए गए और मजेदार बात ये है कि कांग्रेस समेत विपक्ष को घेरने के लिए जो शब्दावली इस्तेमाल में लायी जा रही है, वो एक ही कलम से निकली हुई लग रही है। जैसे भाजपा की ट्रोल आर्मी सोशल मीडिया पर किसी को चने के झाड़ पर चढ़ाने या फिर उसे बदनाम करने के लिए एक जैसे पोस्ट थोक के भाव में करवाती है, कुछ वैसा ही माहौल अब विधानसभाओं का बनाया जा रहा है। जैसे उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने समाजवादी पार्टी के लिए कहा कि 'आपके आचरण पर तो गिरगिट भी शरमा जाए। आज अगर आप 33 प्रतिशत आरक्षण की बात कर रहे हैं, तो संसद में इसका विरोध क्यों किया था?' योगी ने कहा कि 'आप आधी आबादी की गरिमा, सम्मान और उत्थान के लिए उठाए गए हर सकारात्मक कदम का विरोध करते हैं। लोकसभा में 16 और 17 अप्रैल को आपका आचरण सबने देखा।

वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही कहा संविधान संशोधन का श्रेय हमें नहीं चाहिए। कांग्रेसी साथियों की नकारात्मकता ऐसी रही है कि, वे पक्ष में और विपक्ष में रहते हुए महिला आरक्षण का विरोध करते हैं। कांग्रेसी गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं। इससे तो गिरगिट भी शरमा जाए। नारी शक्ति वंदन अधिनियम को कोई भी परिसीमन के संशोधन के बिना पास नहीं कर सकता है।

अब सोचने वाली बात ये है कि विपक्ष के विरोध के लिए गिरगिट ही आदित्यनाथ योगी और डॉ.मोहन यादव को क्यों याद आई। क्या इन दोनों में से कोई भी दूसरा उदाहरण पेश नहीं कर सकता था। वहीं दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में भाजपा विधायक दल ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में नारी शक्ति अधिनियम के संसद में पास ना होने पर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद कांग्रेस और सपा को नारी विरोधी, विश्वासघाती कहा गया। साथ ही विरोध का खास जोर राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर रहा। विधानसभाओं के विशेष सत्र के अलावा 29 तारीख को काशी पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि 'काशी के सांसद के तौर पर, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मुझे देशहित के एक बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आपका आशीर्वाद चाहिए। और यह बड़ा लक्ष्य है, लोकसभा-विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करना। अभी कुछ दिन पहले सपा और कांग्रेस जैसे दलों की वजह से हमारा यह प्रयास संसद में सफल नहीं हो पाया, लेकिन मैं आप सभी बहनों को फिर से भरोसा देता हूं कि आपके आरक्षण का हक लागू हो, इसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडूंगा।' 2014 से श्री मोदी के पास देश की सत्ता है, सारे संसाधन, प्रशासनिक तंत्र, अधिकारी उनके मातहत हैं और वे चाहें तो इनका सकारात्मक उपयोग करके देश के सूरतेहाल बदल डालें। लेकिन प्रधानमंत्री 12 साल बाद भी जनता से उसका आशीर्वाद ही मांग रहे हैं कि मैं ये करुंगा, वो करुंगा। पता नहीं हमारे प्रधानमंत्री कितने लाचार हैं कि हर मंच से वे केवल अपना दुखड़ा ही बताते हैं कि विपक्ष उनको कितना परेशान करता है।

सत्ता पर बैठकर विपक्ष का रोना रोने वाली सरकार पहली बार देश को मिली है और अकेले प्रधानमंत्री ही नहीं, उनका देखा-देखी अब राज्यों के मुख्यमंत्री भी काम करने की जगह विपक्ष को कोस रहे हैं। पहले सरकार से नाराजगी होती थी तो जनता प्रधानमंत्री या सत्तारुढ़ नेताओं के पुतले फूंका करती थी, लेकिन मोदी राज में उल्टी गंगा बह रही है। उत्तरप्रदेश में बिजनौर, बहराइच जैसे कई जिलों में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के पुतले भाजपा नेताओं ने फूंके। मानो विपक्ष ने सरकार के किसी काम का विरोध कर कोई अपराध कर दिया हो। भाजपा नेताओं ने यह भी नहीं सोचा कि लोकतंत्र है तो उसमें कम से कम दो पक्ष होंगे ही। चीन या उत्तर कोरिया की तरह देश में अभी एकल पार्टी व्यवस्था नहीं बनी है, न ही एक व्यक्ति ही सर्वोपरि है। यहां संविधान का शासन है, जिसके अनुसार लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली काम करती है। जिसमें विपक्ष को पूरा हक है कि वह किसी विधेयक पर अपना विरोध दर्ज कराए। इस पर अगर पुतले जलाने की नौबत आए तो इसका मतलब है कि भाजपा लोकतंत्र के मामले में काफी अपरिपक्व है, उसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

बहरहाल, अखिलेश यादव और राहुल गांधी का पुतला फूंकने के दौरान बहराइच में एक हादसा हो गया, जिसमें आग लगाने वाली भाजपा विधायक अनुपमा जायसवाल ही जल गई, और अब उनका इलाज लखनऊ के एक अस्पताल में चल रहा है। अखिलेश यादव को जब यह पता चला तो वे घायल विधायक से मिलने अस्पताल पहुंच गए। इसके बाद एक पोस्ट में उन्होंने लिखा हम नहीं चाहते कि समाज के बीच आग जले। हम चाहते हैं कि समाज में सौहार्द्र की फुहार हो। हमारी सकारात्मक राजनीति की स्वस्थ परंपरा ने हमें यही सिखाया है। इसलिए हम बीजेपी विधायक श्रीमती अनुपमा जायसवाल जी से मिलने गए और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करके लौटे हैं। राजनीति अपनी जगह है और मानवीय संबंधों का महत्व अपनी जगह।

अखिलेश यादव ने समाज में आग न लगाने को लेकर एक बड़ी नसीहत दे दी है, अब भाजपा को सोचना होगा कि क्या वह इससे कुछ सबक लेगी। 

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