पत्रकारों पर नया हमला
पश्चिम बंगाल के प्रमुख बंगाली समाचार पत्र आनंदबाजार पत्रिका इस समय भाजपा और शुभेन्दु अधिकारी सरकार के निशाने पर आ गया है।;
पश्चिम बंगाल के प्रमुख बंगाली समाचार पत्र आनंदबाजार पत्रिका इस समय भाजपा और शुभेन्दु अधिकारी सरकार के निशाने पर आ गया है। मंगलवार को अखबार के दफ्तर के बाहर भगवा रंग के कपड़े पहने कुछ गुंडों ने दीवार को भगवा रंग पोत दिया और यह सब जब हो रहा था तो कोलकाता पुलिस वहीं मौजूद थी। घटना के जो वीडियो सामने आए हैं, उसमें यह गुंडागर्दी साफ तौर पर दिखाई दे रही है। इस पर तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने लिखा है कि बंगाल अंधकार युग में चला गया है। वाकई जो माहौल इस समय बंगाल में बना दिया गया है, वह किसी अंधेरे से कम नहीं है।
मई में चुनाव जीतने के बाद से भाजपा एकदम मदांध होकर व्यवहार कर रही है। टीएमसी नेताओं को तो लगातार निशाना बनाया ही जा रहा है, इसके अलावा हर उस आवाज को कुचलने की कोशिश हो रही है जो भाजपा सरकार के विरोध में उठे।
20 अगस्त को ही शुभेन्दु अधिकारी ने जादवपुर यूनिवर्सिटी में लाल सलाम किशनजी के नारे दीवारों पर लिखे होने का विरोध करते हुए कहा कि नारों के साथ बहुत कुछ मिटा देंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आजादी के नारे लगाने वाले तत्वों को 'घर के कचरे की तरह साफ' कर देना चाहिए। शुभेन्दु अधिकारी के बयान के बाद ही यूनिवर्सिटी की दीवारों पर रंगाई-पुताई होने लगी और प्रशासन ने कहा कि यह सफाई करने के लिए हो रहा है। जबकि माकपा और एसएफआई जैसे संगठनों का कहना है कि यह असहमति की आवाज दबाने की कोशिश है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोशिश केवल यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को कुचलने तक पहुंच चुकी है।
जादवपुर यूनिवर्सिटी में फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी स्टूडेंट्स यूनियन और एबीवीपी के बीच हुई झड़पों पर आनंद बाजार पत्रिका ने भगवा गुंडागर्दी शीर्षक से खबर प्रकाशित की। इस शीर्षक पर आपत्ति जताते हुए अखबार के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार 27 अगस्त को शास्त्री महाराज नामक व्यक्ति ने कोलकाता में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि 'भगवा गुंडागर्दी' शब्द का इस्तेमाल जानबूझ कर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और समाज में अशांति फैलाने के उद्देश्य से किया गया। इसके आधार पर 28 अगस्त को पुलिस ने आनंदबाजार पत्रिका के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।
एफआईआर में आनंदबाजार पत्रिका की संपादक ईशानी दत्ता रॉय, चीफ रिपोर्टर सोमा मुखर्जी और संपादकीय टीम के अन्य सदस्यों के नाम शामिल किए गए हैं। शिकायत में मांग की गई है कि पुलिस यह जांच करे कि विवादित शब्द का सुझाव किसने दिया, शीर्षक किसने मंजूर किया और संपादन प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन लोगों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से यह शब्द इस्तेमाल किया। इसके बाद भगवा कपड़े पहने कई लोग मंगलवार दोपहर आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय के बाहर पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने 'आनंदबाजार पत्रिका हाय-हाय' और 'भगवा का अपमान हिंदुस्तान नहीं सहेगा' जैसे नारे लगाए। इसके बाद उन्होंने अखबार दफ्तर की दीवारों पर भगवा रंग पोत दिया। हालांकि कुछ घंटों बाद अखबार प्रबंधन ने दीवारों को दोबारा सफेद रंग से रंगवा दिया। हालांकि पुलिस ने इस घटना को लेकर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यह भी साफ़ नहीं है कि दीवारों पर रंग पोतने वाले लोगों के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया गया है या नहीं।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी आनंदबाजार पत्रिका से 24 घंटे के भीतर 'भगवा गुंडागर्दी' शीर्षक के लिए माफी मांगने को कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि अखबार माफी नहीं मांगता तो भगवा पहनने वाले लोग विरोध प्रदर्शन करेंगे। हालांकि अखबार ने माफी जारी नहीं की। इसके बाद कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ। एक ही घटना की ये सारी कड़ियां आपस में जिस तरह जुड़ रही हैं, उससे जाहिर है कि सत्ता के समर्थन के बिना अखबार के दफ्तर पर पहुंच कर गुंडागर्दी करने और पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर नहीं किया गया है। बहरहाल यह मामला बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट भी पहुंचा, जहां पत्रकारों की तरफ से उपस्थित हुए सीनियर एडवोकेट एस.एन. मुखर्जी ने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने कहा कि अखबार में भगवा गुंडागिरी शब्द के इस्तेमाल के बाद पत्रकारों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए और उन्हें तत्काल राहत की जरूरत है। लेकिन जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की अदालत ने मामले की तत्काल सुनवाई के लिए विशेष रूप से तारीख तय करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पहले एफआईआर रद्द करने की याचिका दाखिल की जाए। अब देखना होगा कि आगे इस मामले में अदालत का क्या फैसला रहता है।
इधर पत्रकार संगठनों ने भी घटना की कड़ी निंदा करते हुए एफआईआर तुरंत वापस लेने की मांग की है। इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स और प्रेस एसोसिएशन ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि पत्रकारों का काम तथ्यों को सामने लाना है। कई बार रिपोर्टिंग या इस्तेमाल किए गए शब्द कुछ लोगों को पसंद नहीं आते, लेकिन यही स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतंत्र की बुनियाद है।
प्रेस संगठनों ने शिकायत में यह मांग किए जाने पर भी आपत्ति जताई कि विवादित शब्द का सुझाव किसने दिया, उसे किसने मंजूर किया और शीर्षक तय करने में कौन-कौन शामिल था। उनका कहना है कि इस तरह संपादकीय प्रक्रिया में शामिल पत्रकारों और संपादकों की पहचान मांगना सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बनाने जैसा है। संगठनों ने इसे स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बनाने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का संरक्षण जरूरी है, न कि उसे कानूनी कार्रवाई के जरिए दबाने की कोशिश।
लेकिन प्रेस संगठनों को भी अब बदले हालात पर गौर करना होगा कि नैतिकता का हवाला देकर अगर लोकतंत्र मजबूत बनाया जा सकता तो आज ऐसी नौबत ही नहीं आती। हाल ही में राजदीप सरदेसाई को दिमागी नक्सल भाजपा ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर बताया था। उसके चंद दिनों बाद अब पत्रकारों पर एफआईआर हो रही है। पिछले 12 सालों में ऐसे सैकड़ों मामले हो चुके हैं जिससे भारत की प्रेस स्वतंत्रता बाधित हुई है। तो पत्रकारों को भी अब नजर और नजरिए का फर्क समझ कर जुबानी जमाखर्च से आगे बढ़कर मजबूत एकता दिखानी होगी।