नेपाल की बाढ़ से सबक
नेपाल एक बार फिर बड़ी प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ है। यहां के रसुवा जिले और आसपास के नेपाल-चीन सीमावर्ती इलाकों में आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है।;
नेपाल एक बार फिर बड़ी प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ है। यहां के रसुवा जिले और आसपास के नेपाल-चीन सीमावर्ती इलाकों में आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। अब तक सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों के लापता होने की खबरें हैं, लेकिन हताहतों की संख्या साफ-साफ बता पाना कठिन है। हर गुजरते वक्त के साथ मौतों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका बनी हुई है। इस आपदा की चपेट में नेपाल का बड़ा हिस्सा आया है, लेकिन मरने और लापता होने वालों में कई विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के मुताबिक़, लापता लोगों में भारत, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड्स, अमेरिका, मलेशिया, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका के नागरिक शामिल हैं। भारत से बहुत से सैलानी कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल पहुंचे हुए थे, जिनकी अब कोई खबर नहीं है।
26 अगस्त को आए इस प्रलय के जो वीडियो सामने आ रहे हैं, वो भयावह हैं। नदी का पानी विकरालता के साथ उमड़ता हुआ सबको लीलता हुआ आगे बढ़ रहा है। कहीं लोग जान बचाकर भाग रहे हैं, लेकिन फिर जलसमाधि लिए दिख रहे हैं, तो कहीं अपने घर की छतों पर खड़े होकर बचाव की गुहार लगा रहे हैं। चंद घंटों में ही सैकड़ों परिवार उजड़ चुके हैं। अपनी आंखों के सामने अपने परिजनों को बहते और डूबते देखने का दर्द आजीवन भुगतने के लिए सैकड़ों लोग अभिशप्त हो चुके हैं।
इस आपदा के बाद वैश्विक समुदाय की तरफ से नेपाल के लिए सहायता का हाथ बढ़ाया जा चुका है, जो सर्वथा सराहनीय है। भारत ने भी राहत सामग्री भेजने का सिलसिला शुरु कर दिया है। ऐसी आपदाएं सीमाओं में जकड़ी राजनीति और कूटनीति को एक पल ठहरकर सोचने का अवकाश देती हैं कि प्रकृति मनुष्य की बनाई सीमाओं को न जानती है, न मानती है। उसका कहर जब टूटता है तो धन, धर्म, भाषा, लिंग और देशों की सीमाओं की परवाह नहीं करता, सब एक जैसे इसमें प्रभावित होते हैं। इसलिए दुनिया पर अपना वर्चस्व दिखाने के लिए अतिक्रमण या घुसपैठ करना जिन देशों की फितरत रही है, उन्हें अपनी रणनीतियों पर विचार करना चाहिए।
नेपाल की बाढ़ ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या यह वाकई प्राकृतिक घटना है या इसके लिए मनुष्य की गलतियां भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि इस बाढ़ ने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के ज्वलंत सवालों को कुछ और सुलगा दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर्स काफ़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं। इसकी वजह से पहाड़ काफ़ी कमज़ोर हो रहे हैं, क्योंकि जो बफ़र् होती थी, वो एक तरह से सीमेंट का काम करती थी, यानी पहाड़ों को थामे रखना, मगर बर्फ तेज़ी से पिघल रही है, तो पहाड़ों से चट्टान नीचे आ रही हैं, जिसके कारण भूस्खलन और नदियों में बाढ़ आ रही है।
इस आपदा के बारे में शुरुआती जानकारी देते हुए नेपाल के विदेश मंत्री ने कहा था कि भूस्खलन से तिब्बत-नेपाल सीमा पर भूकंप की ख़बर मिली थी। इससे संकेत मिला कि भूकंप की वजह से शायद ये आपदा आई। भारत का भी यही मानना है। भारत के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी द्वारा दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा से सटे रसुवा क्षेत्र में सुबह 10 किलोमीटर की गहराई पर 4.9 तीव्रता का भूकंप महसूस किया गया।
एनआरएससी का अनुमान है कि तिब्बत के ऊंचे पहाड़ी इलाके में स्थित एक कटोरानुमा ग्लेशियर इसकी वजह से अस्थिर हो गया। हिमस्खलन के कारण विशालकाय बर्फ और मलबे का सैलाब तेजी से घाटी की ओर नीचे गिरा। इस मलबे ने अस्थायी रूप से नदी के प्रवाह को रोक दिया। कुछ ही समय में जब यह अस्थायी बांध टूटा तो प्रचंड वेग के साथ पानी, कीचड़, पत्थरों और मलबे की विशाल लहरें त्रिशूली नदी में बह निकलीं। इसके कारण नीचे बसे इलाकों में भीषण तबाही मच गई।
लेकिन अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के विश्लेषण में कहा गया है कि वहां कोई भूकं प नहीं आया था। यूएसजीएस का कहना है कि शुरुआत में काठमांडू के उत्तर में नेपाल-चीन सीमा पर जिस 4.4 या 5.2 तीव्रता के भूकंप का अनुमान लगाया गया था वह वास्तव में धरती की भूगर्भीय प्लेटों की हलचल नहीं थी। बल्कि भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानों और मलबे के तेजी से गिरने से उपजे कं पन को मशीन ने भूकंप समझ लिया था।
तो फिलहाल यही सवाल सुलझाना है कि आपदा का मुख्य कारण क्या था। भारतीय विशेषज्ञों के अनुसार, इस तबाही का केंद्र भले ही भारतीय सीमा से लगभग 200 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित था, लेकिन यह घटना पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बड़ी चेतावनी है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि नदी के ऊपरी हिस्से में अभी भी मलबा जमा होने की बात कही जा रही है। अगर वहां फिर से पानी जमा होता है और मलबे टूटता है, तो दूसरी बाढ़ आ सकती है। इसी वजह से नेपाल और चीन की एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर रख रही हैं। वैज्ञानिक सैटेलाइट तस्वीरों, नदी के पानी के आंकड़ों और भूकंपीय रिकॉर्ड की मदद से यह पता लगाने में जुटे हैं कि आगे कितना खतरा बना हुआ है।
नेपाल का कहना है कि इस बाढ़ के कारण के बारे में हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे भी यह नहीं बता पाए हैं कि इसकी वजह क्या है। बता दें कि 2016 में भी रसुवागढ़ी में भीषण बाढ़ आई थी, तब विशेषज्ञों ने कहा था कि अगर दोनों देशों के बीच समय पर सूचना का आदान-प्रदान हुआ होता तो जान-माल के नुक़सान को कम किया जा सकता था। लेकिन इस घटना ने जाहिर किया है कि चीन और नेपाल के बीच इस मामले में संवाद की कमी रही है। हालांकि नेपाल के चीनी दूतावास ने कहा, 'भविष्य में हम मौसम, जल विज्ञान और भूगर्भीय जोखिमों से जुड़ी सूचनाओं का बेहतर आदान-प्रदान, ख़ासकर सीमा पार होने वाली आपदाओं के मामले समन्वय मज़बूत करेंगे। नेपाल और चीन पड़ोसी देश हैं और भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए इस आपदा से सबक लेते हुए दोनों देशों को अपनी तैयारियों को मज़बूत करना चाहिए, ताकि सीमा के दोनों ओर लोगों की जान और संपत्ति की बेहतर सुरक्षा हो सके।
चीन के इस कथन पर केवल नेपाल और चीन के लिए नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के सारे देशों को गौर करने की जरूरत है।