थाने में पत्रकार, कटघरे में पत्रकारिता

जम्मू-कश्मीर में साइबर पुलिस की ओर से पत्रकारों को तलब किए जाने पर और उनसे हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने के आरोपों पर प्रेस की आजादी का सवाल नए सिर से खड़ा हो गया है

By :  Deshbandhu
Update: 2026-01-22 21:12 GMT

जम्मू-कश्मीर में साइबर पुलिस की ओर से पत्रकारों को तलब किए जाने पर और उनसे हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने के आरोपों पर प्रेस की आजादी का सवाल नए सिर से खड़ा हो गया है। पिछले हफ़्ते जम्मू-कश्मीर में पुलिस ने मस्जिदों की प्रबंधन समितियों के सदस्यों और उनके परिवारों की सभी निजी जानकारियां इकठ्ठा करने का अभियान शुरू किया था। कई बड़े अख़बारों के इस ख़बर को छापने पर श्रीनगर में मौजूद उनके संवाददाताओं को साइबर पुलिस ने तलब किया। इसी सिलसिले में इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों के साथ किया गया सलूक अब विवाद का कारण बन गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक पिछले 20 सालों से उनके संपादक रहे बशारत मसूद ने श्रीनगर के साइबर पुलिस थाने में चार दिनों में 15 घंटे बिताए और उनसे एक बॉण्ड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया कि वह शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करेंगे। हालांकि बशारत मसूद ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। वहीं हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी खबर में कहा कि उसके संवाददाता आशिक हुसैन को भी मौखिक समन मिला था, लेकिन अखबार ने जवाब देने के लिए 'कारण सहित' लिखित समन की मांग की।

इस मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने पत्रकारों की स्वतंत्रता और सुरक्षा का सवाल उठाते हुए एक बयान जारी कर कहा है कि, 'पत्रकारों को मनमाने ढंग से तलब करना, पुलिस की ओर से पूछताछ करना और दबाव में हलफ़नामे लेने की कोशिश करना, मीडिया को उसके वैध कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने के लिए किया गया ज़बरदस्ती और डराने-धमकाने जैसा क़दम है।' एडिटर्स गिल्ड ने पुलिस और अधिकारियों से ऐसी कार्रवाइयां नहीं करने की अपील की है, जो अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमित करती हैं और मीडिया को उसके मूल कामकाज से रोकती हैं। वहीं डिजीटल मीडिया के संगठन डिजीपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन ने इसे 'पत्रकारों का उत्पीड़न' बताया है। डिजीपब के बयान में कहा गया, 'पत्रकारों को तलब करने के ठोस कारण नहीं बताए गए। हफ़्तों तक उन्हें अलग-अलग अधिकारियों के पास भेजा जाता रहा, लेकिन बार-बार पूछने के बावजूद किसी कथित अपराध की जानकारी नहीं दी गई। जनहित के लिए की जाने वाली ऐसी पत्रकारिता को अपराध की तरह पेश करना और बिना क़ानूनी प्रक्रिया के 'पत्रकारों को बॉन्ड पर हस्ताक्षर के लिए मजबूर करना प्रेस की आज़ादी पर गंभीर हमला' है। बयान में यह भी कहा कि साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से 'जम्मू-कश्मीर में प्रेस की आज़ादी लगातार कमज़ोर हुई' है।

इन दोनों महत्वपूर्ण संगठनों के बयानों से जाहिर होता है कि प्रेस की आजादी को लेकर वे चिंतित हैं, लेकिन पिछले 12 सालों में पत्रकार उत्पीड़न की यह न पहली घटना है और न इसे आखिरी माना जा सकता है। बल्कि अब जो हालात बने हैं, उसमें स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जगह सिमटती जा रही है। इन दोनों संगठनों को अगर पत्रकारों और पत्रकारिता की हालत दुरुस्त करनी है, तो सरकार से केवल अपील करके काम नहीं चलेगा, इसके लिए दीर्घकालिक योजना बनाने और पत्रकारों को एकजुट करने की भी जरूरत है।

मौजूदा माहौल में पत्रकार भी दो खेमे में बंटे हुए हैं। एक तबका वह है जो दीपावली और नए साल के मौकों पर सत्ता से तोहफे लेकर खुश है। यह तबका खुद को राष्ट्रवादी मानकर सरकार की आलोचना को पाप समझता है और लगातार उन्हीं मुद्दों पर खबरें बनाता है, विमर्श करता है, जिससे सरकार को फायदा पहुंचे। दूसरी तरफ वो पत्रकार हैं, जो सारे जोखिम उठाकर सत्ता पर बैठे लोगों से ऐसे सवाल पूछते हैं, जिनसे सत्ताधारियों को असुविधा होती है। इन पत्रकारों को घंटा देख कर आए हो, जैसे जवाब सुनने पड़ते हैं। इसके बाद भी कुछ आवाज़ें तो पत्रकार के समर्थन में उठती हैं, लेकिन बाकी फौरन लीपापोती में जुट जाते हैं।

जम्मू-कश्मीर में ही 2019 के बाद फ़हाद शाह के अख़बार 'कश्मीरवाला' को बंद कर दिया गया और उन्हें सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां 21 महीने बाद उन्हें ज़मानत मिली। पिछले साल नवंबर में जम्मू में 'कश्मीर टाइम्स' के दफ़्तर पर छापा मारा गया और पुलिस ने दावा किया कि वहां हथियार मिले हैं। यह अख़बार कई साल पहले छपना बंद हो चुका है और अब सिर्फ ऑनलाइन पोर्टल चलाता है। इन घटनाओं पर इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसी वैश्विक संगठनों ने चिंता जता चुके हैं। लेकिन इसमें देशव्यापी स्तर पर जैसा विरोध देखने मिला था, वह नहीं हुआ। अभी की घटना पर भी इंडियन एक्सप्रेस ने एक बयान में कहा है कि, 'हम अपने पत्रकारों के सम्मान और गरिमा की सुरक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे।' लेकिन सवाल यही है कि यह कैसे होगा।

मीडिया पर पूंजी का शिकंजा इतना अधिक कस चुका है कि अब मीडिया मालिकों के लिए सत्ता से भिड़ना आसान नहीं है। क्योंकि सत्ता और पूंजी जिनके हाथों में है, उन्हीं के हाथों में मीडिया भी दे दिया गया है। एनडीटीवी प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है, जो अब अडानी समूह के स्वामित्व में है। लेकिन इससे पहले प्रणय रॉय और राधिका रॉय की देखरेख में यह स्वतंत्र पत्रकारिता की मिसाल हुआ करता था। रॉय दंपती पर मार्च 2016 में आयकर विभाग ने पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी किए थे, जो 2009-10 में लिए गए एक कर्ज से संबंधित थे। तब आयकर विभाग ने रॉय दंपती की कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग को दिए कुछ ब्याज मुक्त ऋण को लेकर जांच की थी। विभाग का आरोप था कि इन लेन-देन में आय को छिपाया गया था और इससे संबंधित कर चुकाया जाना चाहिए था। पहले दौर में इन लेन-देन की जांच हो चुकी थी और मूल्यांकन पूरा हो गया था। रॉय दंपती ने 2017 में इसे चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी कि यह कानून के खिलाफ है, क्योंकि एक ही तथ्य और सामग्री पर मूल्यांकन को दूसरी बार दोबारा खोलने की अनुमति नहीं है।

अब दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस तर्क को सही मानते हुए प्रणय रॉय और राधिका रॉय के खिलाफ 2016 में जारी किए गए आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस को रद्द कर दिया है। साथ ही आयकर विभाग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट ने कहा कि यह राशि प्रतीकात्मक है, क्योंकि वास्तविक मुआवजा इससे ज्यादा हो सकता था, लेकिन विभाग की गलती के लिए यह जरूरी था। लेकिन यहां विभागीय गलती से ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह की कार्रवाइयों से प्रणय रॉय और राधिका रॉय को मजबूर किया गया कि वे अपनी कंपनी को बेचें। अब एनडीटीवी बिक चुका है, और साथ ही उसके द्वारा खड़े गए पत्रकारिता के मूल्य भी दांव पर लग गए हैं। क्या इसका कोई जुर्माना तय हो सकता है। यह आज के पत्रकारों और संपादकों को सोचना होगा।

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