विदेश नीति को बदलते प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इतिहास में अपना नाम किन अक्षरों में दर्ज कराना चाहते हैं, ये तो पता नहीं, लेकिन भारत की विदेश नीति का जो गौरवशाली स्वर्णिम इतिहास रहा है

By :  Deshbandhu
Update: 2026-02-27 03:52 GMT

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इतिहास में अपना नाम किन अक्षरों में दर्ज कराना चाहते हैं, ये तो पता नहीं, लेकिन भारत की विदेश नीति का जो गौरवशाली स्वर्णिम इतिहास रहा है, उसे वो पूरी तरह मटियामेट करना चाहते हैं, यह साफ नजर आ रहा है। वैसे भी जब इतिहास की पूरी समझ न हो, या जानबूझकर इतिहास को नजरंदाज किया जाता है तो वर्तमान और भविष्य दोनों किस तरह खतरे में पड़ जाते हैं, इसका बड़ा उदाहरण नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा से मिल ही रहा है। महज दो दिनों के लिए मोदी इजरायल गए, लेकिन वहां जो कुछ उन्होंने कहा, उससे भारत की बरसों की मेहनत पर पानी फिर गया है।

बुधवार को इजरायली संसद नेसेट में जिस तरह का भाषण प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है, उसमें वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। क्योंकि इजरायल ने फिलीस्तीन में हमास को खत्म करने के नाम पर जो नरसंहार किया, उस पर दुनिया भर में चिंता जाहिर की जा रही है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने इजरायली संसद में जाकर हमास की न केवल आलोचना की, बल्कि तीन साल पहले 7 अक्टूबर को इजरायल पर हुए हमले की तुलना भारत में मुंबई के आतंकी हमले से कर दी। माना कि दोनों में निर्दोष लोगों की ही जान गई, लेकिन सोचने वाली बात ये है कि नरेन्द्र मोदी को यूपीए सरकार में हुआ मुंबई हमला अगर याद आया तो खुद की सरकार में हुए पुलवामा और पहलगाम जैसे बड़े आतंकी हमलों को वो कैसे भूल गए। होता तो यही है कि इंसान को हाल की बात पहले याद आती है और पुरानी बात बाद में। लेकिन मोदीजी के साथ उल्टा ही हो रहा है। उन्हें अपने कार्यकाल का कुछ याद नहीं रहता, केवल कांग्रेस की सरकारों की बातें याद पड़ती हैं।

अपने संबोधन में मोदी ने ग़ज़ा शांति पहल को क्षेत्र में 'न्यायपूर्ण और स्थायी शांति' की दिशा में एक रास्ता बताया। यानी सीधे-सीधे अमेरिका की तारीफ उन्होंने की। इसके साथ ही इजरायल के साथ एकजुटता का संदेश देते हुए कहा कि 'कहीं भी आतंकवाद शांति को हर जगह खतरे में डालता है'। गौर कीजिए कि मोदी ने इजरायल की कुर्बानियों का ज़िक्र किया लेकिन ग़ज़ा में मारे गए 70 हज़ार लोगों की हत्या और हमदर्दी के लिए एक शब्द नहीं कहा, वो कह भी नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें तो ट्रंप और नेतन्याहू से दोस्ती निभानी है। मोदी ने ग़ज़ा नरसंहार को पूरी तरह नज़रन्दाज़ किया, यहां तक तो ठीक है, लेकिन दुख इस बात का है कि अपने साथ-साथ उन्होंने पूरे देश की जनता को इजरायल के साथ खड़ा दिखाया। मोदी ने कहा, 'मैं भारत की जनता की ओर से हर खोई हुई जान के लिए गहरी संवेदना लेकर आया हूं और हर उस परिवार के लिए जिनका संसार 7 अक्टूबर 2023 को हमास के बर्बर आतंकवादी हमले में टूट गया। हम आपका दर्द महसूस करते हैं। हम आपका दुख साझा करते हैं। भारत इजरायल के साथ मजबूती से, पूरे विश्वास के साथ, इस पल में और उसके आगे भी खड़ा है। कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को जायज नहीं ठहरा सकता। कुछ भी आतंकवाद को जायज नहीं ठहरा सकता।' कितने सुविधाजनक तरीके से मोदी ने ग़ज़ा में नेतन्याहू के इजरायली आतंकवाद का ज़िक्र तक नहीं किया। जबकि खुद इजरायल की जनता अपनी सरकार के ऐसे बर्बर रवैये के खिलाफ है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मोदी के भाषण पर उन्हें इतिहास की याद दिलाते हुए नेहरू के इजरायल के निर्माण पर आइंस्टीन को लिखे पत्र में व्यक्त विचारों का हवाला दिया। रमेश ने एक्स पर पोस्ट किया- अप्रैल 1955 में आइंस्टीन के निधन से कुछ समय पहले, आइंस्टीन और नेहरू ने परमाणु विस्फोटों और हथियारों के मुद्दे पर पत्रों का आदान-प्रदान किया था।' नेहरू ने 11 जुलाई 1947 को आइंस्टीन को जवाब में लिखा: 'मैं मानता हूं कि जबकि मेरी यहूदियों के लिए बहुत अधिक हमदर्दी है, मुझे अरबों की दुर्दशा के लिए भी उतनी ही हमदर्दी है। किसी भी घटना में, पूरा मुद्दा दोनों पक्षों की ओर से उच्च भावना और गहरे जुनून का हो गया है।' नेहरू ने यहूदियों के नज़रिए पर सवाल उठाते हुए कहा: 'मैंने फिलिस्तीन की इस समस्या पर अच्छा ध्यान दिया है और दोनों पक्षों द्वारा जारी की गई किताबों और पैम्फलेट्स को पढ़ा है; फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि मैं इसके बारे में सब जानता हूं, या मैं क्या किया जाना चाहिए पर अंतिम राय देने के लिए सक्षम हूं। मुझे पता है कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में एक अद्भुत काम किया है और वहां के लोगों के स्तर को ऊं चा उठाया है, लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। इन सभी उल्लेखनीय उपलब्धियों के बाद, वे अरबों की सद्भावना हासिल करने में क्यों विफल रहे?'

नेहरू ने लिखा-'वे अरबों को अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ मांगों को मानने के लिए क्यों मजबूर करना चाहते हैं? नज़रिए का तरीका ऐसा रहा है जो समझौते की ओर नहीं ले जाता, बल्कि संघर्ष की निरंतरता की ओर ले जाता है। मुझे कोई संदेह नहीं कि गलती एक पक्ष तक सीमित नहीं है बल्कि सभी ने गलती की है। मुख्य समस्या फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासन की निरंतरता रही है।

तो यहां जयराम रमेश ने इजरायल और फिलीस्तीन दोनों पर नेहरू जी के विचार बता दिए। गौरतलब है कि जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों पर भीषण अत्याचार किया था, जिस पर सभी की सहानुभूति यहूदियों के साथ थी। लेकिन इजरायल में बस कर यहूदियों ने जिस तरह फिलीस्तीन के लोगों को उनके ही घर से बेदखल करने की लगातार कोशिश की और इसमें अमेरिका ने जैसे इजरायल को बढ़ावा दिया, भारत कभी भी उसके पक्ष में नहीं रहा। इसलिए इजरायल और फिलीस्तीन दोनों राष्ट्रों को भारत ने मान्यता दी, मगर इजरायल से एक दूरी बनाकर रखी, वहीं फिलीस्तीन के साथ नैतिकता के नाते भारत हमेशा खड़ा रहा। आज नरेन्द्र मोदी इस समीकरण को पूरी तरह बदल चुके हैं।

राहुल गांधी ने इसका कारण बताया है। मोदी की यात्रा को एपस्टीन फाइल्स से जोड़ते हुए राहुल ने कहा कि मोदी की यात्रा किसके इशारे पर हो रही है और यह भारत के हितों के खिलाफ है। हालांकि भाजपा ने कहा है कि प्रधानमंत्री नेसेट को संबोधित कर रहे हैं और 'सुदर्शन चक्र' जैसी तकनीकों से भारत को मजबूत कर रहे हैं। लेकिन भारत इसमें मजबूत हो रहा है या अमेरिका के हाथों मजबूर हो रहा है, ये जल्द ही पता चल जाएगा।

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