अमेरिका से व्यापार समझौते में सब गोलमाल!

अमेरिका से व्यापार समझौते पर मोदी सरकार बड़ी कामयाबी की डींगे हांक रही है, लेकिन धरातल पर नजर आ रहा है कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रही है।

Update: 2026-02-08 20:40 GMT

अमेरिका से व्यापार समझौते पर मोदी सरकार बड़ी कामयाबी की डींगे हांक रही है, लेकिन धरातल पर नजर आ रहा है कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। शनिवार 7 फरवरी को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के विवरण को लेकर जो प्रेस वार्ता की, उसमें न केवल देश के हितों से विरोधाभास नजर आया, बल्कि यह भी साफ दिखा कि सरकार के भीतर ही अब तक सारी बातें स्पष्ट नहीं हैं और दो मंत्रियों के बीच गेंद को एक-दूसरे के पाले में डालने का खेल चल रहा है।

तीन दिन पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर से जब पूछा गया कि व्यापार समझौते पर ताज़ा जानकारी क्या है? तो उन्होंने कहा था कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से पूछिए। वो ही इसको देख रहे हैं। वहीं पीयूष गोयल से जब शनिवार को रूस से तेल खरीद पर स्थिति साफ करने को कहा गया तो श्री गोयल ने कहा कि विदेश मंत्रालय से पूछिए। पत्रकारों को इस तरह एक-दूसरे के पास टरकाने का क्या मतलब है। क्या सरकार के मंत्रियों में आपस में बात नहीं होती या सबको अपने हिस्से का श्रेय चाहिए या कि सरकार को खुद ही नहीं पता है कि आखिर में डील में क्या-क्या है और क्या-क्या नहीं है। जैसे पीयूष गोयल ने इससे पहले कहा था कि 3-4 दिनों में भारत-यूएस ट्रेड डील हो जाएगी। लेकिन अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने शुक्रवार रात को ही इसकी घोषणा कर दी। बताया जा रहा है कि भारत में तब तक किसी मंत्रालय के पास ट्रेड डील के फ्रेमवर्क की जानकारी नहीं थी। इसके बाद पीयूष गोयल और पीएम मोदी और अन्य मंत्रियों ने इस पर ट्वीट करना शुरू किया। बहरहाल, पीयूष गोयल ने बताया कि भारत में किन क्षेत्रों को अमेरिका में निर्यात पर शून्य शुल्क का लाभ मिलेगा, उनमें रत्न और आभूषण, हीरे, दवाइयां, जेनेरिक और फार्मा उत्पाद, स्मार्टफोन शामिल हैं। इसके अलावा बताया गया कि कई कृषि उत्पादों पर पहले 50 प्रतिशत तक लगने वाला शुल्क अब शून्य हो जाएगा। इनमें मसाले, चाय, कॉफी, खोपरा, नारियल, नारियल तेल, वनस्पति तेल, सुपारी, ब्राजील नट्स, काजू, चेस्टनट, एवाकाडो, केला, अमरूद, आम, कीवी, पपीता, मशरूम, सब्जियों की पौध जड़ें, जौ, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हैं।

वाणिज्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस समझौते में किसी भी ऐसे उत्पाद को शामिल नहीं किया गया है जिससे भारतीय किसानों को नुकसान हो। उन्होंने कहा कि सभी संवेदनशील वस्तुओं को समझौते से बाहर रखा गया है। भारत में किसी भी प्रकार के जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं दी गई है। वाणिज्य मंत्री ने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ यह व्यापार समझौता किसानों, एमएसएमई, हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्रों के हितों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

इस तरह का स्पष्टीकरण देने का मतलब ही है कि कहीं कुछ छिपाया जा रहा है। वैसे भी भारतीय किसानों ने चेतावनी दे ही दी है कि उनके खिलाफ सरकार गई तो फिर आंदोलन पर उतर जाएंगे। शायद इसलिए सरकार अभी से उन्हें समझाने में लगी है। वैसे पीयूष गोयल के अनुसार, इस समझौते से श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र और परिधान, चमड़ा और फुटवियर, खिलौने तथा रत्न एवं आभूषण के निर्यात में तेजी आएगी। इससे बड़ी संख्या में महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिलेगा और देश में उत्पादन क्षमता मजबूत होगी। मतलब बेरोजगारी दूर करने का नया झुनझुना थमाया गया है।

पीयूष गोयल ने ये तो बताया कि क्या निर्यात होगा, लेकिन आयात क्या होगा, और उसके लिए धन का इंतजाम कैसे होगा, ये नहीं बताया। समझौते के मुताबिक भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से पांच सौ बिलियन डॉलर के उत्पाद खरीदने का वादा किया है, यानि भारत को अपना आयात 3 गुना बढ़ाना पड़ेगा। हमारा आयात शुल्क 40-42 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग सौ बिलियन डॉलर प्रति वर्ष हो जाएगा। कमज़ोर रुपये और नाज़ुक अर्थव्यवस्था के साथ, यह पैसा कहां से आएगा? यह समझौता बराबरी का कम और ब्लैकमेलिंग का ज्यादा लगता है। इस बारे में कांग्रेस ने सही कहा कि दोस्ती बराबरी की होती है। ऐसे में जब दोस्त आपको रोज 2 थप्पड़ मारे और आपके कुछ कहने पर एक थप्पड़ कम कर दे। तो आप इसे रियायत समझकर खुश नहीं हो सकते। क्या ये दोस्ती है? 3प्रतिशत के टैरिफ को बढ़ाकर 50प्रतिशत कर दिया और अब घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया, तो मोदीजी खुश हो रहे हैं। कांग्रेस ने पूछा कि जिस 3प्रतिशत की वजह से अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, क्या उसे आप भूल जाएंगे? मोदी सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।

इस बीच एक झटका अमेरिका ने और दिया है। ट्रंप ने 6 फरवरी को नया कार्यकारी आदेश जारी किया है जिसके तहत अब भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल के आयात पर अमेरिकी निगरानी भी लागू होगी। यह इस समझौते का सबसे चिन्ताजनक पहलू है कि भारत ने अमेरिका की निगरानी क्यों स्वीकार की। उसके बाद मोदी सरकार ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने का फैसला टाल दिया है। ट्रंप ने चेतावनी भी दी है कि यदि भारत दोबारा रूसी तेल आयात शुरू करता है, तो वाणिज्य सचिव द्वारा अतिरिक्त शुल्क फिर से लगाने की सिफारिश की जा सकती है। भारत ने क्या कार्यकारी आदेश 14329 की धारा 7 में परिभाषित रूसी संघ के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात फिर से शुरू किया है, इस बात की निगरानी अमेरिकी वाणिज्य सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव और वाणिज्य सचिव द्वारा उचित समझे जाने वाले किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी आपसी तालमेल के जरिए करेंगे। यदि वाणिज्य सचिव को पता चलता है कि भारत ने रूसी संघ के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात फिर से शुरू कर दिया है, तो विदेश सचिव परामर्श से यह सिफारिश करेंगे कि क्या और किस हद तक भारत के संबंध में अतिरिक्त कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या भारत से आयातित वस्तुओं पर 25 प्रतिशत की अतिरिक्त मूल्य-आधारित शुल्क दर फिर से लागू की जानी चाहिए।

ट्रंप के इस आदेश से ऐसा लगता है मानो हम गुलामी के दूसरे दौर में पहुंच गए हैं। पहले अंग्रेज भी इसी तरह अपने फायदे के लिए हमारा दोहन करते थे और अब मोदी फिर गुलामी का एहसास देश को करा रहे हैं। भारत और अमेरिका की डील को अच्छा बताते हुए मोदी मलेशिया चले गए और वहां से कार से राष्ट्रपति अनवर इब्राहिम के साथ तस्वीर भेजकर बताने की कोशिश की कि उनकी दोस्ती कितनी पक्की है। कार से सरकार की ताकत दिखाने का ये खेल मोदी पुतिन के साथ भी कर चुके हैं। लेकिन हकीकत क्या है देश देख रहा है।

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