ममता बनर्जी का आसमान में सुराख करने का इरादा
देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी मुख्यमंत्री ने वकील की भूमिका भी निभाई है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को एक नया इतिहास रच दिया। ममता बनर्जी बाकायदा वकील के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय में उपस्थित हुईं और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ अपनी दलीलें पेश कीं। देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी मुख्यमंत्री ने वकील की भूमिका भी निभाई है। सबसे खास बात यह कि ममता बनर्जी अपना या अपनी पार्टी का पक्ष रखने शीर्ष अदालत में प्रस्तुत नहीं हुईं बल्कि उन लाखों कमजोर लोगों का पक्ष रखने के लिए सामने आईं, जो एसआईआर से पीड़ित हैं, जिनके मताधिकार पर सरकारी कार्रवाई का चाबुक चला है। संक्षेप में कहें तो ममता बनर्जी लोकतंत्र को बचाने के लिए मुख्यमंत्री होते हुए भी वकील की भूमिका में आईं। अदालत में अपनी दलीलों को पेश करने के बाद आखिरी में माननीय न्यायाधीशों से उन्होंने यही कहा कि लोकतंत्र बचा लीजिए।
गौरतलब है कि एसआईआर को लेकर देश भर में गरीब और कमजोर लोग चिंतित हैं कि उनका नाम कहीं मतदाता सूची से कट न जाए। पांच साल में एक दिन उन्हें मिलता है जब उन्हें उसी कतार में खड़े होने का मौका मिलता है, जिस कतार में समाज का धनाढ्य और प्रभावशाली तबका भी लगता है। वोट देने का अधिकार अमीर और गरीब हरेक के पास एक जैसा है। लेकिन एसआईआर के कारण इस अधिकार पर बड़ी चोट पड़ चुकी है। भाजपा और चुनाव आयोग जिसे धार्मिक शब्दावली की तरह मतदाता सूची का शुद्धिकरण कहते हैं, वह असल में अन्याय और असमानता को बढ़ावा देने वाला है। पिछले साल जून में सबसे पहले बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरु हुई थी, जिसका व्यापक और तार्किक विरोध विपक्ष ने किया था। बिहार में इस पर महागठबंधन ने वोटर बचाओ यात्रा भी निकाली थी, जिसे बड़े पैमाने पर समर्थन मिला था। इस मामले में अदालत में याचिकाएं दाखिल हुईं। कायदे से ऐसे में एसआईआर को रोक कर फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए था। लेकिन बिहार में यह पूरी भी हुई और करोड़ों नाम वोटर लिस्ट से कटे, उसके बाद चुनाव हुए और नतीजा सबके सामने है। जिन घुसपैठियों के नाम पर एसआईआर को तत्काल कराने की जरूरत बताई गई, उस पर अब सत्ता पक्ष या चुनाव आयोग कुछ नहीं कहता कि कितने विदेशी नागरिक बिहार में वोटर लिस्ट में थे। अब घुसपैठियों का यही लचर तर्क प.बंगाल में दिया जा रहा है। यहां तो अर्मत्य सेन जैसे प्रतिष्ठित नागरिक तक को चुनाव आयोग ने नोटिस भेज दिया, तो आम गरीब आदमी की बिसात ही क्या है। इसलिए ममता बनर्जी को बुधवार को अदालत में कहना पड़ा कि न्याय बंद दरवाजे के पीछे रो रहा है।
बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष ममता बनर्जी अपने वकीलों के साथ कोर्ट रूम नंबर एक में मौजूद रहीं। मंगलवार को मुख्यमंत्री बनर्जी के नाम पर एक गेट पास जारी किया गया था। मोस्तारी बानू और टीएमसी सांसदों डेरेक ओ 'ब्रायन और डोला सेन की दायर याचिकाओं पर सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने सुनवाई की। जिनमें ममता बनर्जी ने अपनी दलील पेश की। सुश्री बनर्जी ने अपनी बात रखने की इजाजत मांगी। उन्होंने कहा, 'सर, मुझे सिर्फ 5 मिनट दें।' सीजेआई ने कहा कि 15 मिनट लीजिए। फिर ममता बनर्जी ने भावुक होकर कहा, 'न्याय बंद कमरों के पीछे रो रहा है। हम कहीं से न्याय नहीं पा रहे। मैंने चुनाव आयोग को 6 बार पत्र लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।' ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बंगाल को निशाना बना रहा है। उन्होंने कहा, 'यह चुनाव आयोग नहीं, व्हाट्सएप कमीशन है। एसआईआर को सिर्फ नाम हटाने का हथियार बनाया जा रहा है, न कि सही जांच का। उन्होंने 24 वर्षों के बाद लागू की गई इस तात्कालिकता पर भी चिंता जताई, जिसे फसल कटाई के मौसम और प्रवासन के चरम समय के दौरान तीन महीनों में जल्दबाजी में पूरा किया गया था, और इसके मानवीय नुकसान को भी दर्ज किया, जिनमें 100 से अधिक मौतें, बीएलओ सदस्यों की मौतें और बड़े पैमाने पर अस्पताल में भर्ती होना शामिल है। ममता ने बताया कि एसआईआर के पहले चरण में ही लगभग 58 लाख नामों को मृत घोषित कर दिया गया।
कई महिलाओं के नाम हटाए गए, जिससे यह प्रक्रिया महिला विरोधी लग रही है। उन्होंने कहा कि शादी के बाद महिलाओं का सरनेम बदलने या ससुराल जाने पर इसे मिसमैच बताकर नाम काट दिए जा रहे हैं। काम की तलाश में दूसरे जगह जाने वालों को भी इसी तरह परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गरीब परिवारों के नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटाए जा रहे हैं, जिन्हें बाद में 'तार्किक विसंगतिÓ या 'गलत मानचित्रणÓ जैसे अस्पष्ट बहाने देकर उचित ठहराया जाता है, जो न्यायालय के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है। उन्होंने आधार को वैध प्रमाण के रूप में स्वीकार करने के न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए, प्रश्न उठाया कि केवल बंगाल को ही निवास प्रमाण पत्र या जाति प्रमाण पत्र जैसे अन्यत्र स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों से वंचित क्यों किया जा रहा है। उन्होंने पूछा, 'अगर यह सचमुच सुधार था, तो असम में क्यों नहीं? केवल बंगाल में ही क्यों?'
मुख्यमंत्री ने माइक्रो-ऑब्जर्वर की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ फैसला लेते थे, लेकिन अब ज्यादातर भाजपा शासित राज्यों से आए माइक्रो-ऑब्जर्वर नाम हटाने की सिफारिश कर रहे हैं। बंगाल में ऐसे लगभग 3800 ऑब्जर्वर तैनात किए गए हैं। इस पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार एसआईआर में सहयोग नहीं कर रही। राज्य से क्लास 3 के अधिकारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भेजे जा रहे हैं, जो दस्तावेज जांचने के लिए सक्षम नहीं हैं। इसलिए माइक्रो-ऑब्जर्वर लगाने पड़े। जिसके बाद कोर्ट ने बंगाल सरकार को भी कहा कि क्लास 2 के अधिकारियों की सूची दे, जो डेपुटेशन पर एसआईआर में मदद कर सकें। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। आयोग को 10 फरवरी तक जवाब दाखिल करने को कहा गया है।
अब अगली सुनवाई के बाद क्या एसआईआर पर कोई निर्णायक फैसला आता है या नहीं, यह देखना होगा। लेकिन बुधवार को ममता बनर्जी ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र बचाने के लिए वे आखिरी दरवाजे यानी सुप्रीम कोर्ट तक चली गईं और चुनाव में बेईमानी से मोर्चा लेने के लिए सबसे आगे खड़ी हुईं। उनका यह जुझारूपन बंगाल समेत पूरे देश के सामने मिसाल बन चुका है। आसमान में सुराख करने के लिए ममता बनर्जी ने पत्थर तो उछाल ही दिया है।