वास्तविक चिंताओं से कटा बजट

मोदी सरकार ने एक बार एक ऐसा बजट पेश किया है, जिसमें आम जनता के लिए कुछ नहीं है, जबकि धनपतियों के लिए पूरा मौका है कि वे अपनी तिजोरी का धन दोगुना-चौगुना कर लें

By :  Deshbandhu
Update: 2026-02-01 21:40 GMT

मोदी सरकार ने एक बार एक ऐसा बजट पेश किया है, जिसमें आम जनता के लिए कुछ नहीं है, जबकि धनपतियों के लिए पूरा मौका है कि वे अपनी तिजोरी का धन दोगुना-चौगुना कर लें। अमेरिका की तरफ से पड़ी टैरिफ की मार और बदलते भू राजनैतिक समीकरणों के बीच मोदी सरकार के पास बजट के रूप में एक अच्छा मौका था, जब वह आम आदमी की चिंता को सीधे संबोधित करती और उसकी रोजमर्रा की समस्याओं का हल पेश करती। लेकिन जैसे नरेन्द्र मोदी आज की बात न कर या तो हजार साल पहले की बात करते हैं या आने वाले सौ साल में देश कहां हो सकता है, इसके सपने दिखाते हैं। तो बजट में भी ऐसे ही दूर के सपने दिखाए गए हैं। 10,000 करोड़ रुपए के बायोफार्मा शक्ति प्रोग्राम से लेकर इंडिया सेमी कंडक्टर मिशन 2.0 के तहत सेमी कंडक्टर की महत्वाकांक्षाओं का विस्तार, 40,000 करोड़ की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स स्कीम, और कई सेक्टरों में मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव जैसी बातें निर्मला सीतारमण के भाषण में छाई रहीं। लेकिन ग्रामीण भारत के मजदूर-किसान, बेरोजगार युवा, छोटे और मध्यम कारोबारी, गृहणियां जिन रोजमर्रा के संकटों से दो-चार होती हैं, उस पर बजट लगभग खामोश रहा। सरकार मनरेगा की जगह वीबी जीरामजी कानून लाकर उसके प्रचार के लिए विज्ञापन पर भारी खर्च कर रही है। लेकिन बजट भाषण में इस बारे में चुप्पी बता रही है कि ग्रामीण भारत से मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

खेती-बाड़ी पर विविधकरण और नारियल, कोको, चंदन और मेवे जैसी 'उच्च मूल्य वाली फसलों' पर बजट भाषण में बात हुई। इससे संपन्न व्यावसायिक किसानों को तो फायदा हो सकता है, लेकिन उन अनाज किसानों के लिए सीधे तौर पर किसी मदद की बात नहीं की गई जो भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य, खेती में बढ़ती लागत या फसलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे मुद्दों का भाषण में कोई ज़िक्र नहीं था। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सही कहा है कि यह बजट देश की समस्याओं से आंख मूंदने वाला है। राहुल गांधी ने लिखा कि देश में युवा बेरोजगार हैं, उत्पादन गिर रहा है, निवेशक पूंजी बाहर निकाल रहे हैं, घरेलू बचत तेजी से घट रही है और किसान संकट में हैं। वैश्विक स्तर पर आने वाले झटकों का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन बजट इन सभी मुद्दों को नजरअंदाज करता है और आंखें मूंदने वाला है। उन्होंने कहा कि यह ऐसा बजट है जो सुधार से इनकार करता है और भारत के असली संकटों के प्रति अंधा बना हुआ है।

हकीकत यही है कि इस बजट में देश में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ चुकी आर्थिक असमानता पर कोई चिंता नहीं व्यक्त की गई है और न ही एससी, एसटी, ओबीसी, कमजोर आर्थिक वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों को कोई सहायता दी गई है। मोदी सरकार हर साल नए तरह के सपने बजट में दिखाती है और पिछले सपनों को भूल जाती है। जैसे अब मेक इन इंडिया पर कोई बात नहीं होती। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में कितना घोटाला हुआ, यह हाल ही में आई रिपोर्ट्स से पता चलता है। महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकार के बजट में न महिलाओं के लिए कोई बड़ी पहल है, न इस बात की चिंता कि रोजगार में महिलाओं की भागीदारी कैसे बढ़ाई जाए। बजट में रुपए की गिरती कीमत, महंगाई, या टैरिफ के कारण हो रहे व्यापार घाटे की भी कोई चिंता नहीं है।

मोदी सरकार का मकसद हर तरह से चुनावी राज्यों को साधना होता है, पिछले साल बिहार पर सारा फोकस था, इस बार तमिलनाडु, केरल आदि पर फोकस है। प्रसंगवश बता दें कि निर्मला सीतारमण ने, तमिलनाडु की कांजीवरम साड़ी पहनकर ही बजट पढ़ा, पिछली बार उन्होंने मधुबनी पेटिंग वाली साड़ी पहनी थी। इस बार के बजट में निर्मला सीतारमण ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव रखा है। सरकारी भाषा में यह आत्मनिर्भर भारत और चीन पर निर्भरता कम करने का बड़ा क़दम बताया जा रहा है। बता दें कि रेयर अर्थ एलिमेंट्स 17 खास तरह के खनिज हैं जो आज की हाई-टेक दुनिया में बेहद ज़रूरी हैं। इनसे बने रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स यानी आरईपीएम इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होते हैं। इन मैग्नेट्स का ज़्यादातर उत्पादन और प्रोसेसिंग चीन के हाथ में है। जबकि भारत इन्हें ज़्यादातर आयात करता है। ऐसे में रेयर अर्थ कॉरिडोर सुनने में तो अच्छा प्रस्ताव दिखता है, लेकिन इसके साथ जो पर्यावरणीय चिंताएं जुड़ी हैं, क्या सरकार उन पर ध्यान देगी। बता दें कि भारत में रेयर अर्थ का मुख्य स्रोत बीच सैंड मिनरल्स यानी बीएसएम है। इसमें मोनाजाइट नाम का खनिज होता है, जिसमें रेयर अर्थ के साथ यूरेनियम और थोरियम भी होते हैं। देश में ये खनिज केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटों पर बहुत ज्यादा मात्रा में मिलते हैं। शायद इसीलिए इन्हीं राज्यों को चुना गया है। लेकिन बीच सैंड मिनरल्स खनन से समुद्र तटों का कटाव होता है, समुद्री जीवन बर्बाद होता है, रेडियोएक्टिव थोरियम और यूरेनियम निकलते हैं जो कैंसर जैसी बीमारियां फैला सकते हैं। केरल और तमिलनाडु में पहले से ही इलाकों में लोगों ने इसका विरोध किया है। ओडिशा में भी पर्यावरणविद् चेतावनी देते रहे हैं। सरकार कहती है कि सख्त नियम होंगे, लेकिन देश में खनन माफिया का जो आतंक है, क्या वो पहले से ज्यादा बढ़ नहीं जाएगा। रेयर अर्थ कॉरिडोर में बड़े-बड़े प्लांट लगेंगे, जिससे मछुआरों, किसानों और स्थानीय समुदायों की जमीन और आजीविका छिन सकती है। पिछले कई सालों में भारत में खनन प्रोजेक्ट्स से विस्थापन और पुनर्वास की समस्या रही है। क्या सरकार स्थानीय लोगों को रोजगार और फायदा सुनिश्चित करेगी, या सिर्फ बड़ी कंपनियां मुनाफा कमाएंगी, ये भी गंभीर सवाल है।

केंद्रीय बजट 2026-27 में जिस तरह ग्रामीण रोजगार की अनदेखी की गई है, उससे भी चिंता बढ़ती है। सरकार मनरेगा की जगह वीबी जी राम जी कानून तो ले आई है, जिसमें केंद्र सरकार ज़्यादातर राज्यों में इस योजना का लगभग 60 प्रतिशत खर्च उठाएगी, और बाकी खर्च राज्य सरकारें देंगी। लेकिन बजट में इस मद में 65.9 प्रतिशत की कटौती गई है, जो इस खर्च बंटवारे से कहीं ज़्यादा है। मनरेगा के लिए 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान रुपए 88,000 करोड़ था। इसके उलट 2026-27 के बजट अनुमान में यह आंकड़ा घटाकर 30,000 करोड़ कर दिया गया है, जो 58,000 करोड़ या लगभग 66 प्रतिशत की कटौती है। इससे गंभीर सवाल उठता है कि क्या वी बी जीरामजी कानून के बताए गए लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार ने पर्याप्त संसाधन रखे हैं या फिर कांग्रेस की चिंताएं वास्तविक है कि गांव के गरीबों को मिलने वाली मामूली मजदूरी पर भी उद्योगपतियों का डाका पड़ चुका है? गरीब-गरीब की माला जपते हुए नरेन्द्र मोदी हर बार उद्योगपतियों का ही हित साधते हैं, तभी 5 किलो मुफ्त अनाज लेने की नौबत देश में बनी हुई है। 

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