CJP आंदोलन पर बातचीत की कोशिश तेज, नड्डा के घर की बजाय दूसरी जगह बातचीत की शर्त

सौरव दास ने कहा कि CJP किसी मंत्री के घर या सरकारी कार्यालय में बातचीत के लिए नहीं जाएगी। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में समाधान चाहती है तो वह जंतर-मंतर या उसके आसपास किसी निष्पक्ष स्थान पर प्रतिनिधियों से चर्चा करे।;

Update: 2026-07-23 09:51 GMT

नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर जारी छात्र आंदोलन के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने लगातार दूसरे दिन दावा किया कि केंद्र सरकार की ओर से बातचीत का प्रस्ताव भेजा गया है। संगठन के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि दिल्ली पुलिस के माध्यम से उन्हें सूचना दी गई कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने अपने आवास पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया है। हालांकि, संगठन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि बातचीत किसी तटस्थ स्थान पर होनी चाहिए।

‘सरकार चाहे तो जंतर-मंतर आए’

सौरव दास ने कहा कि CJP किसी मंत्री के घर या सरकारी कार्यालय में बातचीत के लिए नहीं जाएगी। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में समाधान चाहती है तो वह जंतर-मंतर या उसके आसपास किसी निष्पक्ष स्थान पर प्रतिनिधियों से चर्चा करे। उन्होंने कहा कि आंदोलन में देशभर से आए हजारों छात्र और युवा शामिल हैं, इसलिए वार्ता की प्रक्रिया भी पारदर्शी और सभी पक्षों के लिए समान होनी चाहिए। इससे पहले बुधवार को भी संगठन ने इसी आधार पर कथित वार्ता प्रस्ताव को ठुकराने की बात कही थी।

शिक्षा सुधार की मांग बना आंदोलन का केंद्र

कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ था। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी कर रहे हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित अभियान है। उनका दावा है कि विभिन्न राज्यों, समुदायों और पृष्ठभूमि के लोग इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।

सोनम वांगचुक ने बातचीत के संकेत दिए

लद्दाख के शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो लंबे समय से अनशन पर हैं, ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा कर आंदोलन के समाधान की दिशा में बातचीत का संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लिया जाता है, तो वह छात्रों से आंदोलन को फिलहाल स्थगित कर सरकार के साथ संवाद शुरू करने की अपील करेंगे। उनके इस बयान को आंदोलन और सरकार के बीच संभावित बातचीत की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

अन्ना हजारे ने जताया छात्रों के प्रति समर्थन

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी छात्र आंदोलन के समर्थन में मौन प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने छात्रों के मुद्दों पर चिंता जताई। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी असुविधा के कारण उन्हें कुछ समय बाद कार्यक्रम स्थल से लौटना पड़ा, लेकिन उनके जाने के बाद भी मौन प्रदर्शन जारी रहा। हजारे के समर्थन को आंदोलन के लिए नैतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

वांगचुक की पत्नी ने उठाए सवाल

सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने भी आंदोलन को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि छात्रों को अपराधियों की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि राजनीतिक दलों को केवल बयान देने के बजाय आंदोलन स्थल पर जाकर छात्रों की बात सुननी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संवाद और संवेदनशीलता के माध्यम से ही इस विवाद का समाधान निकाला जा सकता है।

दिल्ली में यातायात और मेट्रो सेवाओं पर असर

जंतर-मंतर के आसपास जारी प्रदर्शन का असर राजधानी की यातायात व्यवस्था पर भी देखा जा रहा है। सुरक्षा कारणों से लगातार दूसरे दिन दिल्ली मेट्रो के 17 स्टेशन बंद रहे। बाद में झंडेवाला मेट्रो स्टेशन को भी अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। मेट्रो सेवाओं में व्यवधान के कारण बड़ी संख्या में कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों और अन्य यात्रियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़े, जिससे यात्रा का समय और खर्च दोनों बढ़ गए।

प्रदर्शन के खिलाफ हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

उधर, छात्र आंदोलन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई प्रस्तावित है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि लंबे समय से चल रहे प्रदर्शन के कारण राजधानी के कई प्रमुख मार्ग प्रभावित हुए हैं और आम नागरिकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

समाधान की राह पर टिकी निगाहें

छात्र आंदोलन अब केवल पेपर लीक के मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही की मांग का प्रतीक बनता जा रहा है। एक ओर सरकार और आंदोलन के बीच संभावित वार्ता की चर्चा तेज है, वहीं दूसरी ओर अदालत में होने वाली सुनवाई और प्रशासनिक कदम आगे की दिशा तय कर सकते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान की ओर बढ़ते हैं या आंदोलन और कानूनी प्रक्रिया समानांतर रूप से जारी रहती है।

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