कौशल मिलेगा, रोजगार कहां मिलेगा?

विकसित भारत ञ्च2047 की परिकल्पना को साकार करने के लिए नीति आयोग ने कौशल विकास को पुर्नव्यवस्थित करने की पहल की है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-01 21:30 GMT
  • अरुण कुमार डनायक

भारत में केवल 8.26प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार में हैं, बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे सामान्य पाठ्यक्रमों के दो करोड़ विद्यार्थी शिक्षा और रोजगार के बीच गहरे बेमेल का सामना कर रहे हैं। विद्यार्थी प्राय: सामाजिक प्रतिष्ठा, स्थिर वेतन, सुरक्षित भविष्य जैसी वजहों से सरकारी नौकरी की पात्रता हेतु डिग्री को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी नौकरी को सम्मानजनक और स्थायी माना जाता है।

विकसित भारत ञ्च2047 की परिकल्पना को साकार करने के लिए नीति आयोग ने कौशल विकास को पुर्नव्यवस्थित करने की पहल की है। विगत बारह वर्षों में 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है। केंद्र सरकार ने कौशल विकास पर गत वर्ष 34,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। लेकिन राज्यों, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र के योगदान के बावजूद परिणाम असमान बने हुए हैं। अध्ययन ने स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, औपचारिक एवं अनौपचारिक रोजगार, शिक्षा-रोजगार-प्रशिक्षण से बाहर के युवा और महिलाओं को शामिल करते हुए लगभग 60 करोड़ नागरिकों को अपने दायरे में लिया है।

भारत में केवल 8.26प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार में हैं, बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे सामान्य पाठ्यक्रमों के दो करोड़ विद्यार्थी शिक्षा और रोजगार के बीच गहरे बेमेल का सामना कर रहे हैं। विद्यार्थी प्राय: सामाजिक प्रतिष्ठा, स्थिर वेतन, सुरक्षित भविष्य जैसी वजहों से सरकारी नौकरी की पात्रता हेतु डिग्री को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी नौकरी को सम्मानजनक और स्थायी माना जाता है, इसलिए व्यावसायिक तथा ऑनलाइन शिक्षा पर उनका भरोसा अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में सवाल है—नई कौशल व्यवस्था इस बेमेल को दूर करेगी या डिग्रियों के ऊपर कौशल प्रमाणपत्रों की एक और परत जोड़ देगी?

अध्ययन के अनुसार मौजूदा व्यवस्था की प्रमुख कमियों में विश्वसनीय करियर मार्गदर्शन का अभाव, स्कूलों में कौशल शिक्षा का सीमित प्रसार, उच्च शिक्षा का उद्योग और अप्रेंटिसशिप से कमजोर जुड़ाव तथा अनौपचारिक कामगारों के लिए प्रशिक्षण की लागत और समय जैसी बाधाएं शामिल हैं। काफी हद तक सैद्धांतिक शिक्षण- प्रशिक्षण का कार्यस्थल की जरूरतों से पर्याप्त मेल नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में व्यावसायिक शिक्षा और रोजगारपरक कौशल का प्रावधान है, पर क्रियान्वयन सीमित है। इसलिए स्कूल स्तर से कौशल शिक्षा, उद्योग की भागीदारी और अप्रेंटिसशिप को रोजगार व आय से जोड़ना जरूरी है।

नीति आयोग का सुझाव है कि कक्षा 6 से रोजगारपरक कौशल और कक्षा 9 से 'कौशल ट्रैकÓ शुरू हों, जिन्हें स्कूलों की क्षमता और संसाधनों के अनुसार राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क से औपचारिक शिक्षा से जोड़ा जाए। उच्च शिक्षा में सामान्य डिग्रियों के बजाय उद्योग आधारित विशेषज्ञता, अप्रेंटिसशिप आधारित डिग्री और 'सीखते हुए कमानेÓ जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही उद्योग-शिक्षण संस्थानों की भागीदारी, कम अवधि के मॉड्यूल तथा लचीली प्रवेश-निकास व्यवस्था विकसित की जाये।

नीति आयोग ने कौशल प्रशिक्षण को बदलती रोजगार मांग से जोड़ने पर जोर दिया है—हरित उद्योग, इलेक्ट्रिक वाहन और उभरते क्षेत्रों के लिए नए कौशल तथा घटते क्षेत्रों में पुन: कौशल विकास की आवश्यकता बताई है। शिक्षा और रोजगार के बीच पुल बनाने हेतु अप्रेंटिसशिप, एमएसएमई की भागीदारी और करियर मार्गदर्शन को पूरी शिक्षा रोजगार यात्रा का हिस्सा बनाने की सिफारिश की गई है।

डिजिटल 'स्किल पासपोर्ट' और राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क से शिक्षा, प्रशिक्षण और कार्य-अनुभव को जोड़ा जाए, जिससे पढ़ाई और रोजगार के बीच लचीला आवागमन संभव होगा और सीखना जीवनभर जारी रहे। साझा कौशल-अवसंरचना नेटवर्क को जिला स्तर पर लागू करने का भी सुझाव है।

लेकिन इन प्रस्तावों के सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं। शहरी युवाओं में लगभग 70प्रतिशत पसंदीदा करियर वाली नौकरी चाहते हैं, लेकिन कार्यबल में आधे से भी कम को वेतन वाली नौकरी मिलती है और 24 वर्षीय युवाओं में केवल हर तीसरे को ऐसी नौकरी हासिल होती है। लगभग 40प्रतिशत लोग स्वरोजगारी हैं, जिनमें अधिकांश छोटे जीविका आधारित कारोबार होने के कारण दूसरों को रोजगार नहीं दे पाते। युवाओं की वेतन अपेक्षाएं वास्तविक आय से अधिक हैं; सही जानकारी से अपेक्षाएं कुछ घटीं, पर आकांक्षाएं नहीं बदलीं। समस्या केवल आकांक्षाओं की नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की रोजगार पैदा करने की क्षमता की भी है। ऐसे में सवाल है—कौशल बढ़ाने से रोजगार मिलेगा या कुशल बेरोजगारों की संख्या बढ़ेगी?

ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण तभी सार्थक होगा जब यह स्थानीय आजीविका आधारित कृषि और ग्रामीण उद्योग से जुड़ा हो। गांवों में परम्परागत रोजगार घट रहे हैं, इसलिए मशीनीकरण के साथ नये अवसर—जैसे डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण या सौर ऊर्जा संयंत्र संचालन—पर जोर देना होगा। केवल शहरी नौकरियों पर ध्यान देने से ग्रामीण युवाओं में निराशा बढ़ेगी।

घटती कुल प्रजनन दर के साथ बच्चों की देखभाल का बोझ कम होने से महिलायें वैकल्पिक रोजगार तलाश रही हैं, लेकिन बड़ी संख्या अभी भी घरेलू काम जैसे कम वेतन और सीमित प्रगति वाले रोजगारों तक सीमित है। इसलिए उन्हें केवल कौशल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि शिक्षा और योग्यता के अनुरूप सुरक्षित, सम्मानजनक और आगे बढ़ने के समान अवसर वाले रोजगार चाहिए।

नीति आयोग की रिपोर्ट में नया क्या है? इसमें उठाए गए मुद्दे पहले भी विशेषज्ञों की चिंता का विषय रहे हैं। रोज़गार सूचना की पहल भारत सरकार ने 1970 के दशक में 'रोज़गार समाचार' से शुरू की थी। इसके एक दशक बाद, 1984 में जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन ने भी ऐसा ही प्रकाशन आरंभ किया। इसमें नौकरी के विज्ञापन और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मार्गदर्शक आलेख प्रकाशित होते थे। असली सवाल है—क्या समस्या केवल कौशल की कमी है? बड़े कौशल-अवसंरचना ढांचे के लिए निवेश कहां से आएगा? जब उच्च शिक्षा की डिग्री ही रोजगार से नहीं जुड़ पा रही, तो अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण कितना कारगर होगा? कक्षा 6 से कौशल शिक्षा शुरू करने का सुझाव सवाल उठाता है—पहले से बोझिल पाठ्यक्रम में नया भार कितना उचित है? 1960 के दशक में गांधीजी की 'नई तालीम' के अनुरूप प्रारम्भ की गई बुनियादी प्राथमिक शालाओं और तकनीकी विद्यालयों के प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया में कौशल शिक्षा को उद्योग से सीधे जोड़ा गया है, जिससे युवाओं को रोजगार और प्रशिक्षण का बेहतर तालमेल मिला। अमेरिका में भी व्यावसायिक शिक्षा को सामान्य स्कूली शिक्षा से अलग व्यावसायिक मार्गों, सामुदायिक कॉलेजों और उद्योग से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए आगे बढ़ाया जाता है। भारत को ऐसे मॉडलों से सीखते हुए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था बनानी होगी।

अप्रेंटिसशिप को रोजगार और प्रशिक्षण के बीच पुल माना जा रहा है, लेकिन इसके नाम पर युवाओं के दोहन की आशंका भी है। अप्रेंटिसशिप के नाम पर कई बार युवाओं से सस्ता श्रम कराया जाता है, जिससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता संदिग्ध हो जाती है—सवाल है, यह कौशल प्रशिक्षण है या सस्ते श्रम का उपयोग? कौशल प्रशिक्षण की सफलता प्रशिक्षित लोगों की संख्या से नहीं, रोजगार, आय और रोजगार में टिके रहने से मापी जानी चाहिए। सरकार बेरोजगारी के साथ अल्पनियोजन के आंकड़े भी सार्वजनिक करे। यदि 2047 तक रोजगार सृजन की गति कौशल विकास के अनुरूप नहीं रही, तो भारत में 'कुशल बेरोजगारोंÓ की एक बड़ी पीढ़ी तैयार होगी। यह परिकल्पना को कमजोर कर सकती है और सामाजिक असमानता बढ़ा सकती है। कौशल तभी सार्थक है जब वह स्थायी और सम्मानजनक रोजगार में बदले। आखिर कौशल मिलेगा, रोजगार कहां मिलेगा? यही इस पुनर्कल्पित कौशल व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है।

(लेखक एवं समाजसेवी)

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