तालिबान और रूस के बीच क्यों बढ़ रही नजदीकियां?
रूस और तालिबान ने सोवियत जमाने के रूस में बने हथियारों की मरम्मत के लिए एक समझौता किया है;
रूस और तालिबान ने सोवियत जमाने के रूस में बने हथियारों की मरम्मत के लिए एक समझौता किया है. दिखने में तो यह बहुत छोटा सा कदम लगता है, लेकिन असल में यह बहुत बड़े खेल का हिस्सा है. इसमें अमेरिका और पाकिस्तान भी शामिल हैं.
रूस और तालिबान ने सोवियत जमाने के रूस में बने हथियारों की मरम्मत के लिए एक समझौता किया है. दिखने में तो यह बहुत छोटा सा कदम लगता है, लेकिन असल में यह बहुत बड़े खेल का हिस्सा है. इसमें अमेरिका और पाकिस्तान भी शामिल हैं. साथ ही, इसका एक मकसद इस इलाके में पश्चिमी देशों के दबदबे को कम करना भी है.
तालिबान सरकार के कार्यवाहक रक्षा मंत्री मुल्ला मुहम्मद याकूब पिछले हफ्ते जैसे ही काबुल में हवाई जहाज से उतरे, उन्होंने सीधे पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दे डाली. याकूब ने कहा कि उन्होंने मॉस्को में जो सैन्य और तकनीकी सहयोग समझौता किया है, उसकी वजह से इस्लामाबाद की ‘जल्द ही इतनी हिम्मत नहीं होगी' कि वह अफगान जमीन पर हमला कर सके. उन्होंने यह भी साफ किया कि रूस के साथ हुए इस समझौते पर बहुत जल्द काम शुरू हो जाएगा.
इसके साथ ही, याकूब ने यह दिखाने की कोशिश की कि उनकी सरकार और रूस के बीच सैन्य सहयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो चिंताएं जताई जा रही हैं, वे उतनी बड़ी या गंभीर नहीं हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कोई रक्षा या सुरक्षा समझौता नहीं है. इसका पूरा ध्यान सिर्फ उन रूसी हथियारों और मशीनों की मरम्मत और देखरेख पर है जो पहले से ही अफगानिस्तान के पास मौजूद हैं, जैसे कि उनके हेलीकॉप्टर और दूसरे विमान.
यहां तक कि उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अमेरिका के साथ भी ऐसा समझौता किया जा सकता है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि अफगानिस्तान पर नाटो के हमले और फिर वहां से उसके हटने के बाद, भारी मात्रा में अमेरिकी हथियार उनके देश में रह गए हैं.
एक तरफ पाकिस्तान को चेतावनी और दूसरी तरफ बाकी दुनिया को भरोसा, यह दोहरा संदेश साफ दिखाता है कि तालिबान सरकार और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार अपने इस नए रिश्ते को किस तरह देख रही है. यह कोई विचारधारा का मेल नहीं है, बल्कि यह एक फायदे का सौदा है जिसमें दोनों पक्षों को तत्काल लाभ दिख रहा है.
इस समझौते में क्या है?
रूसी सरकार और तालिबान ने 27 मई को मॉस्को के पास एक सुरक्षा सम्मेलन के दौरान इस सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे. इस समझौते की पूरी बातें और बारीकियां अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं.
अफगानिस्तान के लिए रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने कहा कि इस समझौते का पूरा ध्यान रूसी उपकरणों की मरम्मत पर है और यह भविष्य में होने वाले रक्षा समझौतों का रास्ता साफ कर सकता है. उन्होंने आगे कहा कि फिलहाल के लिए सबसे पहली प्राथमिकता उन्हीं हथियारों और प्रणालियों को फिर से ठीक करना है जो पहले से ही अफगानिस्तान के पास मौजूद हैं.
सोवियत सेना ने 1979 के आखिर में अफगानिस्तान पर हमला किया था और वहां की अपनी दोस्ताना सरकार को बचाए रखने के लिए वे पूरे एक दशक तक वहीं डटे रहे. उस दौरान उनके बहुत सारे हथियार और सैन्य प्रणालियां वहीं पीछे छूट गईं, जो आज भी सही-सलामत मौजूद हैं.
साल 2001 के बाद, अमेरिका और नाटो ने भी अफगानिस्तान की वायुसेना को खड़ा करने के लिए रूसी हेलीकॉप्टरों, खासकर एमआई-17 का ही सहारा लिया. इसकी एक वजह यह थी कि अफगान पायलट और मेकैनिक पहले से ही इन हेलीकॉप्टर को चलाना और ठीक करना जानते थे. दूसरी वजह यह थी कि ये हेलीकॉप्टर अफगानिस्तान के पथरीले और ऊंचे पहाड़ों वाले इलाकों के लिए बिल्कुल सही माने जाते थे.
रूस-तालिबान समझौते का समय क्यों मायने रखता है?
याकूब का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के साथ तनाव बहुत ज्यादा बढ़ चुका है. इसमें सीमा पार से होने वाली गोलाबारी और अफगान इलाके के अंदर हवाई हमले भी शामिल हैं. पाकिस्तान लगातार तालिबान पर यह आरोप लगाता रहा है कि वह ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (टीटीपी) के आतंकियों को अपने यहां पनाह दे रहा है, लेकिन तालिबान हमेशा से इस आरोप को नकारता आया है.
एक तरफ जहां काबुल की यह सरकार अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाना चाहती है और पाकिस्तान को कड़ा संदेश देना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसा लगता है कि इस इलाके में जैसे-जैसे पश्चिमी देशों का असर कम हो रहा है, रूस यहां सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़ा खिलाड़ी बनने की कोशिश में है.
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी ‘तास' के मुताबिक, वहां की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु ने साफ तौर पर कहा है कि वे अफगानिस्तान या उसके पड़ोसी देशों में अमेरिका या नाटो के मिलिट्री बेस और सैन्य ढांचे को दोबारा खड़ा करने के सख्त खिलाफ हैं. उनका यह बयान रूस के उस बड़े लक्ष्य से बिल्कुल मेल खाता है, जिसके तहत वह इस पूरे इलाके को पश्चिमी देशों के सुरक्षा तंत्र से दूर रखना चाहता है.
आपसी फायदों पर टिका है तालिबान के साथ रूस का संबंध
काबुल पर तालिबान के दोबारा काबिज होने से पहले, अफगानिस्तान की पिछली सरकार में मंत्री रहे अब्बास बासिर ने रूस और तालिबान के रिश्ते को समझाया है. उनका कहना है कि यह कोई दिलों का मेल या असली राजनीतिक गठबंधन नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक व्यावहारिक और सिर्फ ‘अपने-अपने फायदे पर टिका हुआ रिश्ता' है.
उनके मुताबिक, रूस की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक ‘इस्लामिक स्टेट खुरासान' (आईएसकेपी) नाम का संगठन है. रूस को डर है कि यह संगठन अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करके मध्य एशिया के देशों में अशांति फैला सकता है और आगे चलकर खुद रूस की अंदरूनी सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है. बासिर का कहना है कि चूंकि तालिबान खुद आईएसकेपी के खिलाफ लड़ रहा है, इसलिए रूस तालिबान को एक ऐसे ‘सुरक्षा कवच' के तौर पर देखता है जो इस खतरे को रोक सकता है.
दूसरी तरफ, तालिबान को इस रिश्ते से इलाके में राजनीतिक मान्यता मिल रही है और व्यापार के नए आर्थिक मौके मिल रहे हैं. खासकर ऐसे समय में जब देश बेहद खराब आर्थिक मंदी से जूझ रहा है और उसे ऊर्जा और अनाज के आयात की सख्त जरूरत है. बासिर ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि तालिबान अपने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में विविधता लाना चाहता है, ताकि वह सिर्फ एक या दो बाहरी देशों पर ही पूरी तरह निर्भर होकर ना रह जाए.
खबरों पर पाबंदी और विरोधाभाषी बयान
सुरक्षा और राजनीति विश्लेषक बिस्मिल्लाह ताबान ने आगाह करते हुए कहा कि इस समझौते में असल में क्या-क्या बातें शामिल हैं, इसे लेकर अभी से कोई ठोस नतीजा निकालना बहुत जल्दबाजी होगी. इसकी वजह यह है कि रूस और तालिबान दोनों का ही यह पुराना इतिहास रहा है कि वे जरूरी जानकारियों और खबरों को छिपाकर रखते हैं.
उनका तर्क है कि तालिबान रूस दौरे का इस्तेमाल अपने देश के लोगों और लड़ाकों को संदेश देने के लिए भी कर रहा है. उन्होंने इसे प्रोपेगैंडा का पूरा फायदा उठाने की एक कोशिश बताया, ताकि लड़ाकों का हौसला बढ़ाया जा सके. दरअसल, पिछले दिनों पाकिस्तान की ओर से किए गए हमलों के बाद तालिबान के खेमे में अंदर ही अंदर भरोसा डगमगा गया था और वे कमजोर महसूस कर रहे थे.
तालिबान ने एक और बात की तरफ भी इशारा किया: जैसे ही मुल्ला याकूब ने इस समझौते को सार्वजनिक रूप से बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण बताकर पेश किया, रूसी अधिकारी तुरंत हरकत में आ गए और उन्होंने उम्मीदों को सीमित करना शुरू कर दिया. रूस ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा समझौता सिर्फ सोवियत काल के उन हथियारों और उपकरणों की मरम्मत और उन्हें दोबारा चालू करने तक ही सीमित है जो अफगानिस्तान में पीछे छूट गए थे.
बढ़ते पश्चिमी दबाव के बीच रूस का दक्षिण की ओर झुकाव
विश्लेषकों का कहना है कि अफगानिस्तान में रूस की मुख्य दिलचस्पी अभी भी सुरक्षा ही है, जिसमें मध्य एशिया के रास्ते होने वाली नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकना शामिल है. इसके अलावा, अफगानिस्तान में रूस की आर्थिक पकड़ अभी भी बहुत कम है. इसलिए, वहां लंबे समय तक रणनीतिक रूप से जुड़े रहने की उसकी मंशा को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है.
तालिबान को इस समझौते का फायदा तुरंत मिलने वाला है. एक तरफ पाकिस्तान का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और दूसरी तरफ उनकी अपनी सैन्य ताकत कमजोर होती जा रही है. ऐसे में तालिबान को काम में आने वाले हथियार और ऐसे साथी चाहिए जो उनकी देखरेख की जिम्मेदारी ले सके.
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका के बनाए नए हथियारों को बिना स्पेयर पार्ट्स और बाहरी मदद के चालू रखना बेहद मुश्किल है. जबकि, रूसी हथियारों को काम के लायक बनाए रखना ज्यादा आसान हो सकता है, बशर्ते उनकी मेंटेनेंस के रास्ते दोबारा खुल जाएं.
रूस में अफगानिस्तान के पूर्व राजनयिक रहे गौस जांबाज का कहना है कि हथियारों के इस नए सौदे को सिर्फ तकनीकी तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "इसमें सैन्य और तकनीकी सहयोग तो शामिल है ही, लेकिन बहुत हद तक इसका एक राजनीतिक पहलू भी है.”
जांबाज ने इस बात की तरफ भी इशारा किया कि रूस दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जिसने काबुल की मौजूदा सरकार (तालिबान) को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है. जांबाज का कहना है कि यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी यूरोप के साथ बढ़ते तनाव की वजह से रूस इस समय पहले ही कई मुश्किलों का सामना कर रहा है. इसलिए, मध्य एशिया और अफगानिस्तान से सटा हुआ यह पूरा इलाका रूस की सुरक्षा नीति के लिए अब और ज्यादा संवेदनशील हो गया है.
उन्होंने कहा, "अफगानिस्तान की सीमा इन देशों से भी लगती है. यह आशंका बनी रहती है कि अफगानिस्तान के रास्ते इन देशों और रूस के लिए सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं. यही वजह है कि रूस इस पूरे रास्ते को सुरक्षित करना चाहता है.”
पुरानी दुश्मनी के बावजूद रूस को गले लगाने के लिए तैयार है तालिबान
कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि रूस और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकी को अलग से नहीं देखा जाना चाहिए. यह दरअसल इस पूरे इलाके में हो रहे एक बड़े राजनीतिक और कूटनीतिक बदलाव का हिस्सा है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के रिसर्चर इदरीस रहमानी का कहना है कि अपने कमजोर आर्थिक ढांचे की वजह से अफगानिस्तान बार-बार बाहरी देशों की आपसी दुश्मनी और पावर गेम में खिंचा चला आता है. उनका मानना है कि अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत ना होने की वजह से, वहां की सरकारें मजबूरी में उस देश की तरफ झुक जाती हैं जो उन्हें आर्थिक सहारा दे सके, लेकिन बाद में उन्हें इस बात का अहसास होता है कि इस कूटनीतिक झुकाव की एक बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
उन्होंने एक साथ चल रहे कई अंतरराष्ट्रीय तनावों की तरफ इशारा किया. जैसे, अमेरिका और चीन की दुश्मनी, यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों के साथ रूस का टकराव, भारत और पाकिस्तान के बीच का पुराना तनाव, और पश्चिम एशिया के बदलते हालात. इन सब का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इन बदलते क्षेत्रीय तूफानों के बीच अफगानिस्तान पर एक ‘बवंडर' की तरह फंस जाने का खतरा मंडरा रहा है.
अफगानिस्तान के इतिहास को देखें, तो तालिबान की तरफ रूस का यह हाथ बढ़ाना बेहद हैरान करने वाला है. साल 1979 में सोवियत संघ का अफगानिस्तान पर हमला और उसके बाद हुआ भयानक युद्ध आज भी इस देश के इतिहास के सबसे गहरे और दुखद जख्मों में से एक है. उस दौर में लाखों अफगानों को अपनी जान बचाकर देश से भागने पर मजबूर होना पड़ा था. उस त्रासदी ने आने वाले कई दशकों के लिए अफगान समाज की पूरी सूरत ही बदल कर रख दी.
आज रूस का खुद को एक सुरक्षा साझेदार के रूप में पेश करना साफ दिखाता है कि कूटनीतिक और भू-राजनीतिक हित कितनी तेजी से इतिहास के पुराने और गहरे जख्मों को पीछे छोड़ देते हैं. यह इस बात का भी सबूत है कि आज के दौर की ताकतों और सत्ता के इस असली खेल में इतिहास की भूमिका कितनी सीमित यानी कम होकर रह गई है.
इस विरोधाभास या यूं कहें कि इस अजीब इत्तफाक को नजरअंदाज करना मुश्किल है: तालिबान आंदोलन का जन्म ही सोवियत संघ के हमले से मची तबाही के मलबे से हुआ था. उसने अपनी ताकत और साख का एक बड़ा हिस्सा विदेशी ‘कब्जाधारियों' के खिलाफ धर्म की दुहाई देकर बनाया था. लेकिन आज देखिए, उसी तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब, उसी महाशक्ति (रूस) के साथ हथियारों के सौदे पर गर्व से बातें कर रहे हैं जिसने कभी उनके देश अफगानिस्तान पर हमला किया था.
दिखने में तो यह बहुत छोटा सा कदम लगता है, लेकिन यह बहुत बड़े खेल का हिस्सा है. इसमें अमेरिका और पाकिस्तान भी शामिल हैं.